लॉ इंटर्न मामलाः क्या कर रही है दिल्ली पुलिस?

दिल्ली पुलिस मुख्यालय

महिला इंटर्न के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न के आरोपों में घिरे उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अशोक कुमार गांगुली का मामला शुक्रवार को संसद में भी गूंजा.

लोकसभा में भाजपा ने मांग थी कि अगर गांगुली पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा नहीं देते हैं तो उन्हें तुरंत बर्ख़ास्त कर दिया जाना चाहिए.

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा, "जस्टिस गांगुली एक पल के लिए भी अपने पद पर नहीं बने रह सकते हैं."

जनता दल यूनाइटेड के नेता शरद यादव और तृणमूल कांग्रेस के नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने भी ने सुषमा की मांग का समर्थन किया.

शरद यादव ने कहा, "अगर इन आरोपों में सच्चाई है तो उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना चाहिए. और इस मामले में कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए."

राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने जस्टिस गांगुली को गिरफ़्तार किए जाने की मांग करते हुए हंगामा किया.

क्या कर रही है दिल्ली पुलिस?

अब सवाल उठता है कि इस मामले में दिल्ली पुलिस क्या कर रही है.

इस बारे में बीबीसी ने इस मामले को देख रहे दिल्ली पुलिस के उपायुक्त एसबीएस त्यागी से बात की.

इस मामले में दिल्ली पुलिस ने अब तक क्या कार्रवाई की है?

हमने लड़की से संपर्क किया था. उन्होंने कहा कि अभी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की जाँच चल रही है और वो किसी अन्य जाँच शामिल नहीं होंगी.

पाँच दिसंबर को जब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी वेबसाइट पर डाल दिया कि वो इस मामले में आगे कोई कार्रवाई नहीं कर रहे हैं तो फिर हमने लड़की से संपर्क किया. लड़की ने कहा कि वो अभी सफ़र कर रही हैं और अपना कार्यक्रम देखने के बाद वो हमें बताएंगी कि कब हम उनसे संपर्क स्थापित कर सकते हैं.

क्या इस मामले में लड़की की तरफ औपचारिक शिकायत की ज़रूरत है?

हमको अभी तक पता नहीं है कि लड़की के साथ हुआ क्या है. लड़की के बयान के बाद ही हम आगे की कार्रवाई शुरू कर सकते हैं. महज ब्लॉग लिखने से बात नहीं बनेगी. ब्लॉग में जो कुछ कहा गया है उसके आधार पर आप यह निर्धारित नहीं कर सकते कि यह आईपीसी के तहत किस श्रेणी का अपराध है.

साथ ही इस बात की पुष्टि कौन करेगा कि ब्लॉग उसी लड़की ने लिखा है. हो सकता है कि लड़की की तरफ से किसी और ने इस ब्लॉग को पोस्ट किया हो?

सुप्रीम कोर्ट की समिति की रिपोर्ट की कॉपी हमें नहीं मिली है. केवल लड़की और संबंधित जज को ही रिपोर्ट की कॉपी मिली है.

क्या है शिकायतकर्ता की समस्या?

जानी-मानी महिला अधिकार कार्यकर्ता कविता कृष्णन का कहना है कि इस मामले में शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने के बजाए हमारी कोशिश संस्थाओं पर दबाव बढ़ाने की होनी चाहिए.

इस पूरे मामले में लड़की सामने क्यों नहीं आ रही हैं?

लड़की सामने आई है और उसने सुप्रीम कोर्ट के पैनल के सामने अपनी सारी बातें रखी भी हैं. अब बाक़ी संस्थाओं की क्या ज़िम्मेदारी होगी, उस पर फ़ोकस करने की ज़रूरत है.

मुझे लगता है कि इस मामले से सामने आते ही अगर न्यायपालिका से जुड़े रहे लोगों ने राजनीतिक षड़यंत्र जैसे आरोप न लगाए होते तो संभव है कि वो लड़की सामने आती.

डर का माहौल बना हुआ है. यह मामला सालों तक चलेगा और इतने दिनों तक हर रोज़ उस लड़की का चरित्र हनन होगा. यानी आपका सारा जीवन इसी मामले से परिभाषित हो जाएगा. कितनी महिलाएँ इसके लिए तैयार हैं?

इस बारे में क़ानून होने के बावजूद महिलाएं सामने क्यों नहीं आ रही हैं?

क़ानून बनाना ही काफ़ी नहीं है. हम सबकी ज़िम्मेदारी माहौल बदलने की होनी चाहिए. जब तक हम उन्हें यह गारंटी नहीं दे पाएं कि उन्हें इस मामले में रोज़-रोज़ की पीड़ा से नहीं गुजरना पड़ेगा, तब तक माहौल बदलना संभव नहीं है.

इस मामले में राष्ट्रपति स्वतः संज्ञान लेते हुए महाभियोग की प्रक्रिया क्यों नहीं शुरू कर सकते? दूसरी बात यह है कि जिस संस्थान में वो लड़की क़ानून की पढ़ाई कर रही थी वहाँ विशाखा समिति क्यों नहीं थी.

अगर उस संस्थान में विशाखा समिति होती तो वो लड़की वहाँ जाकर शिकायत कर सकती थी. उस संस्थान ने अपने शिक्षकों के पैनल में अब भी जस्टिस गांगुली को क्यों रखा हैं? कम से कम उन्हें हटा तो दें.

क्या पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर एफ़आईआर दर्ज कर सकती है?

बिल्कुल कर सकती है. लेकिन इसके लिए पुलिस को शिकायतकर्ता की मदद की ज़रूरत पड़ेगी. अपने ब्लॉग में उन्होंने इस बात का विस्तार से उल्लेख किया है कि उन्होंने औपचारिक शिकायत क्यों नहीं की. हमारी कोशिश उन पर दबाव बढ़ाने के बजाए संस्थाओं पर दबाव बढ़ाने की होनी चाहिए.

क्या हैं राजनीतिक दावपेंच?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गांगुली को उनके पद से हटाने का औपचारिक अनुरोध किया है.

सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद ममता बनर्जी ने ही जस्टिस गांगुली को राज्य मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया था.

लेकिन सरकार के ऊपर मानवाधिकार हनन के एक के बाद एक आरोप लगते रहे हैं और हर एक आरोप में जस्टिस गांगुली राज्य सरकार को दोषी ठहराते रहे हैं.

नतीजतन, किसी मामले में सरकार को जुर्माना भरना पड़ा तो किसी मामले में आला अधिकारियों को सुनवाई के लिए आयोग में बुलाया गया.

इतना ही नहीं, धीरे-धीरे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी जस्टिस गांगुली के ख़िलाफ़ खुलकर बोलने लगीं.

ममता बनर्जी का कहना है, ''हमने ही उन्हें मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष बनाया और अब वो ही सरकार के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने लगे हैं.''

यही वजह है कि ममता बनर्जी मानवाधिकार आयोग के किसी भी कार्यक्रम में शामिल नहीं होती हैं.

(दिल्ली पुलिस के डीसीपी एसबीएस त्यागी से बात की बीबीसी संवाददाता अनुराग शर्मा ने और कविता कृष्णन से बात की बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्या ने)

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