हर नीली कमीज़ में अन्नू को ढूंढती हैं सुशाना

  • 21 दिसंबर 2013
सुशाना किसपोट्टा

नीली कमीज़ पहने किसी भी गोरे बच्चे को देख उनके पांव ठिठक जाते हैं. हाथ बढ़ जाते हैं लेकिन क्षण भर में अहसास होता है अरे यह अन्नू नहीं. फिर वो ज़िंदगी के संघर्ष में तेज़ी से शामिल हो जाती हैं. यह जानते-समझते हुए कि यही हक़ीकत है और तकदीर का फ़साना भी.

सोलह-सत्रह की उम्र में कई सपने संजोए झारखंड के एक सुदूर गांव से आदिवासी युवती सुशाना किसपोट्टा ने शहर आने का फैसला लिया, तो ज़ेहन में रत्ती भर का अहसास नहीं था कि शहर ग़म भी देगा.

छह-सात घंटे नर्सिंग की पढ़ाई, फिर आठ घंटे की नाइट ड्यूटी. घर आना, बर्तन, कपड़े धोना और लकड़ी के चूल्हे पर खाना पकाना. भाई-भतीजे से पढ़ाई के बारे में पूछना. छोटी भतीजी को स्कूल के लिए तैयार करना. कुछ घंटे की नींद और फिर घर से निकल जाना.

सुशाना झारखंड के सिमडेगा ज़िले के एक सुदूर गांव की रहने वाली हैं. करीब आठ साल पहले वो गांव से राजधानी रांची आई थीं. छात्रावास में रहकर बारहवीं की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद किराए के एक कमरे में रहकर नर्सिंग (जीएनएम कोर्स) की पढ़ाई करने लगीं.

गांव में खेती-बाड़ी करने वाले अपने बड़े भाई अगापित किसपोट्टा के दो बेटे रंजीत और अनूप को भी वे अपने साथ ले आईं. इस मक़सद से कि बच्चे पढ़ जाएंगे. उन्होंने दोनों बच्चों का निजी स्कूलों में दाखिला दिलाया.

नौकरी

ख़ुद का ख़र्च निकालने और बच्चों की परवरिश के लिए सुशाना ने निजी नर्सिंग होम में मामूली तनख़्वाह पर नौकरी कर ली. नौकरी के साथ ही वे पोस्ट बीएससी सह नर्सिंग की पढ़ाई कर रही हैं. आठ जुलाई 2010 को उनके भतीजे छह वर्षीय रंजीत किसपोट्टा और चार वर्षीय अनूप उर्फ़ अन्नू स्कूल गए थे.

शाम को सुशाना ड्यूटी से लौटीं, तो बच्चे कमरे में नहीं थे. उन्होंने मुहल्ले की हर गली में बच्चों को तलाशा पर वे नहीं मिले. इसके बाद वे रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन गईं. फिर भी बच्चे नहीं मिले.

हमें सुशाना का ठिकाना ढूंढने में कई दिन लगे. दरअसल वे जिस मुहल्ले में रहती थीं, उसे दो साल पहले ही उन्होंने छोड़ दिया था. उनके छोटे भाई बेंजामिन के बारे में पता चला तो उनसे बात कीं. उन्होंने उनका नया पता बताया.

शाम के वक़्त शहर के एक तंग इलाक़े में हम सुशाना से मिलने पहुंचे तो पता चला कि वे नर्सिंग की क्लास के बाद नाइट ड्यूटी पर चली जाएंगी. लिहाज़ा मुलाक़ात संभव नहीं है. सुबह उनसे मुलाकात हुई. वो पैदल चलकर ही घर पहुंची थीं. चेहरे पर थकान के भाव स्पष्ट थे, लेकिन उन्हें छिपाने की भरसक कोशिश भी करती रहीं.

वह रोज़ छह से आठ किलोमीटर पैदल चलती हैं. दरअसल पास में इतने पैसे नहीं होते कि हमेशा ऑटो से आ-जा सकें. हालांकि उन्होंने एक स्कूटी खरीदी है लेकिन उसका इस्तेमाल बेहद ज़रूरी कामों में किया जाता है.

सीबीआई जांच

सुशाना बताती हैं कि आठ जुलाई 2010 की घटना ने उनकी ज़िंदगी को नए मोड़ पर ला छोड़ा है. उसी दिन उनके दोनों मासूम भतीजे ग़ायब हुए थे. वह दिन भूलना मुश्किल होगा जब शहर के मुहल्ले में वह अकेली पड़ गई थीं. बच्चे जिस स्कूल में पढ़ते थे, वहां के शिक्षकों को लेकर वे थाने पहुंचीं. पहले दिन पुलिस ने आवेदन ही नहीं लिए.

फिर मामला दर्ज हुआ, लेकिन न जाने पुलिस की कितनी बातें सुननी पड़ीं. सुशाना कहती हैं जब भी थाने जातीं, पुलिस वाले यूं झटकते मानो मैंने ही गुनाह किया है. कुछ युवकों पर शक भी ज़ाहिर किए तो पुलिस ने महिला होने के नाते उन्हें ही कई ताने दिए. वो कहती हैं, "अच्छा होगा न ही कुरेदें उन बीते लम्हों को..."

