'गैस मियां' को गैस कांड की बरसी से मतलब नहीं

गैस मियाँ का परिवार, भोपाल गैस त्रासदी

नाम- 'गैस मियां'. पता- यूनियन कार्बाइड के सामने वाली राजगढ़ कॉलोनी. उम्र- 29 साल. जन्‍म- दो और तीन दिसंबर 1984 की आधी रात के वक्त, इसी दिन यूनियन कार्बाइड के कारखाने से गैस का रिसाव हुआ था. काम- मजदूरी. बीमारी- कई, मसलन सांसें तेज़ चलना, आंखों के आगे अंधेरा छाना, खांसी, चक्‍कर आदि-आदि.

यह परिचय है उस शख्‍स का जिसने पहली बार जब दुनिया का दीदार करने के लिए आंखे खोली थी तब भोपाल का मंज़र ख़ौफ़ज़दा था. चारों तरफ बदहवासी का आलम था. सब भागे जा चले जा रहे थे.

आधे से ज्‍यादा शहर इस बात से बेख़बर था कि आखिर माजरा क्‍या है. भीड़-भाड़ भरे रास्तों पर सब एक दूसरे को धकियाते हुए भागे चले जा रहे थे.

(उलझी हुई भोपाल गैस कांड की डोर)

किसी को किसी की फिक्र न थी. फिक्र थी तो बस खुद की जान बचाने की. 'गैस मियां' का परिवार तब यूनियन कार्बाइड कारखाने से लगी राजगढ़ कॉलोनी में रहता था.

उस वक्त के माहौल का जिक्र करते हुए गैस मियां कहते हैं, "अम्‍मी बताती हैं कि गैस फैलने की बात जब पता चली तो वे दो बहनों के साथ घर के बाहर निकली और जिधर राह दिखी उस और चल दी. अब्‍बा एक बहन को लेकर अम्‍मी से बिछड़ गए. आगे चल कर अम्‍मी को एक ट्रक मिला. उसमें उन्‍होंने दोनों बहनों को चढ़ाया."

वो आगे कहते हैं, "लोगों से ठसाठस भरे ट्रक में अम्‍मी भी सवार हो गईं. ट्रक जब रुका तब इनको पता चला कि ये लोग शहर से बाहर मंडीदीप आ गए हैं. मंडीदीप पहुंचने के घंटे भर बाद अस्‍पताल में मेरा जन्‍म हुआ. अब्‍बा को तो मोहल्‍ले वालो ने बताया कि आपका परिवार ट्रक में गया है. अगले दिन वे ढूंढते-ढूंढते वहां पहुंच पाए."

तकलीफें बहुत सारी

मंडीदीप भोपाल से लगा एक औद्योगिक क्षेत्र है जोकि भोपाल से कोई 18 से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

मौत के खौफनाक मंजर से रूबरू डरे सहमे लोग खासतौर से यूनियन कार्बाइड से लगे इलाके के लोग बैरागढ़, बीएचईएल टीटी नगर तो गए ही, साथ ही कई लोग आस-पास के शहरों की ओर भी कूच कर गए थे. गैस मियां का परिवार भी उन्‍हीं डरे सहमे लोगों में से एक था.

(गैस त्रासदी की बच्चों पर छाया)

गैस मियां को ये नाम कैसे मिला, इस सवाल पर वे मुस्‍कुराते हुए कहते हैं, "असली नाम तो इक़बाल था लेकिन गैस राहत विभाग वाले मेरे पैदा होने के दिन को देखकर मुझे गैस मियां कहने लगे. अब तो सब मुझे इसी नाम से पुकारते हैं."

वो कहते हैं, "बचपन में बहुत सारे लोग मुझे देखने आते थे. लोगों को लगता था कि जब गैस ने इतने सारे लोगों को मार डाला तो यह ज़िंदा कैसे बच गया."

गैस मियां को गैस कांड की बरसी से ख़ास लेना-देना नहीं है. वे मज़दूरी करते हैं. उनसे मुलाकात भी ईंटखेड़ी गांव के अंदर सड़क बना रहे मज़दूरों की टोली के साथ हुई. यहां पर वो डामर पिघलाने का काम कर रहे थे. इस टोली में वे अपनी पत्‍नी पप्‍पी बी के साथ मज़दूरी करते हैं.

