शाह, 'साहेब' प्रकरण: जाँच आयोग पर सवाल

  • 27 नवंबर 2013
अमित शाह
Image caption अमित शाह पर आरोप है कि टेप में वे युवती की निगरानी की बात कह रहे हैं

गुजरात में एक युवती की कथित जासूसी के मामले पर राज्य सरकार ने जो जांच आयोग गठित किया है उसकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं.

राज्य सरकार ने युवती जासूसी कांड की जांच के लिए हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश सुगना भट्ट और सेवानिवृत्त अतिरिक्त मुख्य सचिव केसी कपूर की सदस्यता वाले आयोग की घोषणा की है.

आयोग को जांच रिपोर्ट तीन महीने में सौंपनी है.

अमित शाह और 'साहेब' की नींद उड़ाने वाले सिंघल कौन हैं?

विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि आयोग के सदस्य राज्य की नरेंद्र मोदी सरकार के क़रीबी हैं और समिति का गठन महज़ दिखावा है.

कांग्रेस प्रवक्ता पी सी चाको ने आरोप लगाया, “इस मैच फिक्सिंग को स्वीकार नहीं किया जायेगा. यह जांच आयोग गठित करना मात्र एक ढकोसला है. आयोग में दो सदस्य हैं एक राज्य के पिछड़ा वर्ग आयोग से हैं और दूसरे वह हैं जो तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह के अधीन काम कर चुके हैं.”

'जासूसी क्यों' - जाँच के कार्यक्षेत्र में नहीं

जांच आयोग को दिए गए 'टर्म्स ऑफ़ रिफरेन्स' यानी (कार्यक्षेत्र) उसे किस-किस मुद्दे पर जांच करनी है, उनमें जासूसी क्यों करवाई गई का सवाल मौजूद नहीं है.

उससे कहा गया है कि वो मालूम करे कि क्या टेप असली हैं?

Image caption नरेंद्र मोदी की ओर से युवती जासूसी कांड पर कोई बयान नहीं आया है

आयोग से ये भी कहा गया है कि वो इसकी पुष्टि करे कि क्या घटना के चार साल बाद रिलीज़ हुए इन टेप के पीछे कोई साजिश है?

आयोग को इन्क्वायरी के लिए 'टर्म्स ऑफ़ रिफरेन्स' मंगलवार को दिए गए थे जबकि आयोग के गठन की घोषणा सोमवार को कर दी गई थी.

हालाँकि महिला के पिता की ओर से गुजरात सरकार को दिए गए एक पत्र में ये कहा गया है कि उस परिवार के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से पारिवारिक संबंध हैं.

ये भी कहा गया है कि महिला की माँ का इलाज चल रहा था और वे अकेली एक होटल में ठहरी थीं, इसलिए उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए परिवार ने ही सरकार से उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का अनुरोध किया था.

ऑडियो टेप

पिछले दिनों वेबसाइट कोबरापोस्ट डॉट कॉम ने एक ऑडियो टेप जारी कर ये आरोप लगाया था कि गुजरात के पूर्व गृह राज्य मंत्री अमित शाह के कहने पर राज्य पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग एक युवती पर 24 घंटे नज़र रख रहा था.

वेबसाइट के अनुसार टेप में अमित शाह पुलिस अधिकारी जीएल सिंघल से बातचीत को दौरान आदेश दे रहे हैं कि महिला पर नज़र रखी जाए क्योंकि ‘साहेब’ ऐसा चाहते हैं.

वेबसाइट कोबरापोस्ट डॉट कॉम ने 'साहेब' की पहचान पर किसी तरह का दावा नहीं किया है लेकिन इस मुद्दे पर राजनीतिक हलकों में अटकलों का बाज़ार गर्म है.

फिलहाल 'साहेब' की पहचान पर किसी तरह के ठोस सबूत सामने नहीं आए हैं.

'झूठे मुक़दमे'

इस बीच निलंबित प्रशासनिक अधिकारी प्रदीप शर्मा ने भी सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि इस मामले की जांच होनी चाहिए.

उनका आरोप है कि चूंकि उन्हें मामले के बारे में पता है इसलिए राज्य सरकार ने उनके ख़िलाफ़ झूठे मुक़दमे दर्ज कराए हैं.

