'जस्टिस गांगुली पर आरोप सही, लेकिन कार्रवाई नहीं'

सुप्रीम कोर्ट भारत

सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त जज पर क़ानून की एक स्नातक छात्रा की ओर से लगे यौन शोषण के आरोपों की जाँच कर रहे पैनल ने माना है कि उस महिला के आरोप सही हैं. लेकिन साथ ही कोर्ट ने इस बारे में कोई कार्रवाई करने में असमर्थता जताई है.

समिति के मुताबिक़, "स्टेला जोन्स के लिखित और मौखिक बयान से प्रथम दृष्ट्या लगता है कि सेवानिवृत्त न्यायाधीश एके गांगुली की ओर से अभद्र (मौखिक रूप से अभद्र और यौन प्रकृति का) व्यवहार हुआ."

इसके बाद मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक़, "ये देखते हुए कि उक्त महिला सुप्रीम कोर्ट में पंजीकृत नहीं थी और संबंधित जज भी घटना वाले दिन तक पद पर नहीं थे, इस न्यायालय की ओर से कोई और क़दम उठाने की ज़रूरत नहीं है."

मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम ने जस्टिस आरएम लोढ़ा, जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई के साथ इस पैनल की घोषणा की थी.

स्टेला जेम्स, नाम की क़ानून की स्नातक छात्रा ने पिछले महीने एक ब्लॉग पोस्ट में लिखा था कि कैसे जज एके गांगुली ने दिल्ली के एक होटल के कमरे में उनका शोषण किया.

उन्होंने लिखा था कि यह पिछले साल दिसंबर में हुआ था, जब वह जज के साथ एक इंटर्न के रूप में काम कर रही थीं.

इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने पैनल के गठन की घोषणा करते हुए कहा, "हम इसे हल्के में नहीं ले सकते. इस संस्था का प्रमुख होने के नाते मैं चिंतित हूं और यह जानने के लिए उत्सुक हूं कि ये आरोप सच्चे हैं या नहीं."

न्यायमूर्ति सदाशिवम के अनुसार, "मीडिया रिपोर्ट में उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में प्रस्तुत किया गया इसलिए समिति का गठन किया गया था, जिसने रिपोर्ट दे दी है. पाँच दिसंबर 2013 की अदालत की बैठक में हुए फ़ैसले के अनुसार इस न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों के विरुद्ध आए मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के ऐडमिनिस्ट्रेशन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हो सकती है."

पिछला दिसंबर

महिला अधिकारों से जुड़ी कार्यकर्ता कविता कृष्णन ने फ़ैसले पर प्रतिक्रिया में कहा, "पहली बार इस तरह का मामला सामने आया और अदालत ने इस पर कार्रवाई की, ये स्वागत योग्य है. अब मैं ये चाहती हूँ कि मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस गांगुली को पश्चिम बंगाल के मानवाधिकार आयोग के प्रमुख के पद से हटाने का फ़ैसला दें."

उधर सुप्रीम कोर्ट की वकील करुणा नंदी ने इस बारे में कहा, "जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही एक सदस्य के विरुद्ध तेज़ी से और निष्पक्ष जाँच करते हुए उसके नतीजे सार्वजनिक किए हैं उस पर हमें गर्व होना चाहिए. इसके बाद जस्टिस गांगुली को जब तक किसी अदालत के मुक़दमे में निर्दोष नहीं पाया जाता है उन्हें पश्चिम बंगाल के मानवाधिकार आयोग के प्रमुख के पद से तुरंत इस्तीफ़ा दे देना चाहिए."

जनरल ऑफ़ इंडियन लॉ एंड सोसायटी के अपने ब्लॉग में छह नवंबर को जेम्स ने लिखा, "पिछला दिसंबर देश के महिला आंदोलन के लिए बहुत महत्वपूर्ण था- क़रीब-क़रीब सारी आबादी महिलाओं के प्रति होने वाली हिंसा और स्पष्टतः उदासीन सरकार के ख़िलाफ़ उठ खड़ी हुई थी."

वह कहती हैं कि विश्वविद्यालय के अपने आखिरी साल में उन्होंने एक "बेहद सम्मानित, हाल ही में रिटायर हुए सुप्रीम कोर्ट जज" के साथ इंटर्न के रूप में काम करने की वजह से सर्दियों की छुट्टियों में हो रहे इन प्रदर्शनों में शामिल होना छोड़ दिया.

"मेरी मेहनत का फल मुझे यौन हमले (शारीरिक चोटें नहीं लेकिन उससे कम हिंसक भी नहीं) के रूप में मिला, एक ऐसे आदमी से जो मेरे दादा की उम्र का था. मैं इसके ब्योरे में तो नहीं जाऊंगी, लेकिन इतना ज़रूर कहूंगी कि उस कमरे से निकलने के बहुत बाद भी उसकी याद क़ायम रही, दरअसल यह अब भी मेरे साथ ही है."

लेकिन उस घटना के इतने महीने बाद वह इस मामले को सार्वजनिक करने के सवाल पर जेम्स, जो अब एक ग़ैरसरकारी संस्था की वकील हैं, लिखती हैं, "झेला और अब भी झेल रही हूं, उनके प्रति सचमुच कोई दुर्भावना नहीं है, न ही उनके जीवन भर के काम पर सवाल खड़ा करने की इच्छा है."

"लेकिन एक ज़िम्मेदारी है कि कोई दूसरी जवान लड़की इसी तरह की स्थिति में न पड़े."

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