बिहारः क्यों फेल हो गए नीतीश के 'गुरुजी'?

बिहार का प्राथमिक स्कूल

पिछले महीने 25 नवंबर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने दूसरे कार्यकाल का तीन साल पूरा होने पर अपनी सरकार का आठवां रिपोर्ट कार्ड जारी किया. इस रिपोर्ट में शिक्षा सहित कई विभागों की उपलब्धियां गिनाई गई थीं.

उसी दिन शिक्षा विभाग ने भी प्राथमिक स्कूलों के नियोजित शिक्षकों के लिए अक्तूबर में आयोजित की गई 'दक्षता परीक्षा' का परिणाम जारी किया जो कि चौंकाने वाला रहा. इस परीक्षा में शामिल हुए 43 हज़ार से अधिक शिक्षकों में से लगभग एक चौथाई विफल रहे.

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ये तो तब है जबकि 'दक्षता परीक्षा' में ज़्यादातर सवाल प्राथमिक कक्षाओं के स्तर के पाठ्यक्रम से पूछे गए थे और मूल्यांकन में ग़लत जवाब के लिए अंक भी नहीं काटे गए थे.

इन परिणामों ने बिहार की प्राथमिक शिक्षा की उपलब्धियों को एक बार फिर परोक्ष रूप से कटघरे में खड़ा कर दिया.

वर्ष 2005 में पहली बार सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने साल 2006-07 में बड़े पैमाने पर नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति की. इन शिक्षकों को नियुक्ति वेतनमान के तहत न करके एक निश्चित मासिक राशि पर की गई. इन्हें नियोजित शिक्षक कहा गया. करीब एक लाख सोलह हज़ार नियोजित शिक्षकों की नियुक्ति हुई.

नियोजित शिक्षक

शिक्षाविद प्रोफ़ेसर विनय कुमार कंठ पहले चरण के नियोजन प्रक्रिया पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, "सरकार ने सिर्फ अंकों के आधार पर ही शिक्षकों के नियोजन का फैसला किया था जो कि बिल्कुल गलत फैसला साबित हुआ. नियोजन प्रक्रिया के पहले बिहार में एक लंबा दौर ऐसा भी गुजरा जब विद्यार्थी गलत तरीके अपनाकर ऊंचे अंकों के साथ पास हो रहे थे. ऐसे में बड़ी संख्या में कम दक्षता और पात्रता वाले उम्मीदवार भी शिक्षक बन गए."

अयोग्य शिक्षकों की बहाली की एक दूसरी वजह कंठ ने यह बताई कि तब उम्मीदवारों के लिए कोई उम्र सीमा तय नहीं की गई थी.

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ऐसे में बहुत सारे ऐसे लोग भी शिक्षक बन गए जो दूसरे व्यवसायों में लग गए थे और पढ़ाई-लिखाई से जिनका नाता लंबे समय से टूट गया था.

ऐसे त्रुटिपूर्ण नियोजन के बाद आशंका के अनुरूप ही शिक्षकों की योग्यता संबंधी शिकायतें बड़े पैमाने पर मिलने लगीं. ऐसे शिक्षकों की बहाली का मामला रह-रह कर आलोचना का केंद्र बनता रहता है.

वर्ष 2009 में केंद्र सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) बनाया. इसके तहत शिक्षक बनने के लिए कुछ न्यूनतम योग्यताओं का होना जरूरी बनाया गया.

आरटीई के प्रावधानों को पूरा करने के लिए बिहार शिक्षा विभाग ने दक्षता परीक्षा का आयोजन शुरू किया.

तीसरी परीक्षा

राज्य में 2013 में तीसरी बार दक्षता परीक्षा ली गई. इसके पहले वर्ष 2008 और 2010 में भी यह परीक्षा आयोजित हुई थी. दक्षता परीक्षा राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण परिषद (एससीईआरटी) आयोजित करता है.

वर्ष 2010 में भी लगभग आठ फीसदी शिक्षक इस परीक्षा में विफल रहे थे लेकिन वर्ष 2013 में यह प्रतिशत बढ़कर तीन गुना हो गया.

वर्ष 2013 की परीक्षा में सबसे अधिक लगभग 39 फीसदी उर्दू शिक्षक विफल रहे हैं. इसके बाद लगभग 23 फीसदी शारीरिक शिक्षा के शिक्षक और 21 फीसदी सामान्य शिक्षक भी अनुत्तीर्ण रहे हैं.