सुशाना बताती हैं एक वकील जीए सांगा ने उनकी मदद की. उनकी सहायता से वह हाइकोर्ट पहुंचीं. कोर्ट के आदेश पर सीबीआई जांच बैठी, लेकिन अब तक बच्चों का कोई सुराग़ नहीं मिला है. इस मामले में 11 सितंबर 2012 को सीबीआई ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की है.

सीबीआई टीम एक बार सिमेडगा स्थित उनके गांव भी गई थी. उनसे भी पूछताछ की है. सुशाना कहती हैं, "साथ में काम करने वाली नर्स कहती हैं कि सीबीआई की जांच तह तक होती है लेकिन रंजीत, अनूप के मामले में तो सीबीआई का तर्जुबा काम नहीं आ रहा."

गुम बच्चों की फ़ोटो

दोनों बच्चों के ग़ायब होने के बाद सुशाना अपने छोटे भाई बेंजामिन और गुम बच्चों के एक अन्य भाई आनंद असीम और भतीजी अश्रुति किसपोट्टा को लेकर शहर आईं. दोनों बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाया. बेंजामिन दसवीं की पढ़ाई कर रहे हैं. आनंद असीम पांचवीं और अश्रुति नर्सरी में पढ़ रही हैं.

फ़ुर्सत मिलने पर सुशाना बच्चों को पढ़ाती भी हैं. हम जिस दिन सुशाना से मिले, गांव से उनकी भाभी रजनी किसपोट्टा आईं थीं. उन्होंने बताया कि वह बच्चों से मिलने और घर का चावल देने आईं हैं. रजनी कहती हैं, "पूरा घर-परिवार सुशाना की मेहनत पर टिका है."

बच्चों के साथ दो-चार दिन रहकर वे फिर गांव लौट जाएंगी. रजनी बताती हैं कि बहुत पहले सुशाना के सिर से पिता का साया उठ चुका है. उनके भाई बेंजामिन बताते हैं कि दीदी और वे अपने पर्स में हमेशा गुम बच्चों की फोटो रखते हैं. इस उम्मीद में कि कभी राह चलते कोई ख़बर मिल जाए.

संघषों के बीच मन में क्या कुछ चलता है, क्या शादी के बारे कभी सोचा है? इस सवाल पर सुशाना कहती हैं कि भाई और बच्चे पढ़ें, पहली प्राथमिकता यही है. वह महसूस करती हैं कि उनकी सेहत बहुत गिरी है, कई बार मन घबरा जाता है. फिर भाई बेंजामिन का साथ पाकर वो तेज़ी से संभलती हैं.

हेल्पलाइन

वह सवालिया लहजे में कहती हैं, "तमाम संघर्षों से जीत जाने का माद्दा है लेकिन दो भतीजों के ग़ायब होने की टीस न जाने कब तक तक सताएगी."

झारखंड के शहरों-गांवों से बच्चों के ग़ायब होने का सिलसिला बढ़ता जा रहा है. सीआइडी रिपोर्ट बताती है कि 2008 से 2012 तक 18 वर्ष से कम उम्र के 1966 बच्चे-बच्चियां लापता हुए हैं. इस साल के सितंबर महीने तक 292 बच्चों के लापता होने के मामले दर्ज किए गए हैं.

गुमला के एक मुहल्ले से 2008 में आकाश राज समेत तीन बच्चों के लापता होने के मामले में भी सीबीआई जांच हो रही है, लेकिन अब तक उनका पता नहीं लगा है. इसी तरह खूंटी जिले के मुरहू प्रखंड से दर्जन भर बच्चियां वर्षों से लापता हैं. हालांकि अपराध अनुसंधान विभाग को यह भी रिपोर्ट मिली है कि 800 से अधिक बच्चे वापस मिल गए हैं.

लापता बच्चों के बारे में जानकारी हासिल करने व आवश्यक कार्रवाई के लिए सीआईडी, यूनीसेफ़ और ग़ैरसरकारी संगठन 'दीया सेवा संस्था' की ओर से साझा तौर पर एक हेल्पलाइन शुरू की गई है.

ट्रैकिंग सिस्टम

21 अक्तूबर को स्थापित इस सेंटर में महज डेढ़ महीने के दरम्यान 36 बच्चों के लापता होने की सूचना दर्ज कराई गई. इनमें से चार बच्चे मिल गए हैं. दीया सेवा संस्था के बैद्यनाथ कुमार बताते हैं कि आदिवासी इलाक़ों से लापता होने वाले अधिकतर बच्चे-बच्चियां मानव तस्करों के हाथ लग जाते हैं.

कई ऐसे भी संवेदनशील मामले सामने आ रहे हैं जिनमें पुलिस थानों में मामला ही दर्ज नहीं हुआ है. अब उन मामलों में तेज़ी से कार्रवाई हो रही है.

अपराध अनुसंधान विभाग के अपर पुलिस महानिदेशक एसएन प्रधान बताते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के आलोक में सभी पुलिस थानों को गुमशुदा बच्चों के मामलों में त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं. ज़िलों के पुलिस अधीक्षकों से थानों में बाल अधिकारी नामित करने को कहा गया है."

"ये निर्देश भी दिए गए हैं कि अब शिकायत मिलने पर सूचना दर्ज करने के बजाय प्राथमिकी दर्ज की जाए. इस तरह के ट्रैकिंग सिस्टम बनाए गए हैं कि किसी भी इलाके से लापता बच्चों के बारे में देश स्तर पर पुलिस को जानकारी मिल सके."

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