बड़ा होकर दरिंदा बनने से रोक सकती है शिक्षा ?

भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा या प्रतिहिंसा नई नही है लेकिन इसकी चर्चा सार्वजनिक हो जाना ज़रूर जान पड़ता है.

क्या स्कूली शिक्षा एक ऐसा समाज बना सकती है जो महिलाओं के प्रति इस तरह से असंवेदनशील ना हो. तकनीकी रूप से इस मुद्दे से जुड़े लोगों की राय भिन्न भिन्न है..

स्कूल और लैंगिक संवेदनशीलता

दिल्ली में कुछ स्कूलों में लाइफ़ स्किल्स एजुकेशन के ज़रिए बच्चों को ये बताया जा रहा है कि लड़के औऱ लड़की होने का मतलब क्या है. कौन सा स्पर्श अच्छा है कौन सा बुरा और कब ज़रूरत है चुप्पी तोड़ने की.

लेकिन क्या हिंसात्मक प्रवृत्तियों को बदलने में शिक्षा वाकई इतनी कारगर हो सकती. केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएसई लैंगिक संवेदनशीलता को औपचारिक पाठ्यक्रम में शामिल करने की तैयारी कर चुका है.

बोर्ड की एक अधिकारी शिक्षा की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहती हैं कि ''अगर छोटी उम्र मे ही इस शिक्षा की शुरुआत की जाए तो हम ज़रूर एक पीढ़ी तैयार कर सकते हैं जो संवेदनशील हो और किसी भी परिस्थिति में हिंसा का सहारा ना ले.''

पर कुछ शिक्षाविद् ख़ुद इस बात से सहमत नहीं हैं कि शिक्षा को मनोवैज्ञानिक बदलाव का आधार बनाया जा सकता है.

स्कूली पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु तैयार करने वाली राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद के पूर्व निदेशक प्रोफेसर कृष्ण कुमार सवाल उठाते हैं कि ‘‘शिक्षा को समाज के बाक़ी ढांचे से अलग कैसे किया जा सकता है. ये किसी को संवेदनशील बनाने का मसला नहीं है. ये ताक़त के ढांचे को बदलने का मामला है.’’

शिक्षा का स्वरूप

Image caption शिक्षा का एक अहम उद्देश्य ये बताना है कि हिंसा सहना उससे उबरने का उपाय नही है.

इस विषय में एक बहुत बड़ा मसला ये है कि अगर पाठ्यक्रम में औपचारिक तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता के मुद्दे को शामिल कर भी लिया जाए तो उसका स्वरूप और संतुलन अपने आप में एक सवाल है.

पुरुष अधिकारों के लिए काम करने वाली बेंगलुरू की ज्योति तिवारी बहस के दूसरे हिस्से को सामने रखती हुए कहती हैं कि ''हिंसा की बात होती है तो सिर्फ़ औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा का ही मुद्दा बनता है. जब फ़िल्मी पर्दे पर हीरो दस लोगों को मारता है और लोग ताली पीटते हैं तो क्या आप हिंसा को बढ़ावा नहीं दे रहे होते.''

हिंसा औऱ प्रतिहिंसा के दौर से गुज़र रहे समाज में इन प्रवृत्तियों के ख़त्म हो जाने की बात करना दरअसल एक पूरे समाज की मन: स्थिति में बदलाव की बात करना है.

लेकिन इस बदलाव की शुरूआत होनी कहां से चाहिए. ऐसी कौन सी स्थितियां पैदा करने की ज़रूरत है जो वक्त के हिसाब से एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर सके जहां सकारात्मक बदलाव को जगह मिल सके.

मनोवैज्ञानिक डॉक्टर अचल भगत का कहना है कि इसकी पहली सीढ़ी परिवार है. ‘परिवार में औरतों के साथ जो व्यवहार होता है एक बच्चा वही समझ आगे समाज में लेकर जाता है. शिक्षा अहम है लेकिन पारिवारिक माहौल से आगे नहीं.’’

समाजशास्त्रीय नज़रिया

Image caption शिक्षा को अगर अहम हथियार मान भी लिया जाए तो सवाल है कि ये कितने लोगों को सुलभ है

हालांकि समाजशास्त्रियों की राय एक दूसरे से जुदा है. कुछ की राय में ये एक दौर है जो गुज़र जाएगा लेकिन कुछ का मानना है कि ये रूक रूक कर आगे बढ़ने से हासिल होने वाली मंज़िल नहीं है.

इलाहबाद के जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में समाजशास्त्री सी वी बद्रीनारायण कहते हैं कि ''एक पितृसत्तामक समाज में महिलाओं की बढ़ती सहभागिता के ख़िलाफ़ दिख रही इन हिंसक प्रवृत्तियों से निकल जाने का कोई शॉर्ट कट नहीं हो सकता.’’

लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर आनंद कुमार मानते हैं कि ''हम इंतज़ार करते रहते हैं निर्भया जैसी किसी घटना का.इंतज़ार करते रहने के बजाय एक चौतरफ़ा आंदोलन स्त्री-पुरुष संबंधों की इस हिंसात्मक सच्चाई को पलटने के लिए ज़रूरी है.’’

बदलाव ही वो शह है जो कभी नहीं बदलता. उसके आने से चाहे दरारें पड़ें, परंपराएं टूटें या फिर ढांचे दरक जाएं, नयापन अपनी जगह आप बना लेता है फिर उसका रास्ता हिंसा या प्रतिहिंसा से होकर ही क्या ना गुज़र रहा हो.

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