'रेस्तरां में हमें अनदेखा करते हैं'

आप्रवासी

"जब हम किराए पर मकान लेने जाते हैं तो लोग हमें नाइजीरियाई और 'ब्लैक' कहकर साफ़ मना कर देते हैं. रेस्तरां में लोग हमें अनदेखा करते हैं. वे हमें देखकर कई तरह का मुँह बनाते हैं."

ये कहना है जैक्सन चीका का जो साल 2007 में नाइजीरिया से भारत आए थे. चीका ने बताया कि भारत में उनके साथ लोग बेहद अपमानजनक व्यवहार करते हैं.

चीका भारत में अच्छे अवसर तलाशने आए थे. उन्होंने दिल्ली को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें लगा कि यहाँ नौकरी के अच्छे अवसर मिलेंगे.

यूरोपीय देशों के मुकाबले भारत के लिए वीज़ा की फीस सबसे कम है. इसलिए भी चीका जैसे हज़ारों अफ्रीकी यहां नए अवसर तलाशने आते हैं.

अप्रवासियों की संख्या बढ़ी

गोवा में नाइजीरिया के लोगों के आपसी संघर्ष में कुछ समय पहले एक व्यक्ति की जान भी चली गई थी. इसके बाद भारत में अप्रवासियों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे.

भारत में हर साल बड़ी संख्या में अप्रवासी आते हैं. पिछले साल भारत में नौकरी के लिए आवेदन करने वाले अप्रवासियों की संख्या में 20 फ़ीसदी वृद्धि हुई.

हालांकि सरकारी एजेंसियां भारत में विदेशियों की कुल संख्या के आंकड़े उपलब्ध नहीं करवा पाई, लेकिन गृह मंत्रालय के आंकड़े एक सकारात्मक तस्वीर पेश करते हैं.

ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भारत में यात्रा करने, यहां रहने और काम करने वाले ब्रितानी नागरिकों की संख्या दिनों दिन बढ़ रही है.

इसी तरह फ्रांस, जर्मनी और कोरिया से भारत आने वालों की संख्या भी साल दर साल बढ़ी है. नैस्कॉम के अनुसार, अकेले आईटी सेक्टर में दुनिया भर से भर्ती किए गए अप्रवासी पेशेवरों में बढ़ोत्तरी हुई.

सस्ता श्रम

थेनी मैजिआ एक बीपीओ कंसल्टेंट हैं. वे साल 2000 में भारत आई थीं.

थेनी बताती हैं कि वो भारत काम के सिलसिले में आई थी. वे कहती हैं, "मैं जब पहली बार चेन्नई पहुंची तो हैरान रह गई. वहां पर आदमियों का पहनावा कुछ अजीब था. मैंने सोचा कि इन लोगों ने 'डायपर्स' (बाद में पता चला कि इसे लुंगी कहते हैं) क्यूँ पहन रखे हैं. मर्द बिना टॉप के घूम रहे थे जबकि औरतें ऊपर से नीचे तक तन ढकी हुई थीं."

Image caption थेनी मैजिआ भारत में बीपीओ कंसल्टेंट हैं.

थेनी ने बताया कि भारत में इतने साल गुज़ारने के बाद जब वो कुछ समय के लिए वापस अपने देश गईं, तो उन्हें लगा जैसे उनसे कुछ छूट रहा है. वे फिर यहाँ आ गईं और अब यहाँ से जाना नहीं चाहती.

उन्होंने बताया, "यहां मुझे अपने परिवार के साथ बहुत समय मिलता है क्योंकि यहाँ श्रम अन्य देशों के मुकाबले सस्ता है."

भारत में अवसर हैं और अवसरों के साथ आती हैं चुनौतियाँ. अप्रवासियों की ये नई तादाद ज़्यादातर अमीर, अधिक विकसित देशों के शिक्षित अप्रवासियों की है.

जिंदगी खूबसूरत है

भारत में अप्रवासियों की काउंसलिंग करने वालीं डयान सम्मरस कहती हैं, "मैं साल 2006 में भारत आई थी. यहाँ मेरा काम अच्छा चल रहा है. मेरे पास ज़्यादातर यूरोपीय देशों के लोग आते हैं."

वे कहती हैं, "ज़्यादातर दिक्कतें महिला अप्रवासियों को होती है. उनके पति काम पर जाते हैं. उन्हें यहाँ कामकाज के सुस्त तरीके से अकेले जूझना पड़ता है. जो लोग भारत की विविधता को समझ लेते हैं, यहाँ के कायदों में खुद को ढाल लेते हैं उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती."

भारत में एक अप्रवासी के लिए ज़िंदगी बेहतरीन, उलझनों से भरी, डरावनी या फिर ख़ूबसूरत भी हो सकती है. दुनिया भर के तमाम देशों से आए विदेशियों ने यहाँ पर अपनी एक छोटी सी दुनिया बना ली है. ज़रूरत है यहाँ की विविधताओं में खुद को ढालने की.

अप्रवासी यहां सहज हों, इसके लिए भारतीयों को भी इन मेहमानों का तहे दिल से स्वागत करने की ज़रूरत है.

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