यूपीए और कांग्रेस की मजबूरी है लालू यादव ज़रूरी हैं?

लालू यादव के बोलने के कौशल, लोगों के साथ जुड़ने की क्षमता और दुश्मन के शिविर में घुस कर हमला करने के सहज भाव ने ही उन्हें, मुश्किलों से घिरी हुई कांग्रेस के लिए एक अमूल्य सहयोगी बना दिया है.

लालू यादव भले ही चुनाव लड़ने के योग्य न हों लेकिन अगर वह उत्तर भारत में प्रचार कर पाते हैं तो इस क्षेत्र से लगभग ख़त्म हो चुकी यूपीए में कुछ जान आ सकती है.

सितंबर में सीबीआई अदालत द्वारा चारा घोटाले में दोषी पाए जाने के बाद छपे एक विश्लेषण का शीर्षक था 'लालू के जाने के बाद, यूपीए और बीजेपी में बिहार के लिए घमासान'.

लालू के तीन बयान

उस समय लालू को 'अतीत' मान लेना जल्दबाज़ी थी. रांची की जेल से निकलने के तुरंत बाद राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू यादव ने तीन महत्वपूर्ण बयान दिये.

पहला, उन्होंने मीडिया को ये जानकारी दी कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सुप्रीम कोर्ट से राहत मिलने के बाद उनसे फ़ोन पर बात कर खुशी ज़ाहिर की.

दूसरा, उन्होंने दोहराया कि एक अच्छे प्रधानमंत्री बनने के लिए ज़रूरी सभी गुण राहुल गांधी में मौजूद हैं. और अंत में उन्होंने घोषणा की कि बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के प्रभाव को रोकने के लिए वो जो कुछ कर सकते हैं वो सब कुछ करेंगे.

इस सबके बाद राजनीति विशेषज्ञ उन्हें 'चुका हुआ मान लेने' की अपनी बात पर पछता रहे हैं.

चारा घोटाले में दोषी पाए जाने के बाद लालू यादव को जेल भेज दिया गया था और अब दो महीने बाद वो जेल से वापस लौटे हैं. हांलाकि वह जमानत पर जेल से रिहा हुए हैं और उनके ख़िलाफ़ दूसरे कई मामले भी चल रहे हैं. लेकिन वो बिना संघर्ष किये हार मानने वाले नहीं हैं.

यदि मीडिया में आई ख़बरों पर विश्वास करें तो उन्होंने इन परिणामों को पूर्वानुमान बताया और सुनिश्चित किया कि उनकी तीन बेटियों की शादी पिछले साल हो.

उन्होंने ये उम्मीद भी जताई कि यूपीए उनका बचाव करेगी और सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2013 में दिये गए फ़ैसले को बदलने के लिए विधेयक लाएगी.

सुप्रीम कोर्ट ने ये फ़ैसला दिया था कि दोषी पाए गए सासंदों और विधायकों को अपनी सीट छोड़नी पड़ेगी और वे अगले छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य होंगे.

ऐसा कहा जा रहा है कि लालू ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को फ़ोन कर इस फ़ैसले को पलटने वाले विधेयक को जल्द लागू करने को सुनिश्चित करने का आग्रह किया.

राहुल का बयान

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के देश से बाहर एक बैठक में भाग लेकर जाने के से पहले इस विधेयक के मसौदे पर कैबिनेट की मंजूरी मिल गई थी.

लेकिन उसके बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा एक प्रेस कांफ्रेंस में इस बिल को 'पूरी तरह से बकवास' करार देने और फ़ेंकने की घोषणा कर देने की चर्चित घटना हो गई थी.

इस घटना ने उस समय यूपीए में काफ़ी हलचल पैदा की थी और इसे कैबिनेट व प्रधानमंत्री के लिए एक झिड़की देने की तरह देखा गया था.

सभी संभावनाओं के पार, इसे सोनिया गांधी के लिए भी एक झिड़की की तरह ही माना गया था क्योंकि ये तय है कि इस बिल को कैबिनेट में उनकी सहमति के बिना मंजूरी नहीं मिल सकती थी.

राहुल के इस बयान के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को शर्मिंदा होना पड़ा था और एक 'दब्बू' कैबिनेट को ये बिल वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा था.

इसलिए लालू यादव और राहुल गांधी के बीच एक असहज संबंध प्रतीत होता है.

कांग्रेस उपाध्यक्ष को ये लगता है कि कांग्रेस को राजद के साथ गठजोड़ कर मुसीबत झेलनी पड़ी है और काफ़ी हद तक वो सही भी हैं क्योंकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस को मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों से दबना पड़ा है.

दागी नेताओं को साथ जोड़ने पर भी उन्हें दिक्कत हो सकती है लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हमेशा ही लालू यादव का पक्ष लिया है और उनक साथ सोनिया गांधी काफ़ी सहज लगती हैं.

