चुनाव नतीजे: चमत्कार और सीत्कार के बीच चीत्कार

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निहितार्थ समझने-समझाने वाले लोग अक्सर वही होते हैं जो सांप निकल जाने पर लकीर पीटते हैं. सिर्फ मुहावरे की शक्ल में नहीं, असल जिंदगी में भी.

मैं भी वही करने जा रहा हूं. इस उम्मीद में कि शायद लकीरें इबारतें बन जाएं और लोग दीवार के साथ उन्हें भी पढ़ सकें. विधानसभा चुनावों के संदर्भ में.

इन चुनावों के सिलसिले में प्रतिक्रियाओं को तीन शब्दों में समेटा जा सकता है- चमत्कार, सीत्कार और चीत्कार. ये तीन शब्द चुनाव परिणामों के सारे पर्दे खोल देते हैं कि अर्थ-अनर्थ सब बाहर आ जाएं.

'आप' का चमत्कार

नतीजों का विस्तार छोड़ दीजिए तो दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने चमत्कार किया है. कल से पहले ‘आप’ की निजी खुशफहमी के अलावा किसी को य़कीन नहीं था कि सियासत ये भी कर सकती है.

अब सब खुर्दबीन लगाकर ढूंढें कि ‘आप’ ने ऐसा क्या किया, जो उन्होंने नहीं किया. नब्ज़ पर से हाथ कैसे हिल गया उनका, जिसके बारे में वो दावे करते नहीं अघाते थे.

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भारतीय जनता पार्टी के लिए दिल्ली पेट का ‘मीठा दर्द’ ही होगा कि ज़रा सा खोंग लग गया. 4-0 पर पहुंचते-पहुंचते रह गए.

काश! नब्ज़ टटोलने में डॉक्टर ने थोड़ा और फुर्ती दिखाई होती या फिर डॉक्टर को बुलाने में देरी न होती.

भाजपा का सीत्कार

दिल्ली के अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिए नतीजे संभोग के चरम की खुशी की तरह का सीत्कार ही हैं.

उसने जो चाहा और उसका ढोल पीटा, उसे मिल गया. भाजपाई क्षत्रप इसे एक तरह से देखेंगे और उसका ताज़ा केन्द्रीय नेतृत्व दूसरी तरह से. यानी कि सीत्कार के उच्छवास की व्याख्या होगी और उस पर खेल होगा.

रही सवा सौ साल पुरानी कांग्रेस की बात तो उनके हिस्से में केवल चीत्कार आया. वो भी स्यापा करने जैसा नहीं कि बुक्का फाड़कर रो लें. चिल्लाएं कि हाय! तुम चले गए.

कांग्रेस का चीत्कार

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उनका चीत्कार कुछ समय तक डरा-सहमा रहेगा, लेकिन देर-सबेर उसे फूट ही पड़ना है. जब फूटेगा तब पूरा परिवार हिल जाएगा. तब वह ‘एस्केप वेलॉसिटी’ से भी तेज़ भागेगा कि शायद पृथ्वी की कक्षा से ही बाहर निकल जाए.

स्वयं को ग्रह समझने वाली कांग्रेस अगर मामूली उपग्रह बन जाए, जो कक्षा से निकल जाने पर आमादा हो, तो चीख-पुकार लाजिमी है.

इंतजार कीजिए, ये बस होने ही वाला है क्योंकि उपग्रह से ग्रह बनना आसान नहीं है.

नए विकल्प की आहट

दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने य़कीनन विकल्प दिया, जिसकी धमक दीगर राज्यों में भी सुनाई देगी, बल्कि सुनाई पड़ने लगी है.

सिर्फ मध्य प्रदेश में दस से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में नोटा, यानी कि इनमें से कोई भी नहीं पर जीत के अंतर से ज्यादा वोट पड़े हैं.

मतलब ये कि विकल्प नहीं था वरना विकल्प नहीं था, वरना वोट भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस की जगह कहीं और जाता.

आंतरिक चुनौती

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उसी मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान ने भारतीय जनता पार्टी के सामने नरेन्द्र मोदी से बड़ी लकीर खींच दी है. मोदी की हैट्रिक से बड़ी.

इससे सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है कि लोकप्रिय होना किसे कहते हैं और उसे नापने का पैमाना क्या होगा. चौहान ने यह करिश्मा न केवल किया बल्कि कहा भी.

धन्यवाद देने आए तो नरेन्द्र मोदी से पहले लाल कृष्ण आडवाणी का नाम लिया. राजनाथ सिंह तीसरे नंबर पर.

शिवराज का राज!

शिवराज चलते चलते एक जुमला उछाल गए, जिसने भाजपा को सीत्कार के बीच में ज़रूर कोंच दिया होगा.

उन्होंने कहा कि ‘अब 2014 में दिल्ली में सरकार बनानी है क्योंकि मध्य प्रदेश के साथ बहुत अन्याय हुआ है’. इसका अर्थ समझने के लिए विद्वान, महाज्ञानी राजनीतिक पंडित होने की कोई ज़रूरत नहीं है.

जब नाक ऊंची हो तो नाक से बोलने की आवश्यकता नहीं होती.

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