दिल्ली: घर तोड़ने वालों को ही वोट देने की 'मजबूरी'

  • 2 दिसंबर 2013
दिल्ली, तुर्कमान गेट

दोपहर का वक़्त है और दिल्ली के तिलक नगर की इमारतों के बीच से गिने चुने राजनीतिक कार्यकर्ताओं का जुलूस निकल रहा है. जुलूस में नारे लगाने वाले भी नदारद हैं. इक्का दुक्का लोग ही जुलूस में शामिल हैं.

इस इलाके के ज्यादातर लोगों ने ख़ुद को चुनावी प्रक्रिया से कुछ अलग सा कर रखा है. यह इलाक़ा है साल 1984 में हुए सिख दंगों के पीड़ितों का.

कमोबेश यही हाल दिल्ली के तुर्कमान गेट के निवासियों का है जिनके मकानों पर साल 1976 में आपातकाल के दौरान बुलडोज़र चलाया गया था. राजनीतिक रूप से लोगों का मन उचट ज़रूर गया है लेकिन इनके सामने कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है.

तिलक नगर में जो मकान दंग़ा पीड़ितों को दिए गए थे वो अब जर्जर या फिर बहुत ही बुरी हालत में हैं क्योंकि इनका रख रखाव ठीक से नहीं होता. आज भी कई विधवाएं हैं जिन्हें आज तक नौकरी भी नहीं मिल पाई है.

लोग बताते हैं कि तिलक नगर में आज भी बिजली की समस्या है. बिजली कब रहती है और कब चली जाती है इसका कोई वक़्त नहीं. नेताओं ने हमेशा वादे किए कि क्षतिग्रस्त मकानों को दुरुस्त किया जाएगा लेकिन कभी किसी ने यहाँ के लोगों की सुध नहीं ली.

'पब्लिक ग़लत है'

इस सबके बावजूद तिलक नगर की इस कॉलोनी के लोग उसी राजनीतिक दल को वोट देते हैं जिस पर दंग़ों में शामिल होने का आरोप है.

दंगा पीड़ित न्याय व कल्याण सोसाइटी के बाबू सिंह दुखिया ने लोगों पर आरोप लगाते हुए कहा कि जब सबको मालूम है कि कौन शामिल था दंगों में तो फिर उसे वोट देने की क्या ज़रूरत है.

बाबू सिंह दुखिया कहते हैं, "ये तो पब्लिक ग़लत है. किसी और को क्या इल्ज़ाम दें."

वहीं मौजूद एक सिख नौजवान ने सभी राजनीतिक दलों पर दंगा पीड़ितों की भावनाओं से खेलने का आरोप लगाया. इस नौजवान का कहना था कि साल 1997 में जिस आयोग का गठन हुआ था और उसने जो सिफारिशें दी थीं, उन पर किसी ने लोकसभा या विधानसभा में आवाज़ नहीं उठाई.

इस नौजवान ने कहा, "लोग पीड़ितों की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं. आज भी सौ रूपए और दो सौ रूपए में वोट खरीदे जा रहे हैं."

तुर्कमान गेट में भी हालात ऐसे ही हैं. तंग गलियों में ज़्यादातर कबाड़ की दुकानें हैं. मुझे बुज़ुर्ग मोहम्मद यामीन उर्फ़ लालू बताते हैं कि ये वही इलाका है जो उजड़ा और फिर बसा. साल 1976 में जब रात के वक़्त बुलडोज़र चले थे तो फिर लोग इस इलाके से दूसरी जगहों पर चले गए थे.

'वो कहानी फिर सही'

इन लोगों को पता है कि अब उन्हें कोई सहारा नहीं दे सकता. उनकी ज़िंदगी अब इससे बेहतर नहीं हो सकती. अब तो ये लोग पत्रकारों को इंटरव्यू देते-देते भी थक गए हैं.

वो कहते हैं कि चुनाव के बहाने ही सही कुछ लोग उनके ज़ख़्मों को फिर कुरेदने पहुँच ही जाते हैं. बीबीसी से बात करने के लिए बमुश्किल तैयार हुए लालू कहते हैं, "किसने तोड़ा दिल हमारा, चलो ये कहानी फिर सही."

लेकिन आज यहाँ के लोगों की मजबूरी है कि जिस दल पर इनकी बस्ती उजाड़ने का इलज़ाम लगा. ये लोग उसे ही चुनने को मजबूर हैं.

मोहम्मद यामीन कहते हैं, "हमारे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है. हमें पता है हमें किसने उजाड़ा है. मगर हम उन्हें ही चुनते हैं."

मोहम्मद यामीन और उनके जैसे दूसरे बुज़ुर्ग, जिन्होंने साल 1976 का वो मंज़र देखा था बताते हैं कि लोगों के मकान न सिर्फ ज़मींदोज़ किए गए बल्कि जिन लोगों ने विरोध करने की कोशिश की उन्हें जेल भी भेज दिया गया.

Image caption तुर्कमान गेट के बाबू ख़ान कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि उनका घर किसने तुड़वाया.

तुर्कमान गेट के मटियामहल की इस गली में ज़्यादातर आबादी मुसलमानों की है. इनमे से कुछ साल 1976 के पीड़ित हैं तो कुछ दूसरे लोग हैं जो साल 1982 में यहाँ आकर बसे हैं. कुछ लोगों के दिलों में पुरानी टीस है तो कुछ को कोई फर्क नहीं पड़ता.

कुछ बुज़ुर्ग तो अब कूटनीतिक तरीके से सवालों को टालने की कोशिश करते हैं. इनमे से 82 साल के बाबू ख़ान भी हैं जो कहते हैं कि उनके घर भी तबाह हुए लेकिन वो कहते हैं कि उन्हें कुछ नहीं मालूम कि घर किसने तुड़वाए या फिर किसके इशारे पर ऐसा हुआ.

ज़ाहिर है वक़्त के साथ पुराने ज़ख़्म भरे तो नहीं हैं लेकिन इस बीच लोगों ने अपने आप को राजनीतिक तौर पर ढालने की कोशिश भी कर ली है. तुर्कमान गेट के लोगों से बात करके तो ये समझ में आया कि राजनीतिक दलों के वायदों से अब यहाँ के लोग कभी पसीजते नहीं.

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