भारत का 'चुप्पा विकास' जो किसी को नहीं दिखा: ज्यां द्रेज

उस वक्त को गुजरे ज़्यादा दिन नहीं हुए जब भारत के सबसे ग़रीब ज़िलों में बुनियादी सुविधाएं बहुत कम और विरल थीं. ज़्यादातर लोग अपने हालात के भरोसे थे. इनमें से कुछ लोगों को भरे-पूरे प्राकृतिक वातावरण का संग-साथ हासिल था और शायद उनकी जिन्दगी में वह आज़ादी और उत्साह भी था जो आज खो गया है.

लेकिन अन्य बहुत से लोग भूख, असुरक्षा और शोषण के साये में रहते थे और वक्त-ज़रूरत उनकी मदद के लिए कोई सरकारी सुविधा नहीं थी. बहुत से गांवों में कोई स्कूल, स्वास्थ्य-केंद्र और सरकारी राशन की दुकान नहीं थी, न ही गांव तक पहुंचने का संपर्क-मार्ग था; डाकघर, बिजली और यहां तक कि पेयजल का भी कोई सुलभ स्रोत उपलब्ध नहीं था.

अगर कोई आंगनबाड़ी केंद्र था भी तो अक्सर बंद ही मिलता था. आस-पास सरकारी महकमे में ऐसा कोई काम भी नहीं होता था जिससे रोज़गार मिले. विधवाओं और बुजुर्गों को पेंशन भी नहीं मिलती थी.

(मिड डे मील योजना का सफ़र)

हाल फ़िलहाल का गुजरा वक्त

जरा थमकर सोचें तो जान पड़ेगा कि यहां जिस ‘गुज़रे वक्त’ की बात हो रही है वह एकदम से हाल-फ़िलहाल ही का है, 1990 के दशक के मध्यवर्ती सालों का, जब देश के सबसे गरीब ज़िलों की दुर्दशा का मार्मिक चित्र पत्रकार पी साईनाथ ने अपनी किताब 'एवरीबॉडी लव्स् अ गुड ड्राऊट' में खींचा था.

यह दावा करना कि स्थिति बुनियादी तौर पर बदल चुकी है, एक भारी भ्रांति होगी. फिर भी, तस्वीर पहले जैसी नहीं रही. ना सिर्फ सार्वजनिक सुविधाएं लगातार बढ़ती गई हैं बल्कि लोगों में इन सुविधाओं को लेकर नई आकांक्षाएं जन्म ले रही हैं और वे ज़्यादा की मांग कर रहे हैं.

धीरे-धीरे (दरअसल बहुत ही धीरे!) लेकिन पक्के तौर पर लोगों की बुनियादी जरूरत की सामाजिक ज़िम्मेदारी का सिद्धांत अपनी जड़ें जमा रहा है.

बीते दस सालों में छात्र-स्वयंसेवकों ने देश के विभिन्न भागों में लगातार फ़ील्ड-सर्वे किया है. कभी इन लोगों ने स्कूल या स्वास्थ्य केंद्रों का मुआयना किया है तो कभी 'मनरेगा' (महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम) और सार्वजनिक वितरण प्रणाली का. बीतते वक्त के साथ हमने देखा है कि बहुत कुछ बदला है - और अक्सर - यह बदलाव बेहतरी की दिशा में हुआ है.

मुख्यधारा की मीडिया से निराशावादी तस्वीर चाहे ही उभरती हो मगर ज़मीनी सच्चाई उससे हटकर है. जब कहीं कुछ गलत हो रहा हो तो मीडिया उस बात को जोरशोर से कहे, यह अच्छी बात है ही.

चुपके से हुई प्रगति

लेकिन खोज-खोज कर गंदगी देखने-दिखाने के इस चलन के बीच एक चीज नजर से ओझल हो जाती है. और, यह चीज है वह चुप्पा प्रगति जो कई राज्यों ने अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के मामले में हासिल की है.

सर्वेक्षण की इस शृंखला की आखिरी कड़ी, जिसका नाम पब्लिक इवैल्यूशन ऑव एन्टाइटलमेंट प्रोग्राम (“PEEP”, यानी झलक) था, साल 2013 के मई-जून महीने में संपन्न हुई. आईआईटी दिल्ली की तरफ से किया गया यह सर्वेक्षण देश के दस राज्यों बिहार, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओड़िशा, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में हुआ.

सर्वेक्षण में प्रत्येक राज्य के दो सबसे गरीब ज़िलों पर ध्यान केंद्रित किया गया और इन ज़िलों में हकदारी आधारित पाँच कार्यक्रमों- समेकित बाल विकास सेवा, मध्याह्न भोजन, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम तथा सामाजिक सुरक्षा पेंशन का जायजा लिया गया. इस चित्र-लेख में सर्वेक्षण से हासिल कुछ अंतर्दृष्टियों की चर्चा की गई है.

सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था का सच

इस सर्वेक्षण में शामिल ज़िलों में एक है छत्तीसगढ़ का सरगुजा जिला. बीते बारह सालों में मैं इस इलाके में समय-समय पर जाता रहा हूं. पहली बार जब सन् 2001 में मैं विकास कार्यक्रमों का जायज़ा लेने के लिए वहां पहुंचा था तो बड़ी मुश्किल से “अक्षमता, भ्रष्टाचार और शोषण के उस सागर में छिटपुट सफलता के चंद टापूओं” को लक्ष्य कर पाया था.

