एचआईवी संक्रमणः दर्द ने जोड़ा दर्द से रिश्ता

एचआईवी संक्रमिक ज्ञान रंजन

साल 2004 के अक्तूबर महीने तक ज्ञानरंजन भी एक आम इंसान की तरह ही जिंदगी गुजार रहे थे. रोज़ी-रोटी और परिवार की ज़िम्मेदारियों से वक्त मिलता तो थोड़ा समय सामाजिक कामों के लिए भी निकालते थे.

इसी बीच उन्होंने अपने एक बीमार मित्र के लिए पटना स्थित सरकारी अस्पताल पीएमसीएच में रक्तदान किया. लेकिन दो सप्ताह बाद मिली एक चिट्ठी ने उनकी जिंदगी में हल-चल पैदा कर दी. चिट्ठी में स्वैच्छिक सलाह सह जांच केंद्र में यानी वीसीटीसी सेंटर में जाकर जांच कराने को कहा गया था. वहां जाकर उन्होंने पत्नी के साथ खून का नमूना दिया.

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जांच किट की कमी होने के कारण रिपोर्ट आने में लगभग दो महीने का समय लगा जिसमें इस बात की पुष्टि की गई कि दंपत्ती एचआईवी संक्रमित हैं. सदमे के कारण इसके बाद वे अगले दो सप्ताह तक घर में लगभग कैदी की तरह रहे. लेकिन इस संबंध में परिवार वालों को पता चलने पर उन्हें उनका पूरा सहयोग मिला.

छोटे भाई द्वारा जुटाई गई जानकारी के आधार पर दंपत्ती ने दिल्ली स्थित एम्स में शुरूआती इलाज कराया. समय के साथ बिहार में भी ऐसे मरीजों का इलाज होने लगा. इसी दौरान वीसीटीसी सेंटर इंचार्ज निशात अहमद ने उन्हें अपने जैसे दूसरे मरीजों के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया.

ज्ञानरंजन बताते हैं कि 2005 के अंतिम महीने में पहली सफलता उन्हें तब मिली जब वे एचआईवी जांच के लिए ज़रूरी सीडी-फ़ोर मशीन लगवाने में सफल रहे. इस मशीन की खरीद के लिए पैसा तो आ चुका था लेकिन सरकारी फ़ाइलों की तिजोरी में बंद पड़ा था.

कोर्ट का दरवाजा

इसके बाद उन्होंने बिहार एड्स नियंत्रण समिति द्वारा आयोजित कार्यशालाओं में बकायदा प्रशिक्षण लेकर एचआईवी मरीजों के लिए जोर-शोर से काम करना शुरू किया. उनकी कोशिशें जल्द ही रंग लाने लगीं. साल 2006 में 15 अगस्त को बिहार में पहली बार एक साथ दो एंटी रेट्रो वाइरल थेरेपी सेंटर ने काम करना शुरू किया.

बाद के सालों में उनके प्रयासों से बिहार में दूसरे कई जिलों में भी ऐसे सेंटर खुले. आज ज्ञानरंजन हर रोज आठ से 10 मरीजों की काउंसिलिंग से लेकर इलाज तक में मदद करते हैं. फ़िलहाल वे इस मांग के समर्थन में अभियान चला रहे रहे हैं कि दिल्ली, उड़ीसा, गुजरात जैसे राज्यों की तर्ज पर बिहार में भी एड्स पीड़ित को पेंशन मिले.

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उनकी संस्था बीएनपी प्लस फ़िलहाल छह ज़िलों में काम कर रही है. संक्रमित लोगों की मदद के लिए वे जनहित याचिकाओं को भी एक प्रभावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं. इस दिशा में अपने योगदान के लिए वे साल 2009 में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल के हाथों सम्मानित भी चुके हैं.

ऐसे मरीजों के लिए उन्हें ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है जिन्हें डाइलेसिस या ऑपरेशन की जरूरत रहती है लेकिन सरकारी अस्पताल ऐसा करने से बचने के लिए बहाने ढूंढते रहते हैं. साल 2012 में एक सड़क हादसे में ज्ञानरंजन का पैर टूट गया. सरकारी अस्पताल में डाक्टरों ने सर्जरी की बात कही भी लेकिन एचआईवी संक्रमित होने की बात पता चलते ही वे मुकर गए.

पीआईएल के माध्यम से उन्होंने अपने इलाज के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और और कोर्ट ने भी उनकी सर्जरी करने का आदेश दिया. लेकिन कोर्ट के आदेश के बावजूद डाक्टरों ने एक के बाद जांच और रिपोर्ट में ऐसा उलझाया कि उनकी टूटी हड्डी पलास्टर के जरिए ही कामचलाऊ ढंग से जुट गई और इसके बाद थक-हार कर उन्होंने भी सर्जरी कराने से तौबा कर ली.

अंत नहीं है संक्रमण

ज्ञानरंजन बताते हैं कि एचआईवी संक्रमित होना ज़िंदगी का अंत नहीं है. सही समय पर रोग का पता चलने, फिर इलाज होने और नियमित दवा के सेवन से आम व्यक्ति की तरह ही जिंदगी बसर की जा सकती है. वे सलाह देते हैं कि ऐसा करने के लिए नशा से दूर रहना, पौष्टिक भोजन करना और नियमित कसरत करना भी ज़रूरी है.

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बिहार में आज लगभग 60 हजार से अधिक लोग एचआईवी से संक्रमित बताए जाते हैं. इनमें से बड़ी संख्या ऐसे मजदूरों और दूसरे कामगारों की है जो रोज़गार के लिए परदेस जाते हैं. गांवो में इससे बचने को लेकर व्यापक पैमाने पर लगातार जागरूकता कार्यक्रम नहीं चलाया जाना और लोगों के संवेदनशील नहीं बनाना ज्ञानरंजन इसका मूल कारण मानते हैं.

संक्रमित होने तक ज्ञानरंजन दंपत्ती निसंतान थे. काउंसिलिंग के बाद उन्होंने बच्चे को जन्म देने का फ़ैसला किया. इस दौरान ज्ञाररंजन ने एचआईवी-एड्स पर काम करना शुरू कर दिया था और वे एक दिसंबर के विश्व एड्स दिवस पर ही ऑपरेशन के जरिए अपने बच्चे का दुनिया में लाना चाहते थे. ज्ञानरंजन पिता तो बने लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी.

साल 2008 में उनकी पत्नी ने 28 नवंबर को एक स्वस्थ बच्चे का जन्म दिया.

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