शंकररमण हत्याकांड: कब क्या हुआ

पुडुचेरी की एक अदालत ने वर्ष 2004 के चर्चित शंकररमण क़त्ल मामले में कांची मठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को बरी कर दिया है.

जयेंद्र सरस्वती और विजयेंद्र समेत इस मामले में कुल 23 आरोपी थे. अदालत ने सभी आरोपियों को सबूत और हत्या का उद्देश्य साबित न होने के आधार पर बाइज़्ज़त बरी किया है.

पढ़िए, इस चर्चित घटनाक्रम में कब क्या हुआ.

03 सितंबर, 2004: कांचीपुरम के वरदराजापेरुमल मंदिर के प्रबंधक ए शंकररमण की हत्या मंदिर परिसर में कर दी गई थी. माना गया था कि हथियारबंद गैंग ने उनकी हत्या की.

11 नवंबर, 2004: जयललिता के शासनकाल में शंकररमण हत्याकांड में 78 साल के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को आंध्र प्रदेश के महबूबनगर से गिरफ़्तार किया गया.

10 जनवरी, 2005: इस हत्याकांड में कांची मठ के दूसरे पुजारी, 44 साल के विजेंद्र सरस्वती गिरफ़्तार.

03 सितंबर, 2004 से 10 जनवरी, 2005: शंकररमण हत्याकांड में कुल 24 लोगों की गिरफ़्तारी. इसमें जयेंद्र सरस्वती, विजेंद्र सरस्वती के साथ मठ के दो अन्य कर्मचारी और विजेंद्र सरस्वती के भाई भी शामिल थे.

10 जनवरी, 2005: जयेंद्र सरस्वती को ज़मानत मिली.

Image caption विजेंद्र सरस्वती को भी अदालत ने हत्या के आरोप से बरी कर दिया है.

10 फरवरी, 2005: विजेंद्र सरस्वती को ज़मानत मिली.

26 अक्टूबर, 2005: शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई को तमिलनाडु के चेंगलपेट से पुडुचेरी की अदालत में स्थानांतरित कर दिया.

27 नवंबर, 2005: हत्याकांड की सुनवाई शुरू हुई.

नवंबर, 2005 से नवंबर, 2013: मामले की सुनवाई के दौरान कुल 187 प्रत्यक्षदर्शियों की गवाई हुई. इनमें 82 प्रत्यक्षदर्शी गवाह और इकलौते सरकारी गवाह रवि सुब्रमण्यम अपने बयान से पलट गए.

नवंबर, 2005 से नवंबर, 2013: चार न्यायाधीश, एम चिनापांदी, डी. कृष्णाराजा, टी रामासामी और सीएस मुरुगन ने मामले में बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष की दलीलों को सुना.

27 नवंबर, 2013: नौ साल चले मुक़दमे के बाद पुडुचेरी के प्रधान ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश सीएस मुरुगन ने अपना फ़ैसला सुनाते हुए जयेंद्र सरस्वती, विजेंद्र सरस्वती सहित सभी 24 आरोपियों को बाइज़्ज़त बरी कर दिया.

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