क्यों भाती है तिब्बती शरणार्थियों को दिल्ली?

तिब्बती शरणार्थी कॉलनी

दिल्ली ने अपने आप में बहुत कुछ समेट कर रखा हुआ है. विभिन्न प्रांतों और संस्कृति के लोग यहाँ एक साथ मिलजुल कर रहते हैं. ये दिल्ली की ख़ासियत हमेशा से रही है.

सिर्फ़ देश के विभिन्न इलाक़ों से ही नहीं, बल्कि अन्य देशों से भी आए लोगों को दिल्ली ने शरण दी है. ऐसा ही एक समुदाय है तिब्बतियों का, जो पिछले कई दशकों से इस शहर में शरण लिए हुए है.

अरुणा नगर में बसे तिब्बती शरणार्थियों की बस्ती 'साम्येलिंग' में एक तिब्बती मंदिर में इकट्ठा हुए लोग पूजा में लीन हैं. ये सब अपने अच्छे भविष्य की कामना के साथ साथ ख़ुश हैं कि अपने देश से मीलों दूर दिल्ली की इन गलियों में भी वो अपनापन महसूस कर रहे हैं.

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अब ये यहाँ के नागरिक जैसे ही हो गए हैं क्योंकि इन्हें भी वो सब सहूलियतें मिल रही हैं जो दूसरे इलाक़ों के रहने वाले लोगों को दी जाती हैं और इससे तिब्बतियों की इस कालोनी के प्रधान कॉरतेन सेरिंग बेहद ख़ुश हैं.

वो कहते हैं, "दशकों पहले यहाँ हम झुग्गियों और झोपड़ियों में रहा करते थे लेकिन अब भारत सरकार ने हमें जो सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं उनसे अब सारे मकान न सिर्फ़ पक्के हो गए हैं बल्कि हमारा इलाक़ा भी अब एक पर्यटक स्थल के रूप में जाना जाता है."

नागरिकता

अरुणा नगर का साम्येलिंग अपने आप में पूरा तिब्बत समेटे हुए है. इस कॉलोनी की तंग गलियां अब शहर के प्रमुख शापिंग केन्द्रों में से एक है. पहाड़ी संस्कृति और बौद्ध संगीत ऐसा अहसास दिलाता है कि मानो कोई दिल्ली नहीं, बल्कि तिब्बत की गलियों में घूम रहा हो.

स्थानीय तिब्बती मंदिर में पूजा करने वाले बौद्ध भिक्षु भी यहाँ के बाज़ार में ख़रीदारी करते हुए नज़र आ सकते हैं. थोड़ी-थोड़ी दूर पर चाय के स्टॉल और खाने-पीने की दुकानों पर तिब्बती नौजवानों का जमघट भी आम बात है. इस इलाक़े में रहने वाले तिब्बती युवक युवतियों को अन्य शहरों के मुक़ाबले दिल्ली बहुत अच्छी लगती है.

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ऐसे ही एक युवक हैं तेनज़िंग जो साम्येलिंग में कॉफ़ी शॉप चलाते हैं. उन्हें लगता है कि दिल्ली सभी शहरों से बेहतर है. हालांकि वो बंगलौर में पले-बढ़े हैं लेकिन उन्हें दिल्ली सबसे अलग लगती है. वैसे वे ख़ुद तो मतदाता नहीं हैं लेकिन उनका कहना है तिब्बती समुदाय में कई लोगों को भारत की नागरिकता जन्म के आधार पर मिल गई है.

"हम मतदाता तो नहीं हैं क्योंकि हमारे पास आज भी शरणार्थी पासपोर्ट है मगर हम चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेते हैं. हमें ये अच्छा लगता है. मज़ा आता है. हम में से कई तो मतदाता हैं. इसलिए और मज़ा आता है."

लड़कियों की सुरक्षा

दूसरे नौजवानों को भी दिल्ली से मोहब्बत हो गई है. लेकिन लड़कियों को दिल्ली की सिर्फ़ एक बात पसंद नहीं आती है और वो है असुरक्षा का माहौल. इसी मोहल्ले में रहने वाली ताशिंग कहती हैं, "बाक़ी सब बातें तो ठीक हैं लेकिन मुझे उम्मीद है कि जो लोग चुनाव लड़ रहे हैं वे लड़कियों की सुरक्षा को भी मुद्दा बनाएंगे."

समुदाय के प्रधान सेरिंग बताते हैं कि तिब्बतियों में भी अब शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ा है और उनके समुदाय से अब कई डाक्टर और पत्रकार बने हैं और वे अपनी ज़िन्दगी में बहुत अच्छा कर रहे हैं.

लेकिन सब कुछ होने के बावजूद सम्येलिंग के रहने वालों को तिब्बत की याद बहुत आती है. सेरिंग कहते हैं, "यहाँ भारत में हमें बहुत प्यार मिला. हम में से कई लोगों को नागरिकता और सुविधाएँ भी मिलीं लेकिन तिब्बत हमारी ज़िन्दगी का हिस्सा है. वो हमारा वतन है. तिब्बत हमेशा हमारे दिल में रहता है."

दिल्ली दिल वालों की हो न हो, इस पर तो बहस जारी है लेकिन इस शहर ने दूर देशों के लोगों को पनाह देकर अपना हिस्सा तो बना ही लिया है. इस हद तक कि अब बाहर से शरणार्थी बनकर आए लोगों को भी यहाँ काफी अपनापन लगने लगा है.

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