गैस मियां का कहना है कि बुरी चीज़ को क्‍या याद करना. वे खुदा का शुक्रिया अदा करते हैं कि गैस ने उनके किसी परिवार वाले या नाते रिश्‍तेदार को उनसे नहीं छीना. "हां, तकलीफें बहुत सारी दे गई ये गैस."

गैस के कारण

उन्‍होंने गिनाना शुरू किया, "अम्‍मी की तबीयत बहुत खराब रहती है. उनका पेट बार-बार फूल जाता है. उनसे कोई काम नहीं हो पाता. ज़रा सा चल लें तो सांसें तेज़ हो जाती हैं. गैस कांड के पहले तक तो वह बहुत काम करती थीं. गैस कांड के बाद तकलीफों के बावजूद वह बैठे काम कर लेती थीं. मंडी से केले सेव फल लाकर वह बेचती थी जिससे चार पैसे तो मिलते थे."

(तीन दिसंबर की सुबह का वो मंजर)

वो आगे कहते हैं, "अब तो अम्मी से कुछ नहीं होता. अब्‍बा का भी यही हाल है. वो तो फिर भी कुछ-कुछ कर लेते हैं. बहनें अपने अपने ससुरालों में हैं पर सब गैस से मिली बीमारियों की वजह से परेशान रहती हैं. गैस के कारण मुझसे भी ज्‍़यादा काम नहीं हो पाता लेकिन क्‍या करें. तीन बच्‍चों और मां-बाप को देखते हुए काम तो करना ही पड़ता है."

गैस मियां अपनी तकलीफ़ें बताते हैं, "मेरी भी आंखें लाल रहती हैं. सांस फूलने की शिकायत भी है. काम के दौरान यदि थोड़ा सुस्‍ता लूँ तो उठते वक्‍त चक्‍कर आते हैं. आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है."

क्‍या डॉक्‍टर को बताया कभी? इस सवाल पर वे कहते हैं, "हां, डॉक्‍टर का कहना है कि यह सब गैस के कारण हो रहा है."

वे सफाई देते हैं, "मेरा भले ही जन्‍म नहीं हुआ था लेकिन अम्‍मी ने तो भागते-भागते गैस खाई थी. उसका असर मुझ पर हुआ और अब मेरे बच्‍चों पर भी हो रहा है."

वो बताते हैं, "बीच वाला लड़का सूखी लकड़ी की तरह पतला है. उसके पैर की उंगलियां चिपकी हुई हैं. बहुत इलाज कराया लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा."

मुकद़दर से कौन जीता?

कुछ पैसा वगैरह मिला? इस सवाल पर उनका जवाब था, "हां, दो बार 25-25 हज़ार रुपए मिले थे. उसके बाद कुछ नहीं मिला."

इस सवाल पर कि क्‍या कभी अपना जन्‍म दिन मनाया? गैस मियां कहते हैं, "कभी नहीं." गैस कांड की बरसी की कुछ यादें हैं क्‍या? गैस मियां कहते हैं, "बचपन में तो इस दिन हम पुतले वगैरह जलाते थे. बड़े हुए तब से मज़दूरी करने लग गए."

(भोपाल गैस पीड़ितों की याद में)

वो बताते हैं, "एक दिन भी घर नहीं बैठ सकते. एक दिन के काम के 300 रुपए और पत्‍नी को 200 रुपए रोज़ मिलते हैं. तीन लड़के हैं जिनमें से दो सरकारी स्‍कूलों में पढ़ रहे हैं."

बच्चे किस कक्षा में पढ़ते हैं, ये गैस मियाँ को ठीक से याद नहीं था. सोचते-सोचते वे बताते हैं, "बड़ा वाला शायद तीसरी में है."

गैस कांड नहीं होता तो क्‍या ज़िंदगी बेहतर होती? इस सवाल पर उनका जवाब था, "हो भी सकता था. हम पढ़ लिख जाते तो कोई नौकरी-वौकरी लग जाती." फिर ठंडी सांस छोड़ते हुए गैस मियां कहते हैं, "पर साहब मुकद़दर से कौन जीत पाया है आज तक?"

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