क्या घरेलू कामगारों को मिलता है न्यूनतम वेतन?

भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े

अमरीका में रह रहीं भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े के मामले के बाद अब इस बात पर बहस छिड़ गई है कि भारत से विदेश ले जाए जा रहे घरेलू नौकरों की तनख्वाह और वहाँ के न्यूनतम वेतन के बारे में प्लेसमेंट एजेंसियों को कोई जानकारी भी है या नहीं.

बीबीसी नें जिन कुछ एक प्लेसमेंट एजेंसियों से बात की उनमे से ज़्यादातर को न तो देश में लागू किये नियुनतम मज़दूरी के क़ानून के बारे में जानकारी है और ना ही विदेशों के श्रम क़ानूनों के बारे में ही कोई मालूमात है.

कुछ एक एजेंसियों के संचालकों नें गोपनीयता की शर्त पर बताया कि कई मामलों में घरेलु काम के लिए विदेश ले जाए जा रहे लोगों को जिस क़रार के तहत ले जाया जाता है, उनपर कोई खरा नहीं उतरता. यानि मिसाल के तौर पर अगर किसी घरेलू नौकर को तीस हज़ार रूपए देने का क़रार किया जाता है तो उन्हें सिर्फ दस हज़ार तक ही मिल पाते हैं.

(सांसद की नौकरानी अस्पताल में भर्ती)

हैप्पी होम केयर नाम की प्लेसमेंट एजेंसी चलाने वाले जॉर्ज ने बीबीसी को बताया कि दक्षिण एशियाई देशों में घरों में काम करने वालों का न्यूनतम मानदंड तय है. उनका कहना है कि सिर्फ भारत ही ऐसा देश है जहाँ घरेलू नौकरों की न्यूनतम मज़दूरी के बारे में कोई चर्चा नहीं की जाती. जो जैसे चाहता है वैसे नौकरों से काम लेता है.

एजेंसियों की भूमिका

हाल ही में उनके जानने वाली एक एजेंसी ने सिंगापुर में घरेलू काम करने के लिए किसी को भेजा तो उसे 250 सिंगापुरी डॉलर मिल रहे हैं.

वो कहते हैं, "अमरीका और यूरोपीय देशों में तो ये दर ज़्यादा है. मगर ज़्यादातर एजेंसियों को पता ही नहीं है कि हमारे देश में ही घरेलू काम करने वालों के लिए भी न्यूनतम मज़दूरी लागू है."

वहीं ह्यूमन हेल्पिंग हैंड्स नाम की एजेंसी चलाने वाले विमल मेहता का कहना है कि घरेलू नौकर उपलब्ध कराने वाली एजेंसियां विदेश भेजने का काम नहीं करतीं. वो कहते हैं कि घरेलू नौकर भेजने का काम सिर्फ वो पंजीकृत एजेंसियां करती हैं जो अमूमन विदेशों में मज़दूर भेजने का काम करती हैं. इसके लिए अलग से लाइसेंस लेना पड़ता है.

जॉर्ज और मेहता का कहना है कि घरेलु नौकर उपलब्ध कराने वाली ज़्यादातर एजेंसियों को पता ही नहीं है कि न्यूनतम मज़दूरी क्या है और क्या दिया जा रहा है.

जॉर्ज ने बताया, "हमें पता है कि नियुनतम मज़दूरी क्या है, इस लिए हम महानगरों में भी सात से आठ हज़ार रूपए प्रति महीना से नीचे नौकरों को नहीं भेजते. आस्ट्रेलिया जैसे देशों में तो हम 35 से 40 हज़ार रुपये तक दिलवाते हैं घरों में काम करने वाले नौकरों को."

न्यूनतम मज़दूरी

लंबे अरसे से घरेलू कामगारों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे झारखण्ड निवासी गौतम बोस कहते हैं कि वर्ष 2010 में न्यूनतम मज़दूरी क़ानून लागू किया गया था,

मगर कई राज्य ऐसे हैं जहाँ इस क़ानून को लागू नहीं किया गया है. यही कारण है कि शोषण थमने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है.

उनका कहना है कि ज़्यादातर राज्यों में इस क़ानून की अधिसूचना ही जारी नहीं की गई है जबकि कुछ राज्यों ने इसे न्यूनतम मज़दूरी के दायरे में रखा है.

वो कहते हैं, "काफ़ी संघर्ष के बाद ये क़ानून लाया तो गया मगर श्रम विभाग के लोगों ने इसे सख़्ती के साथ लागू करने की कोशिश ही नहीं की. न्यूनतम मज़दूरी की दर 180 रुपए प्रतिदिन तय की गई है. मगर ऐसे भी मामले हैं जब घर में काम करने वालों को महीने में 200 रुपए भी नहीं मिल पाते हैं."

(इनके पास न तो संगठन है...)

घरेलू काम करने के क्षेत्र में मज़दूरी की अनियमितता ने मानव तस्करी को ही बढ़ावा दिया है. बड़े बड़े महानगरों में छोटे शहरों, कस्बों और गावों से बड़ी संख्या में लड़कियां घरेलू नौकरानियों के रूप में काम कर रही हैं.

आयोग

इनमें से ज़्यादातर लड़कियां औने पौने मजदूरी में ही काम करने को मजबूर हैं. कई मामलों में इनके साथ हुए शोषण के किस्से अख़बारों की सुर्ख़ियां बने.

बढ़ रहे शोषण और तस्करी के मामलों के बाद झारखंड की सरकार ने इसे रोकने के लिए एक आयोग का गठन किया है.

इस आयोग के उपाध्यक्ष संजय मिश्रा ने बीबीसी से बात करते हुए स्वीकार किया कि न्यूनतम मज़दूरी के क़ानून के बारे में किसी को कुछ पता नहीं है और महानगरों से काम करने वाली प्लेसमेंट एजेंसियां ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से ही काम कर रही हैं.

वो कहते हैं कि यही एजेंसियां घरेलू काम के लिए लोगों को अन्य देशों में भेजने का काम भी कर रही हैं. काम की न्यूनतम उम्र को लेकर अभी विचार चल रहा है. निर्धारण होने के बाद अभियान चलाया जाएगा.

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