'हमें वेश्याओं की तरह देखने वाले शर्मिंदा हों'

  • 2 फरवरी 2016
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ज़रा साल 2009 को याद कीजिए. यह 'गे' इंडिया के लिए एक स्वर्णिम साल था. मुझे याद है कि मैंने अपने 20 साल पुराने साथी नवतेज को फ़ोन करके कहा, "अरे! अब हम क़ानूनी हो गए हैं." इसके मायने कुछ भी नहीं थे और इसके मायने सब कुछ थे.

(समलैंगिकता की पैरवी)

प्यार करने, महसूस करने और अपने होने के अहसास से देश का क़ानून हमें कभी भी रोक नहीं सका, कभी भी नहीं. हमारे दिल तो हमेशा से ही आज़ाद थे. भले ही देश इसके लिए आज़ाद न रहा हो.

अभिजात्य तबके से आने के कारण ही हमें यह आज़ादी मिली थी. हम 'उच्च वर्ग' से थे. हम महानगरीय संस्कृति और सुख-सुविधा में पले-बढ़े, दुनिया देखे हुए, जेस्युइट स्कूल में पढ़े, अंग्रेजी बोलने वाले छात्र थे. ये सही है कि हमारे पिता साठ के दशक के नौकरशाह थे. यानी उस दौर में जब हमारी परवरिश हो रही थी तब भी और आज भी हमारा जीवन विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का पर्याय था. ऐसे में हमने फिल्मों, थिएटर और साहित्य का सहारा लिया. अब हम अकेले नहीं थे.

फिर भी हम डरे हुए थे. शुरू में मैंने लड़कों की नकल करना सीखा. चलने से लेकर बोलने तक, तनकर चलना और रौबदार अंदाज़ में बातें करना. समलैंगिकों के लड़कियों जैसा होने के तानों से मैं परिचित था. मैंने आकर्षक महिलाओं के आस-पास भ्रमित और नाउम्मीद होकर मंडराते रहना भी शुरू किया. क्योंकि मैं डरा हुआ था.

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ज्यादातर लोग हेट्रोसेक्सुअल होते हैं. कुछ ही समलैंगिक होते हैं. उन लोगों की बड़ी संख्या है जिन्होंने शादियां कर लीं. क्योंकि वे भी डरे हुए थे. कहीं 'उन्हें' पता न चल जाए. 'उन्हें' यानी वे जो ये तय करना चाहते हैं कि हम कैसे रहें और क्या करें.

(समलैंगिकों का समारोह)

वह बहुमत जिसका कोई आकार नहीं पर हम सब जिनके ख़ौफ़ में जीते हैं, पुजारी, पुलिस, नौकरशाह, अभिभावक, भाई-बहन, चाचा-मामा, चाचियां-मामियां, चचेरे भाई-बहन, दोस्त, सहयोगी. 'उन्हें' कुछ छुपाने की ज़रूरत नहीं थी. वह आज़ाद थे. 'वह' समाज थे. दोराहे पर खड़े जीव हम थे. हमेशा डरे हुए. अंतर्मुखी होने को अभिशप्त.

किसी को भी यह समझ आ सकता है कि इसने कितनी शिद्दत से हमारी ज़िंदगी को प्रभावित किया. व्यक्तिगत और पेशेवर तौर पर. मैंने खुद भी अपने नौकरशाह परिवार को निराश करते हुए सिविल सर्विस को एक करियर के रूप में नहीं चुना. मैं खुद को झांसी या जोधपुर या जयपुर के 'गे' कलेक्टर साहब के रूप में नहीं देख पाता था. यह 'उनके' लिए था 'हमारे लिए' नहीं.

ऐसा माना जा सकता है कि करियर के रूप में पत्रकारिता उदार होगी. लेकिन तभी तक जब तक आपके अग्रणी-भारतीय-प्रकाशन का मुख्य संपादक एक संपादकीय बैठक में संभावित 'गे' कवर स्टोरी पर यह नहीं कहता, "... हमें मान लेना चाहिए. 'वे' विकृत हैं."