बड़ा मतदाता वर्ग

इसके अलावा लालू यादव भी अब ये दावा कर सकते हैं कि कांग्रेस के साथ उनके 'पारिवारिक रिश्ते' हैं. उनकी एक बेटी की शादी हरियाणा के बिजली मंत्री अजय सिंह यादव से हुई है जबकि उनकी दूसरी बेटी की शादी गाज़ियाबाद से समाजवादी पार्टी के विधायक जितेंद्र यादव से हुई है. जितेंद्र यादव हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को दरकिनार करने के प्रयास में लालू यादव भारत के पहले ऐसे सांसद बन गए जिन्हें दोषी होने के कारण लोकसभा में अपनी सीट गंवानी पड़ी. शीर्ष कोर्ट द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार वो छह साल तक चुनाव लड़ने के भी अयोग्य हो गए.

लेकिन जब राजनीतिक पंडितों ने ये मान लिया था कि लालू यादव के लिए सभी रास्ते बंद हो चुके हैं और तब बिहार की आबादी में 16 प्रतिशत यादव आबादी पर प्रभाव रखने वाले लालू के लिए सहानुभूति और समर्थन का रेला उठ खड़ा हुआ था.

राजनीति बाँचने वालों ने लालू यादव के अंत की घोषणा करने में ज़रा देर नहीं लगाई लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी गुमान नहीं था कि लालू यादव के लिए उनी अपनी जाती में समर्थन और सहानुभूति का रेला उठ खड़ा होगा. यादव समाज ना केवल बिहार की कुल जनसंख्या का करीब 16 फ़ीसदी है बल्कि समृद्ध और वाचाल भी है.

ये एक सोच है कि लालू यादव इस समुदाय में व्यापक तौर पर फैले 'संदिग्ध व्यक्तियों' में से एक थे. अब जबकि इस समुदाय को हर जगह भ्रष्टाचार दिखता है और लोग इसके आरोपों से बच निकलते हैं. ऐसे में अधिकतर लोगों को लालू के ख़िलाफ़ लिया गया ये फ़ैसला 'न्याय की भूल' की तरह और एक समुदाय विशेष के ख़िलाफ़ लिया गया निर्णय लगता है.

कुछ चुनिंदा मामलों में सज़ा और साख का मसला नहीं होता और ये एक तथ्य है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) भ्रष्टाचार विरोधी चालीस प्रतिशत से ज्यादा मामलों में दोष सिद्ध करने में असफल रहती है.

मोदी को रोकने के लिए कुछ भी

अब लालू यादव जमानत पर बाहर हैं और 'धर्मनिरपेक्ष ताकतों' का प्रचार करने के लिए स्वतंत्र हैं. बिहार में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के लिए पिच बन चुकी है.

लालू यादव की धर्मनिरपेक्षता के दावों और विश्वसनीयता के बारे में कोई कुछ भी सोचे लेकिन अपनी विरोधी बीजेपी के लिए वे एक रोड़ा रहे हैं.

इसलिए उनका ये कहना कि नरेंद्र मोदी के अथक मार्च को रोकने के लिए लिए वो सब कुछ कर करेंगे, आश्चर्यजनक नहीं है.

अगर लालू यादव यादवों और मुस्लिमों को अपनी ओर खींचने में सफल रहते हैं तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस के लिए अगले चुनावों में राजद के साथ गठबंधन करना राहत भरा साबित होगा.

वास्तव में कांग्रेस के पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है क्योंकि नीतीश कुमार की जेडीयू के पास एक संकीर्ण जातिगत आधार है और लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी के लिए समर्थन हासिल करना मुश्किल होगा.

अगले विधानसभा चुनावों के लिए भी वो लोगों की पहली पसंद हो सकते हैं लेकिन लोकसभा चुनावों में 30 प्रतिशत यादव और मुस्लिम मतदाता, मोदी के प्रभाव को कम करने के लिए इस 'धर्मनिरपेक्ष गठबंधन' को पर्याप्त गति प्रदान कर सकते हैं.

लालू खुद चुनाव लड़ने में भले ही असमर्थ हों लेकिन यूपीए की राजनीतिक रैलियों में एक मुख्य वक्ता के तौर पर उनकी बहुत मांग होगी.

कांग्रेस के पास हिंदी भाषी अच्छे वक्ताओं की कमी है लेकिन असंगत पर लोगों को बड़े स्तर पर प्रभावित करने वाले लालू यादव उत्तरी क्षेत्र में मुश्किलों से घिरे इस गठबंधन के बहुत काम आएंगे. अब देखना ये है कि लालू यादव खुद को बिहार तक ही सीमित रखेंगे या देश के दूसरे हिस्सों में भी जाएंगे.

लालू के हिसाब से कांग्रेस और यूपीए दोनों को ही अपने अस्तित्व के लिए राजद की जरूरत है और इसलिए उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता कायम है.

बीजेपी या कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में यदि कोई तीसरा 'धर्मनिरपेक्ष' तीसरा फ्रंट कांग्रेस के समर्थन से आकार लेता है तो निसंदेह केंद्र में सरकार बनाने में लालू की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

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