ज़्यादातर गांव बुनियादी सुविधाओं मसलन संपर्क-मार्ग, सरकारी राशन दुकान या बिजली की सुविधा से वंचित थे. आज इन सुविधाओं की उम्मीद रोज़मर्रा के तर्ज़ पर की जाती है. सरगुजा के ज़्यादातर गांवों में सरकारी राशन दुकान बड़ी बेहतरी से चल रहे हैं और वहां से एक औसत परिवार को नाम-मात्र की कीमत पर 35 किलो चावल प्रतिमाह मिलता है. अधिकतर परिवारों के पास जॉब-कार्ड भी है और ये परिवार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के अंतर्गत स्थानीय स्तर पर होने वाले सरकारी काम में कोई ना कोई रोजगार पाने में समर्थ हैं.

(मनरेगा से किसका फ़ायदा, किसका नुकसान)

अधिकतर बच्चे स्कूल जाते हैं वहां उन्हें ठीक-ठाक मध्याह्न भोजन मिलता है. कई विधवाओं और बुजुर्गों को पेंशन मिलती है, भले ही रकम छोटी हो लेकिन यह उनके लिए बहुत मूल्यवान है. सरगुजा कोई स्वीडन या फिर कनाडा नहीं है लेकिन इन हकदारियों ने यहां के लोगों की ज़िदगी में कुछ ना कुछ मूल्यवान जोड़ा है, और भविष्य की तरफ देखें तो लगेगा सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था की भावी नींव पड़ गई है.

यह बात जरूर है कि हर गरीब ज़िले में सरगुजा सरीखी बेहतरी नहीं आई है. यहां तक कि छत्तीसगढ़ में भी, खासकर इसके दक्षिण की तरफ ऐसे इलाके हैं जहां लोग राज्यसत्ता को किसी भयावह फ़ॉरेस्टगार्ड या पुलिसवाले के भेष में पहचानते हैं. ऐसी जगहों पर राज्यसत्ता से लोगों की पहचान शायद ही कभी आंगनबाड़ी-सेविका की मुस्कुराती शक्ल के ज़रिए बनती है.

नहीं सुधरने वाले राज्य

अगर पूरे देश पर नजर डालें तो एकदम से चकित कर देने वाली विभिन्नता मिलती है. सार्वजनिक सुविधाओं के समानतापूर्ण और कारगर वितरण के मामले में कुछ राज्यों, मिसाल के लिए तमिलनाडु, का रिकार्ड बहुत अच्छा है तो कुछ राज्य, जैसे उत्तरप्रदेश, इस मामले में ‘हम नहीं सुधरेंगे’ की नज़ीर पेश करते हैं.

ज़्यादातर राज्यों की स्थिति इन दो ध्रुवो के बीच में कहीं हैं – कुछ मामलों में वहां सुधार दिखाई देता है तो कुछ मामलों में ठहराव या फिर गिरावट. बहरहाल, इस विभिन्नता के बावजूद एक महत्वपूर्ण बात सामने आई है: राज्यों ने जैसा बोया है, वैसा ही काटेंगे.

इस अर्थ में कि चीजों को चलाने-बनाने के लिए गंभीर प्रयत्न किए जाएं तो उनका परिणाम निकलता है. यहां तक कि भ्रष्टाचार या फिर ढुलमुल शासन के लिए कुख्यात हो चले राज्य जैसे ओड़िशा (और फिर इस श्रेणी में छत्तीसगढ़ का भी नाम लिया जा सकता है), ने साबित किया है कि बेहतरी की दिशा में बदलाव संभव है. हाल के अनुभवों से यह भी जान पड़ता है कि प्रगति मुख्य रूप से लोकतांत्रिक संघर्ष के बूते हासिल हुई है.

बांग्लादेश से भी पिछड़ा भारत

कहने की जरूरत नहीं कि लोगों के संविधानप्रदत्त बुनियादी अधिकारों को पूरा करने की दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है. मिसाल के तौर पर, यह बात सचमुच अच्छी है कि देश भर में बच्चे (लड़कियां और लड़के) झुंड के झुंड स्कूल जा रहे हैं लेकिन स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता बहुत ख़राब है.

ठीक इसी तरह, टीकाकरण का दायरा हाल के सालों में बहुत ज़्यादा विस्तृत हुआ है लेकिन इस मामले में भारत अब भी बांग्लादेश से पीछे है.

सर्वेक्षण से हासिल सबूतों से अगर कोई आशा बंधती है तो यही कि पर्याप्त संसाधन, राजनीतिक सहयोग और खुले दिमाग के बूते सार्वजनिक सुविधाओं में सुधार लाया जा सकता है और वह भी अप्रत्याशित तेज़ी के साथ. इसके उलट, उपेक्षा का बरताव करने पर कड़ा दंड भुगतना पड़ सकता है जैसा कि मनरेगा में हालिया गिरावट से जाहिर होता है.

सकारात्मक रुझान जारी रहें - इस बात को सुनिश्चित करने का एकमात्र तरीका लोकतांत्रिक संघर्ष को लगातार जारी रखना है.

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