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जब तक कमअक्ल, हद दर्ज़े तक संकीर्ण, पेशेवराना दौड़ से बाहर, कुंठित सहकर्मी अगली संपादकीय बैठक में आप पर ज़हर बुझी टिप्पणियां करते हैं कि आप "तो मर्द भी नहीं हैं तो जो पर्याप्त मर्द हैं उनसे टक्कर क्यों?" और आप इस घटिया दर्जे के अपमान के ख़िलाफ़ उठकर खड़े होते है.

(एक रेडियो स्टेशन समलैंगिकों के लिए...)

अपमान के प्रतिकार में आप आख़िरकार पलटवार करने और तनकर खड़े होने को मजबूर होते हैं. यह फ़ैसला करने के बाद कि 'उनसे' अब नहीं डरना है. आपने उसे शक्तिविहीन कर दिया, जो हो उसे स्वीकार किया और उसे समझा दिया कि अब वह ब्लैकमेल न करे.

जिस पल आप उठ खड़े हुए आपके सारे प्रेत, असंख्य अविकसित 'वे', जिनके ख़ौफ़ में आप अपनी ज़्यादातर ज़िंदगी जीते रहे रोशनी आने पर डरे हुए चमगादड़ों की तरह भाग खड़े हुए. अचानक तुम्हारे ऊपर उनकी शक्ति ख़त्म हो गई. फिर साल 2009 आया. जब अचानक तुम्हें फिर से इंसान माना जाने लगा.

अब धारा 377 के अभियुक्त नहीं हमारे जैसे लोग अचानक कानूनी हो गए थे. हम नौकरशाह, सैन्य अधिकारी, मुख्यधारा से लोग हो सकते थे. मेरे जैसे लोग किसी व्यक्ति पर भेदभाव, अपमान के लिए मुकदमा कर सकते थे. 'मुख्य संपादक' जैसे लोग कानूनन उस बात के लिए शर्मिंदा हो सकते थे जो उन्होंने कही थी.

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रास्ते में खड़ी किसी वेश्या की तरह बर्ताव करने वाले लोगों को शर्मिंदा होना चाहिए था मेरे जैसे लोगों को नहीं. वे लोग गैरकानूनी थे. हम नहीं. बहुत कम समय के लिए साल 2009 में यह ललचाने वाली संभावना आज तक बनी रही. आज जबकि यह किसी काल्पनिक जीव की तरह गायब नहीं हो गई.

(सेक्शुएलिटी और सिनेमा)

कल तक मैं एक आज़ाद व्यक्ति था लेकिन आज फिर एक अपराधी बन गया हूं. अहमदियों, मुसलमानों, दलितों, कालों, स्त्री समलैंगिकों, इंटरसेक्सर्स और यहूदियों जैसे अल्पसंख्यकों की अलग-थलग बस्ती तक हम सिर झुकाकर चले. गुजरात हो या मुज़फ़्फ़रनगर, इस राजनीतिक विमर्श को मानने वालों के लिए एड्स एक 'विदेशी बीमारी' है.

समलैंगिकता एक 'पश्चिम' से आयात की गई बीमारी है. तमाम स्वतंत्र विचारों वाले गुरुओं को लगता है कि यह 'राष्ट्रीय हित' में है कि बेडरूम की निगरानी की जाए और समलैंगिकों का 'इलाज' किया जाए और उनके यौन विचारों को बदला जाए.

आखिरकार कार्यकारिणी, विधायिका, न्यायपालिका सभी उसी सामाजिक ढांचे की उपज हैं जिससे ये बाबा और बकवादी निकले हैं. उनकी दुनिया में अलग-से नज़र आने वाले या अंतर को स्वीकार करने की जगह ही नहीं है. अब सुप्रीम कोर्ट ने हमें फिर वहीं पहुँचा दिया जहाँ वर्ष 1860 में अँग्रेज़ शासकों ने पहुँचाया था, अपराधियों की श्रेणी में.

तो आगे क्या? क्या अब हमारी त्वचाओं पर पिंक टैटू गोदे जाएँगे और हमें गैस चैम्बर में पहुँचाया जाएगा? हम जैसे लोगों के लिए जो क़ानून की नज़र में अपराधी हैं? एक बार फिर से...

(डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता सुनील मेहरा ने बीबीसी हिंदी के लिए ये लेख दिसंबर 2013 में लिखा था. ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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