1999 के तख़्तापलट ने दिया 2013 में झटका!

पाकिस्तान के नए फौजी जनरल राहील शरीफ

पाकिस्तान के ऊर्दू अख़बारों में जहां बीते हफ़्ते देश के नए सेना प्रमुख की नियुक्ति की चर्चा छाई रही तो दूसरी ओर भारत में तहलका संपादक तरुण तेजपाल और उन पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों पर लगातार तवज्जो बनी हुई है.

तहलका पत्रिका के संपादक से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामले पर हमारा समाज ने लिखा है कि इस तरह की घटनाएं मीडिया जैसे साफ सुथरे संस्थानों की विश्वसनीयता और उनकी कथनी और करनी पर सवाल उठाते हैं.

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इस मुद्दे के मीडिया में छाए रहने पर अख़बार की टिप्पणी है कि अगर तेजपाल ने वाकई जुर्म किया है तो उन्हें कानून के मुताबिक सख्त सजा मिलनी चाहिए लेकिन इस बारे में अदालत के फैसले से पहले ही मीडिया किसी को गुनहगार साबित करने की अंधी दौड़ में शामिल न हो.

हिंदुस्तान एक्सप्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर संपादकीय लिखा है जिसमें कहा गया है कि बिना शादी साथ रहना यानी 'लिव इन रिलेशन' न तो अपराध है और न ही पाप. अख़बार कहता है कि इस तरह के रिश्ते टूटने पर महिलाओं को तकलीफ उठानी पड़ती है.

ऐसे संबंधों को भारत में स्वीकार नहीं किया जाता है जबकि कई देशों में इसे स्वीकार्यता हासिल है. बहरहाल बेंच ने कहा कि कानून शादी से पहले यौन संबंधों को बढ़ावा नहीं दे सकता है और लोग इसके हक में या इसके विरोध में अपनी राय रख सकते हैं.

'इम्तिहान में अध्यापक फ़ेल' ये संपादकीय है राष्ट्रीय सहारा का, जिसमें बिहार में 43 हजार से ज्यादा अध्यापकों की एक परीक्षा का जिक्र किया गया है. इस परीक्षा में अंग्रेजी, गणित, हिंदी और सामान्य ज्ञान का टेस्ट लिया गया. टेस्ट में लगभग 24 फीसदी अध्यापक फेल हो गए.

अख़बार लिखता है कि बिहार से बड़ी संख्या में आईएएस और आईपीएस अधिकारी चुने जाते हैं. मेडिकल और इंजीनियरिंग में वहां से अच्छे खासे छात्र आते हैं. इससे वहां छात्रों की पढ़ाई में दिलचस्पी का पता चलता है. ऐसे में अगर अध्यापकों का ये रिजल्ट होगा तो किसे चिंता नहीं होगी.

'शरीफ़ का तख़्तापलट'

पाकिस्तान में राहील शरीफ़ को नया सेना प्रमुख बनाए जाने पर नवाए वक्त ने संपादकीय लिखा है. अख़बार के अनुसार सीनियरिटी सूची में लेफ्टिनेंट जनरल हारून असलम पहले नंबर पर थे और उन्हें सेना प्रमुख बनाए जाने की भी चर्चा थी. लेकिन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने अपनी विवेक से आर्मी चीफ के पद के लिए राहील शरीफ़ को चुना.

इस सिलसिले में यह धारणा भी है कि जब 1999 में नवाज़ शरीफ़ की सरकार का तख्ता पलट हुआ था तो उस समय ब्रिगेडियर रहे हारून असलम ने सैनिक कब्जे में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. शायद यही बात उनके सैन्य प्रमुख बनने में बाधा बनी.

अख़बार के अनुसार लेफ्टिनेंट जनरल हारून असलम ने अपने से जूनियर लेफ्टिनेंट जनरलों को सेनाध्यक्ष और चेयरमैन ज्वाइंट चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ कमेटी बनने के बाद सेना पाकिस्तान से समय से पहले रिटायरमेंट ले ली है और उन्होंने जनरल राशिद महमूद और जनरल राहील शरीफ को उनकी नई जिम्मेदारियों पर बधाई देकर एक सकारात्मक परंपरा स्थापित की है.

चरमपंथ

दैनिक एक्सप्रेस ने अपने पहले पेज पर राहील शरीफ़ की मां की तस्वीर छपी है जिस में वो अपने बेटे की कामयाबी के लिए दुआ मांग रही हैं.

दैनिक पाकिस्तान ने अदालती कार्यवाही के बाद बाहर आते हुए चीफ़ जस्टिस इफ्तिखार मोहम्मद चौधरी की तस्वीर छपी है. वो भी 11 दिंसबर को रिटायर हो रहे हैं और उनकी जगह तसद्दुक हुसैन जिलानी को नया प्रधान न्यायाधीश बनाने कि ख़बरें भी सब अख़बारों में हैं .

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दैनिक जंग लिखता है कि मुम्बई हमलों में पाकिस्तान के नॉन स्टेट एक्टर्स के हाथ होने की धारणा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इतनी पुख़्ता तौर पर समझ ली गई है कि हाल में जब प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ अमरीका गए तो राष्ट्रपति ओबामा ने पांच साल पहले हुए इस हमले ले लिए ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ जल्द से जल्द कार्रवाई करने का तक़ाज़ा कर डाला.

अख़बार लिखता है कि अगर पाकिस्तान का कोई संगठन किसी देश में चरमपंथ को बढ़ावा देने में शामिल है तो उसे रोकना बेशक पाकिस्तान सरकार की ज़िम्मेदारी है. लेकिन भारत ने अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं दिया जिस के आधार पर पाकिस्तान में इस मामले में गिरफ्तार लोगों पर अपराध साबित किया जा सके.

और पाकिस्तान कि सरकार इस बात को विश्व मंच पर आत्मविश्वास के साथ उठाये ताकि पाकिस्तान के बारे में नकारात्मक छवि बनने से रोकी जा सके. अगर भारत पाकिस्तानी मुल्ज़िमों के ख़िलाफ़ ठोस सबूत दे देता हैं तो फिर उन्हें कठोर से कठोर सजा देले में कोई हिचक नही होनी चाहिए.

गिरता रुपया

दैनिक इन्साफ के पहले पेज पर भारत के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद का ये बयां भी है कि भारत लश्कर ऐ तैयबा के संस्थापक हफ़ीज़ सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई से संतुष्ट नहीं है. खुर्शीद के मुताबिक़ पाकिस्तान सईद के ख़िलाफ़ तेज़ी से मुक़दमा चलने के वादा तो करता है लेकिन उस पर अमल नहीं हुआ है.

जंग में ही एक कार्टून छपा है जिसके एक हिस्से में जान बचाकर भाग रहे एक पाकिस्तानी के पीछे बड़ा सा बम लेकर तालिबान चरमपंथी पड़े हैं तो दूसरी तरफ अमरीका के ड्रोन हमलों से वो बेहाल है. दैनिक वक़्त ने डॉलर के मुक़ाबले पाकिस्तानी रूपए की गिरती क़ीमत को अपने कार्टून के विषय बनाया है. एक अमरीकी डॉलर एक सौ दस पाकिस्तानी रूपए का हो गया.

कार्टून में दोनों मुद्राओं को बॉक्सिंग की रिंग में दिखाया गया है जहाँ डॉलर को भारी भरकम बॉक्सर के तौर पर पेश किया गया है वहीं पाकिस्तान रुपए की न सिर्फ पसलियां चमक रही है वो डॉलर के सामने खड़ा भी जैसे तैसे ही हो पा रहा है.

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