कहीं कसीनो कैपिटल तो नहीं बनता जा रहा है गोवा?

गोवा की कसीनो संस्कृति

बीते दशक में गोवा में पहले कसीनो के खुलने के बाद से ही यहाँ के मशहूर सागर तटों पर जुए की लत का चलन जोर पकड़ता जा रहा है.

65 साल के मातियास वाज़ की कहानी में गोवा के कसीनो कल्चर के स्याह पहलू की एक झलक देखी जा सकती है.

मातियास ने जिंदगी के दस साल अपने बेटे के कर्ज़ों का बोझ उतारने में गँवा दिए. ये कर्ज़ उनके बेटे ने जुआ खेलने के लिए लिया था.

(छप्पर फाड़ लॉटरी)

मातियास ने अपनी दास्तां कुछ इन लफ्ज़ों में बयां किया, "बेटे के लिए 60 लाख रुपए से भी अधिक के कर्ज़े चुकाने के लिए मैंने अपनी ज़मीन बेच दी, जमा पूंजी निकाल ली और परिवार का सोना भी गिरवी रखा. ये रकम मेरे बेटे ने अपने जुए की लत को पूरा करने के लिए देनदारों से उधार ली थी."

कर्ज चुकाने के लिए पारिवारिक घर की बिक्री के दौरान पैदा हुए विवाद के दौरान मातियास के करीबी रिश्तेदारों की हत्या कर दी गई.

एक वक्त था जब मातियास का प्रकाशन का धंधा अच्छा चल रहा था. उनका बेटा भी इस काम में उनकी मदद किया करता था.

'सब कुछ खो दिया'

लेकिन अब मातियास को पुर्तगाली भाषा से अंग्रेजी में अनुवाद करने पर मिलने वाली मामूली रकम से अपना गुजारा करना पड़ता है. पणजी में उनकी एक फ़ोटोकॉपी शॉप भी है.

रविवार का दिन काम के लिहाज़ से खाली गुज़रता है. इसका जिक्र करते हुए मातियास कहते हैं, "जब भी रविवार आता है, मुझे फ़िक्र होने लगती है क्योंकि उस दिन दुकान बंद करनी पड़ती है. इसका मतलब ये हुआ कि इस दिन कोई कमाई नहीं हुई."

(भाग्य की बरसात)

मडगांव के इक़बाल मुनाफ़ पेशे से कपड़ों के कारोबारी हैं. उन्हें दो कमरों के एक छोटे से फ्लैट में जिंदगी गुज़ारनी पड़ रही है. कसीनो में जुआ खेलने के दौरान मुनाफ ने अपनी जमा पूंजी गंवा दी थी.

मुनाफ ने बताया कि उन्हें अपने कपड़ों की दुकान बेचनी पड़ी, जमा किए पैसे ख़र्च करने पड़े और इतना ही नहीं बल्कि कर्ज़ उतारने के लिए पारिवारिक संपत्ति भी बेचनी पड़ी.

मुनाफ़ कहते हैं, "दुकान बंद करने के बाद तकरीबन हर रात मैं कसीनो में जुआ खेला करता था. जुआ खेलने के लिए पहले पैसा अपने बैंक खाते से निकाला फिर कारोबार के पैसे खर्च किए और आखिर में मैं तब रुका जब मुझे लगा कि मैं अपना सब कुछ गँवा चुका हूँ."

राजस्व की उगाही

इकबाल मुनाफ़ और मातियास वाज़ के 42 साल के बेटे गोवा में जुए की लत का शिकार होने वाले परिवारों की कहानी बयां करते हैं. इनकी बढ़ती हुई तादाद परेशानी का सबब बनती जा रही है.

गोवा भारत का एक मात्र ऐसा राज्य है जहाँ जुआ कानूनी तरीके से खेला जा सकता है. साल 1999 में यहीं पर पहला कसीनो खोला गया था.

फ़िलहाल राज्य में ऐसे 15 कसीनो चल रहे हैं. उनमें पाँच ऐसे हैं जो मांडवी नदी में पानी के जहाज़ पर चलते हैं.

(शिक्षक के खाते में करोड़ों रुपये)

एक अनुमान के मुताबिक रोजाना 15 हजार मेहमान जुए के इन अड्डों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं. फलते-फूलते कसीनो उद्योग से गोवा की राज्य सरकार को 135 करोड़ रुपए से भी ज्यादा राजस्व की उगाही होती है.