गुजरात सरकार ने जांच आयोग के गठन का हुक्म उसी दिन जारी किया जिस दिन चार राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाक़ात कर मामले की न्यायिक जांच कराए जाने की मांग की थी.

इसके गठन के बाद सरकार ने कहा, “राज्य सरकार ने मामले के सभी पहलुओं पर ग़ौर करने के बाद व्यापक लोकहित और सच्चाई साबित करने के लिए जांच का फैसला किया है.”

सूरत बाढ़

सुगना भट्ट राज्य पिछड़ा आयोग की अध्यक्ष हैं. वो साल 2006 की सूरत बाढ़ जांच आयोग की मुखिया भी थीं. ये समिति बाढ़ के कारणों को जानने के लिए गठित हुई थी.

जस्टिस भट्ट आयोग ने गुजरात सरकार को इस मामले में किसी भी दोष से मुक्त किया था और कहा था कि बांध अथॉरिटी ने भारी बरसात के बावजूद बांध की सुरक्षा के सभी मुमकिन कदम उठाए थे.

हालांकि स्वयंसेवी संस्थाओं की पहल पर तैयार जस्टिस आरए मेहता समिति ने सूरत बाढ़ की तबाही के लिए प्रशासन की अव्यवस्था को ज़िम्मेदार ठहराया था.

Image caption 2002 के गुजरात दंगे नरेंद्र मोदी सरकार की कामयाबियों पर अक्सर हावी हो जाता है.

सूरत बाढ़ में 30 लाख लोग प्रभावित हुए थे और 10,000 करोड़ से भी ज्यादा की संपत्ति का नुकसान हुआ था.

2002 दंगे

केसी कपूर के बारे में गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक आरबी श्रीकुमार ने आरोप लगाया था कि नरेंद्र मोदी के क़रीबी होने की वजह से उन्हें बेहतर पोस्टिंग और जल्दी-जल्दी तरक्क़ी मिली.

सितंबर 2011 में नरेंद्र मोदी को लिखे गए एक ख़त में श्रीकुमार ने कपूर का नाम छह दूसरे अफ़सरों के साथ लिया था जिन्हें मोदी सरकार ने पहले तरक़्की और सेवानिवृति के बाद पदों से नवाज़ा है.

श्रीकुमार का आरोप है कि कपूर उन प्रशासनिक अधिकारियों में हैं जिन्होंने 2002 के दंगों की जांच के सिलसिले में किसी न किसी तरह नरेंद्र मोदी सरकार की टालमटोल की कार्रवाई का साथ दिया.

केसी कपूर ने श्रीकुमार के आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया है. उधर श्रीकुमार का नाम नरेंद्र मोदी के घोर विरोधियों में गिना जाता है.

कपूर गुजरात सरकार में अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद से रिटायर हुए थे. उस समय उनके मंत्रालय का कार्यभार अमित शाह के पास था.

सेवानिवृत होने के बाद उन्हें राज्य चुनाव आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया था.

पुरानी समितियां

राज्य में पहले कई दूसरे मामलों की जांच के लिए तैयार समितियों-आयोगों और उनके नतीजों पर भी सवाल उठाए गए हैं.

पिछले 11 सालों में गुजरात में बनी सारी समितियों ने या तो नरेंद्र मोदी सरकार को क्लीन चिट दी है या लंबे वक्त के बाद भी उनकी रिपोर्ट नहीं सौंपी गई है.

साल 2002 के गुजरात दंगे, आसाराम आश्रम में दो बच्चों की कथित तौर पर हत्या या ज़हरीली शराब पीने से लोगों की मौत का मामला सभी इसी श्रेणी में हैं.

2002 दंगों पर बने जस्टिस नानावटी आयोग की फाइनल रिपोर्ट अब तक नहीं आई है. वहीं कथित ज़मीन घोटालों पर तैयार जस्टिस एमबी शाह आयोग ने सरकार को क्लीन चिट दे दी है लेकिन पूरी रिपोर्ट सौंपी जानी बाक़ी है.

वर्ष 2008 के आसाराम गुरुकुल के छात्र दीपेश और अभिषेक की हत्या की जाँच के लिए बनाए गए जस्टिस डीके त्रिवेदी आयोग की रिपोर्ट अभी तक जारी नहीं की गई है.

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