साथ ही नौ शिक्षकों को कदाचार के आरोपों की वजह से परीक्षा से निष्कासित किया गया था.

मगर ये परिणाम शायद शिक्षा विभाग के लिए चौंकाने वाले नहीं थे. दक्षता परीक्षा का परिणाम जारी करते हुए शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव अमरजीत सिन्हा ने यह स्वीकार किया कि राज्य के लगभग बीस प्रतिशत नियोजित शिक्षक पढ़ाने के लायक नहीं है.

दूसरी ओर शिक्षकों की विफलता के संबंध में शिक्षकों और शिक्षक संगठनों की राय कुछ अलग है.

शिक्षकों की विफलता के लिए सरकार को दोषी ठहराते हुए प्राथमिक शिक्षक संघर्ष साझा मंच के प्रमुख रंजन कहते हैं कि शिक्षण कार्य अब एकेडेमिक जॉब नहीं रहने दिया गया है.

उर्दू और शारीरिक शिक्षा

जनगणना सहित शिक्षकों को कई तरह के गैर-शैक्षणिक कार्य में लगाकर स्कूलों में पढ़ने-पढ़ाने का माहौल ही खत्म कर दिया गया है. नतीजतन शिक्षक दक्षता परीक्षा में विफल हो रहे हैं.

उर्दू और शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों के साथ कुछ दूसरी दिक्कतें भी हैं.

शिक्षक संजीव कुमार जायसवाल कहते हैं, "शारीरिक शिक्षा संबंधी पाठ्यक्रम अब तक नहीं बना है. ज्यादातर स्कूलों में खेल के मैदान और साम्रगी का अभाव है. ऐसे में शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों को अपने विषय की जगह सामान्य विषय पढ़ाने को कहा जाता है. इस कारण वे अपने विषय से कटकर बड़ी संख्या में दक्षता परीक्षा में विफल हो रहे हैं."

वहीं उर्दू के शिक्षकों की परेशानियों का जिक्र करते हुए आरिफ अंसारी ने बताया, "बड़े पैमाने पर उर्दू शिक्षकों को ऐसे स्कूलों में पदस्थापित कर दिया गया है जहां इस विषय के विद्यार्थी ही नहीं हैं. जिसकी वजह से जरूरतमंद विद्यार्थियों को शिक्षक नहीं मिल रहे हैं और बिना पढ़ाए शिक्षक अपना विषय भूल रहे हैं."

विभागीय कार्रवाई

दक्षता परीक्षा में विफल रहे शिक्षकों पर विभागीय कार्रवाई की तलवार लटक रही है. प्रावधानों के अनुसार परीक्षा में दूसरी बार विफल हुए शिक्षकों की सेवा समाप्त कर दी जानी है.

ऐसे शिक्षकों की संख्या के बारे अभी जानकारी नहीं मिल पाई है. इस सबंध में पूछने पर बिहार प्राथमिक शिक्षा के संयुक्त निदेशक आर एस सिंह ने बताया, "इन शिक्षकों की सूची अगले सप्ताह तक तैयार कर ली जाएगी और फिर इन्हें हटाने की कार्रवाई शुरू होगी."

आर एस सिंह कहते हैं, "वर्ष 2010 की दूसरी दक्षता परीक्षा के बाद ऐसे 251 शिक्षकों की सेवा समाप्त कर दी गई थी."

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बिहार शिक्षा विभाग ने ‘समझे-सीखें’ नामक शैक्षणिक गुणवत्ता मिशन भी चलाया था. जिसके तहत फिलहाल इग्नू (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय) के माध्यम से शिक्षकों को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है. बड़े पैमाने पर शिक्षकों की विफलता ने उनकी दक्षता को बढ़ाने के लिए चलाए गए कार्यक्रम पर भी सवालिया निशान लगा दिया है.

नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर पटना के एक सरकारी शिक्षक ने बीबीसी से कहा कि सरकार को अब अपनी नीतियों में परिवर्तन करते हुए शिक्षक बहाली में क्वांटिटी (संख्या) के साथ-साथ क्वॉलिटी (गुणवत्ता) का भी ध्यान रखना चाहिए. शिक्षक बहाली में पात्रता और दक्षता की कमी किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए. ऐसा होने पर ही भविष्य में बेहतरी की कुछ उम्मीद जग सकेगी.

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