सरकारी अधिकारियों का कहना है कि पिछले साल गोवा में खनन पर लगी सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद राजस्व के संकट से जूझते राज्य के लिए कसीनो से मिलने वाले टैक्स की रकम आमदनी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है.

अपराध और देह व्यापार

गोवा की राजनीतिक पार्टियां राज्य के कसीनो उद्योग के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे हैं.

उनका कहना है कि कसीनो कल्चर राज्य की स्थानीय संस्कृति को भ्रष्ट कर रहा है लेकिन हर आने वाली सरकार ने कसीनो को वाजिब ठहराने के लिए उससे मिलने वाले राजस्व का इस्तेमाल किया है.

(कसीनो कैपिटल)

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर जब विपक्ष में थे तब उन्होंने कहा था, "कसीनो अपराध और देह व्यापार को बढ़ावा देते हैं और जुए से कभी अच्छा पर्यटन नहीं पनप सकता है."

जुलाई में एक जनसभा में मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर ने कहा था, "हालांकि मैं निजी तौर पर कसीनो का विरोध करता हूँ लेकिन अगर मैं उन्हें बंद कर दूँ तो उसकी भरपाई कैसी की जाएगी?"

गोवा में हर साल 30 लाख सैलानी आते हैं. यहाँ आने वाले कई सैलानियों को ये कसीनो अपनी ओर खींचते हैं.

पर्यटन को नुकसान

जयदेव मोदी का डेल्टा कॉरपोरेशन तीन कसीनो का संचालन करता है. वे कहते हैं, "गोवा आने वाले कई सैलानी ख़ास तौर पर कसीनो में जुआ खेलने के लिए ही आते हैं. कई लोग ऐसे भी होते हैं जो गोवा आने पर कसीनो जाना जरूरी समझते हैं. हमारे कसीनो मनोरंजन, खाना, मस्ती और रात बाहर गुज़ारने के अड्डे हैं."

लेकिन कई स्थानीय ट्रैवल ऑपरेटर कहते हैं कि कसीनो टूरिज़्म से पर्यटन को नुकसान पहुँच रहा है.

ट्रैवल ऑपरेटर्स के समूह के मुखिया रैल्फ डिसूजा कहते हैं, "अगर हमने पर्यटन को बढ़ावा देने का अभियान वाजिब तरीके से नहीं चलाया तो आखिर में बताने के लिए केवल कसीनो ही रह जाएंगे और यह गोवा के लिए अच्छा प्रचार नहीं होगा."

लेकिन मंबई से गोवा आने वाले अतुल शाह जैसे सैलानियों के लिए कसीनो जाना एक जरूरी काम होता है.

पेशे से अकाउंटेंट अतुल कहते हैं, "आप को पता भी नहीं चलेगा कि नाव के बाहर सूरज किस तरह से ढल गया या फिर कब सुबह हो गई. नाव पर गजब का माहौल होता है. रोशनी, खाना-पीना, म्यूजिक सब कुछ होता है. अगर आपके पास पैसे हैं तो वहाँ आपके लिए बहुत कुछ हो रहा होता है."

कानून

लेकिन गोवा के कई बांशिदे कसीनो को लेकर सख्त कार्रवाई की माँग करते हैं.

शारदा एक गृहणी हैं. वह बताती हैं कि उन्होंने मुख्यमंत्री से कई बार स्थानीय लोगों के कसीनो जाने पर रोक लगाने वाला कानून लागू करने की माँग की है. मुख्यमंत्री ने इस कानून का वादा भी किया था.

फ़रवरी में शारदा ने पर्रीकर को चिट्ठी लिखकर बताया कि जुए की लत के शिकार उनके पति किस तरह से अक्सर रात को पीकर घर लौटते हैं और उन्हें और बच्चों को तकलीफ़ देते हैं.

पर्रीकर ने उन्हें ई-मेल पर जवाब दिया था कि स्थानीय लोगों के कसीनो जाने पर रोक लगाने वाला कानून लगभग एक महीने के भीतर अधिसूचना जारी होने के बाद लागू हो जाएगा.

इस वादे के आठ महीने हो चुके हैं. शारदा अभी भी इंतजार कर रही हैं.

(कुछ लोगों के नाम उनकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए बदल दिए गए हैं.)

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