झारखंड: रेत पर फिसलती गरीबों की जिंदगी

झारखंड रेत खनन

'' पखवाड़े भर से सच पूछिए तो हमारी जिंदगी रेत की तरह फिसल रही है,'' दिहाड़ी मजदूर रोशन मुंडा एक सांस में इतना बोल क्षण भर के लिए चुप हो जाते हैं. दरअसल पूरे झारखंड में बालू का उठाव बंद होने से दिहाड़ी मजदूरों को बड़ी मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है. यह स्थिति सरकार के एक फ़ैसले से बनी है.

(नहीं मिल रहा है न्यूनतम वेतन)

हालांकि इस फ़ैसले का विरोध भी तेज़ है. विरोध का सीधा असर सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर दिखने लगा है. नगड़ी से काम की तलाश में राजधानी आई कुसुम कहती हैं, "बाबू, बालू की वजह से ही निवाले पर आफ़त आन पड़ी है."

इबरार अंसारी राज मिस्त्री हैं. वो कहते हैं, "ना जाने किसने हमारे पेशे का नाम दिया राज मिस्त्री. बालू ने तो भूखमरी की नौबत ला दी है. गांव छोड़ शहर आए अब किधर पलायन करें."

रोजगार और पलायन

अनुसूचित जाति क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले राजद के विधायक जनार्दन पासवान कहते हैं कि शहर, गांव हो या कस्बे पूरे राज्य में आदिवासी और अनुसूचित जाति के मजदूर त्रासद स्थिति में हैं.

पखवाड़े भर से राज्य भर में बालू का उठाव बंद है. इससे लाखों मजदूर फांका काटने को विवश हैं. रोजगार के अभाव में वे तेजी से पलायन कर रहे हैं. स्थानीय लोग व दर्जन भर व्यवसायिक संगठन बाहरी कंपनियों को बालू घाटों का ठेका देने पर विरोध जता रहे हैं.

(अलग बसाने को लेकर झरिया बंद)

इस बीच सरकार में शामिल राष्ट्रीय जनता दल के पांच विधायकों ने मुख्यमंत्री से मिलकर फ़ैसला बदलने की चेतावनी दी है. राजद विधायकों ने कहा है कि ऐसा नहीं होने से सरकार से वेलोग समर्थन वापस ले लेंगे. सरकार में शामिल कांग्रेस के अंदर भी फ़ैसले को लेकर ना-नुकुर हो रही है. लिहाजा मुख्यमंत्री घटक दलों के दबाव में हैं.

सरकार ने बालू घाटों की नीलामी का निर्णय लिया है. इसी निर्णय के तहत खुली बोली पर राज्य के 694 बालू घाटों की नीलामी हो रही हैं. अब तक जिन घाटों की नीलामी हुई हैं उनमें अधिकतर बाहर की कंपनियां ही बोली लगाने में सफल हुई हैं. पिछले सात दिसंबर को पलामू के 16 घाटों की नीलामी हुई थी.

मुंबई की दी मिल्स स्टार कंपनी सभी 16 घाट का ठेका 3.14 करोड़ में लेने में सफल रही. पलामू में कुल 40 बालू घाट हैं. इनमें 37 घाट बाहर की कंपनियां लेने में सफल रही हैं. पाकुड़, खूंटी, रांची जैसे आदिवासी बहुल ज़िलों में भी बाहर की कंपनियां नीलामी लेने में सफल रही हैं.

स्थानीय मजदूर

पलामू के स्थानीय बालू ठेकेदार कुमार आनंद सिंह कहते हैं बाहर की कंपनियां पैसे की इतनी अधिक बोली लगती हैं, जिसमें स्थानीय लोग टिकते नहीं.

पतरातू बालू घाट संघ के अध्यक्ष विनोद साहु कहते हैं, "इसका डर ज्यादा है. बाहर की कंपनियां मशीनों के जरिए बालू का उठाव करेंगी तो स्थानीय मजदूरों का क्या होगा?"

(झारखंड की आदिवासी लड़कियाँ)

राज्य सरकार के खनन निदेशक बीबी सिंह बताते हैं कि अभी तक दस जिलों में नीलामी की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है.

मुंबई की कंपनी ही अधिकतर घाटों का बंदोबस्ती ले रही है, इस सवाल पर वे कहते हैं, "नीलामी के लिए नियमावली बनाई गई है. इसी के तहत ज़िलों के उपायुक्त बालू घाटों की नीलामी करा रहे हैं. बालू उठाने के लिए पर्यावरण अनापत्ति प्रमाण पत्र भी लेने होंगे. नीलामी की अस्सी फीसदी राशि ग्राम सभाओं को ही दिेए जाएंगे.

पहले बालू का उठाव कैसे होता था, सवाल पर खान निदेशक बताते हैं कि ग्राम सभाओं के ज़रिए बालू उठाए जाते थे.

झारखंड ट्रक आनर एसोसिएशन के अध्यक्ष उदयशंकर ओझा कहते हैं, "सरकार के इस फ़ैसले ने तीन लाख गरीब मजदूरों और पांच हजार से अधिक स्थानीय कारोबारियों को मुश्किल में डाला है. बालू घाटों की नीलामी तो हो रही है लेकिन पर्यावरण क्लीयरेंस देने का काम ठप है."

राज्य की अर्थव्यवस्था

झारखंड चैंबर आफ़ कामर्स के अध्यक्ष विकास सिंह के मुताबिक बालू का उठाव नहीं होने से राज्य भर में निर्माण कार्य ठप हैं. बालू नहीं मिलने से भवन निर्माण के अन्य सामानों की बिक्री ठप हैं. रियल इस्टेट के काम भी प्रभावित हो रहे हैं.

(ये खाद्य सुरक्षा भला क्या चीज है?)

बालू घाटों की नीलामी हो रही हैं, लेकिन बालू के दर क्या होंगे, इसे तय नहीं किए जा रहे. इसके दूरगामी व विपरीत असर पड़ सकते हैं. अर्थशास्त्री प्रोफेसर रमेश शरण का कहना है कि जिस तरह से रोज़गार का संकट खड़ा हुआ है, इससे राज्य की अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ेगा.

सामाजिक कार्यकर्ता और पंचायत राज विस्तार अधिनियम ( पेसा एक्ट) के जानकार रतन तिर्की के मुताबिक झारखंड में इस कानून का सीधे तौर पर उल्लंघन हो रहा है. शिड्यूल एरिया के नाते लघु खनिज का उठाव बिना ग्राम सभा और उनके प्रधान की अनुमति के बिना नहीं हो सकता. यह आदिवासियों के हक और अधिकार का हनन भी है.

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