चुनावी वादे हैं.. वादों का क्या...

  • 7 दिसंबर 2013
दिल्ली विधान सभा चुनाव 2013

तकरीबन 80 फीसदी आम भारतीयों के लिए रोज़-ब-रोज़ का भ्रष्टाचार, कुप्रशासन और दैनिक सुविधाओं का अभाव सबसे बड़ी समस्या है लेकिन चुनावों के दौरान या अन्यथा भी वर्तमान राजनीतिक विमर्श में इन मुद्दों की कोई ख़ास चर्चा नहीं है.

हाल ही संपन्न हुए पाँच राज्यों के विधान सभा चुनावों के दौरान चले राजनीतिक विमर्श में 'मैक्रो' (व्यापक) तस्वीर पर केंद्रित रहा लेकिन इस विमर्श में 'माइक्रो' (सूक्ष्म) ब्योरौं और वास्तविक अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं थी. इन विमर्शों में आम जनता के रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों और राजनीति में अपराध तथा भ्रष्टाचार के बढ़ते प्रभाव का बेहद अभाव है.

विभिन्न दलों के घोषणापत्रों और नेताओं के वादों का निरीक्षण करें तो देखेंगे कि 'मैक्रो' दृष्टिकोण 'माइक्रो' दृष्टिकोण पर हावी है. राजनीतिक दल और उनके नेता अक्सर जनता से पानी, बिजली, सड़क और रोज़़गार का वादा करते देखे जाते हैं लेकिन वो यह नहीं बताते कि सत्ता में आने के बाद इन वादों को हकीकत में किस तरह बदलेंगे.

चार दशकों का सबक

पिछले चार दशकों में खासकर वर्ष 1967 के बाद, केंद्र एवं राज्यों में वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों दल सत्ता में रहे हैं लेकिन कुव्यवस्था और कुप्रशासन के कारण बढ़ने वाला अपराध और भ्रष्टाचार आम जनता के लिए हर जगह भयावह बना हुआ है.

केंद्र एवं राज्यों में ढेरों नए कानून बने हैं, सरकार ने कई राजनीतिक कदम उठाए हैं लेकिन आम नागरिकों का जीवन पहले ही तरह जटिल और चुनौतिपूर्ण बनी हुई है.

सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार मिटाने की बातें बहुत अच्छी लगती हैं और कई बार इससे यह उम्मीद भी पैदा होती है कि पूरा नहीं तो थोड़ी ही सही, भ्रष्टाचार में कमी आएगी लेकिन कोई भी दल यह नहीं बताता सत्ता में आने के बाद वो इसके लिए कौन से कदम उठाएगा.

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने साल 2011-12 में अपने साथियों के साथ पूरे देश में दैनिक जीवन से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए लोकपाल लाने के लिए आंदोलन किया था.

एक और संस्था बनाने की माँग से यह सवाल उठना जायज है कि क्या देश की मौजूदा संस्थाएँ और कानून भ्रष्टाचार से निपटने में सक्षम नहीं हैं. लेकिन आम जनता ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के नेताओं के 'मैक्रो' बयानों पर यकीन कर लिया.

आम जनता की मुश्किल

आम जनता को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है वो है विवाह, जन्म और मृत्यु प्रमाण-पत्र जैसी चीज़ों क न मिलना या फिर स्कूल और अस्पताल में प्रवेश न मिलना. ग़ैर-कानूनी तरीकों का सहारा लिए बग़ैर ड्राइवरी का लाइसेंस बनाना या घर की रजिस्ट्री कराना नाकों चने चबाने जैसा है. घूस दिए बिना या निचले स्तर की बाबूगिरी से पार पाए बगैर जमीन-जायदाद का स्थानांतरण, ज़मीन, मकान, फ़्लैट की रजिस्ट्री इत्यादि कराना संभव नहीं है.

इन सेवाओं के लिए बाबूओं की मुट्ठी गर्म करने की मजबूरी आम आदमी का जीवन नर्क बना देती है क्योंकि अक्सर लोग अपने काम से छुट्टी निकालकर इन सेवाओं से जुड़ों कार्यालयों में जाते हैं.

गरीबों और वंचितों तबके की सहायता के लिए चलाई जा रही ढेरों केंद्रीय परियोजनाएँ हैं लेकिन इन योजनाओं के जमीनी स्तर पर लागू करने को लेकर हमेशा शिकायत आती रहती है. हालाँकि कुछ अधिकार आधारित अधिनियमों के पिछले कुछ सालों में लागू होने से कुछ सेवाओं को कुछ नागरिकों को मिलने का मजबूत आधार तैयार हुआ है.

महात्मा गाँधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना जैसी सदिच्छापूर्ण योजनाओं को लागू करने के लिए बड़ी इच्छाशक्ति की ज़रूरत है. इसी तरह जन वितरण प्रणाली भी अव्यवस्था और काला बाज़ारी से जूझ रही है.

यहाँ तक कि बैंक का लोन चुकाने में घूस की ख़बरें भी आम हैं. बैंक के एजेंट और अधिकारियों के ख़िलाफ़ पर्याप्त शिकायतें सुनने को मिलती हैं.

समय की मांग

समय की मांग है कि आम आदमी को त्वरित और प्रभावी सेवा मिल सके लेकिन राजनीतिक दलों के पास न तो समय है, न ही नीयत और न ही कोई तरीका ऐसा तरीका है जिससे वो आम आदमी का जीवन आसान बना सकें.

प्रशासनिक सुधार, ख़ासतौर पर निचले स्तर की बाबूगिरी में, और पुलिस सुधार से रोज़मर्रा की कई शिकायतें हल हो सकती हैं लेकिन ऐसा लगता नहीं कि राजनीतिक तबके को इसमें कोई रुचि है. क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल सत्ता की बागडोर ढीली नहीं करना चाहता. सत्ता पर लगाम कसे रहने के लिए वफादार, आज्ञाकरी और पक्षपातपूर्ण लालफीताशाही की ज़रूरत होती है.

पंचायत और नगर निगम जैसी ग्रामीण एवं शहर स्तर की संस्थाओं के पास शक्ति ज़रूरत से कम है लेकिन कर्मचारी ज़रूरत से ज्यादा हैं.

किसी समस्या की गहराई में जाकर उसके 'माइक्रो' पक्षों पर चर्चा करने से ज़्यादा आसान है बड़ी-बड़ी बातें करना और भावनात्मक मुद्दों को उछालना. पुराना मुहावरा है कि झूठ की ज़ुबान लंबी होती है.

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