'इस देश को ज़रूरत है लंबी दौड़ के घोड़ों की'

आशीष गुप्ता, अनीता बालचंद्रन

डॉक्टर आशीष गुप्ता भारत में मौजूद 'वेंचर फंड हीलियन वेंचर पार्टनर्स' के सह-संस्थापक हैं.

वो तवंत टेक्नोलोजी और जंगली जैसी सफल कंपनियों के संस्थापकों में भी शामिल रहे हैं. आशीष के पास अनेक पेटेंट और प्रकाशन हैं. जंगली को बाद में अमेज़न डॉटकॉम ने ख़रीद लिया था.

आशीष का अब तक का सफ़र और उसके सबक उन्हीं के शब्दों में:

मुझे अपने बचपन के बारे में विस्तार से याद नहीं. मुझे गर्मी की छुट्टियाँ याद हैं. हम लोग अपनी नानी के घर जाया करते थे और दिन भर तेरह अन्य भाई बहनों के साथ मस्ती किया करते थे.

मेरे माता-पिता परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर काफी स्पष्ट थे. वे बहुत धार्मिक प्रवृति के लोग थे.

मैं समय के साथ 'संशयवादी' बनता चला गया - एक ऐसा व्यक्ति जिसे हर बात को मानने के लिए तर्क की ज़रूरत हो. इसलिए इस विषय पर हमने परिवार में बात करना बंद कर दिया क्योंकि धर्म पर बात शुरू होते ही एक गरमा-गरम बहस शुरू हो जाती थी.

मेरे पिता असल में हर धर्म के बारे में पढ़ते थे. हमारे घर में क़ुरान भी थी और हम अक्सर गुरुद्वारे जाया करते थे क्योंकि हमारे बहुत से सिख मित्र थे.

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खुला माहौल

मेरी माँ एक हिन्दुस्तानी गृहिणी होने के नाते बहुत शांत और अपने व्यवहार में सीमित महिला हैं. उन्हें सामाजिक नियम कायदों और परम्पराओं को इसलिए मानना पड़ा क्योंकि उस समय औरतों से ऐसा ही करने की उम्मीद की जाती थी.

मेरे पिता सेना में थे और अक्सर हमें अपने साथ आर्मी मेस में ले जाते थे. वर्ष 1982 के एशियाई खेलों के बाद हमारे घर में टीवी आ गया था. उस वक़्त मैं दसवीं में था.

मेरे ज़हन में पिता के साथ अक्सर होने वाली यात्राओं की कई यादें ताज़ा हैं.

एक सैन्य अधिकारी होने के साथ साथ मेरे पिता एक मानचित्रकार भी थे. उन्होंने अपनी ज़िन्दगी सर्वे ऑफ़ इंडिया के लिए नक़्शे बनाने में गुज़ार दी.

मेरे पिता ने मुझे जिस तरह का खुला माहौल दिया वो उस समय शायद ही कोई माता-पिता देते थे. हां, हम हाथ से ही निकल जाएँ यह सुनिश्चित करने के लिए माँ थोड़ा बहुत अनुशासन ज़रूर थोपती थीं.

स्कूली शिक्षा

स्कूल के अनुभव मेरे लिए बहुत बढ़िया रहे क्योंकि मैं अपने अध्यापकों का पसंदीदा छात्र था. मुझे जो भी कहा जाता मैं वो अच्छे से करता. मैंने कभी भी बनी-बनाई व्यवस्था को लेकर सवाल नहीं उठाए. उच्च शिक्षा के लिए स्टैनफोर्ड जाने से पहले तक तो बिल्कुल नहीं. स्टैनफोर्ड में पहली बार मुझे अपने बारे में सोचने की सीख मिली.

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अमरीकी शिक्षा प्रणाली के मुकाबले हिन्दुस्तानी शिक्षा व्यवस्था सही मायने में सीखने की भावना को दबा देती है. अमरीकी शिक्षा पद्धति बच्चों को इस बात के लिए प्रेरित करती है कि सीखे हुए से आगे जाकर कैसे सोचा जाए. हम सभी चीज़ों को एक ही सांचे में ढालने का प्रयत्न करते हैं.

वैसे इस बात में भी कोई शक नहीं कि मैंने स्कूल में बहुत कुछ ऐसा सीखा जो शायद अमरीकी स्कूलों के बच्चे कभी नहीं सीख पाते. मैंने अभाव की कीमत समझी. मैंने यह सीखा कि एक अच्छा अध्यापक मिलना बहुत बड़ी बात होती है. हमने एक दूसरे के साथ मिलकर समस्याएं सुलझाने का हुनर सीखा.

अमरीकी शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वहाँ छात्रों के पास ज़रुरत से ज़्यादा साधनों की उपलब्धता है और इस कारण उनमें उन साधनों को इस्तेमाल करने की इच्छा या भूख नहीं है.

बदलाव की ज़रूरत

कुल मिलकर यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारी शिक्षा प्रणाली को एक बड़े बदलाव की ज़रूरत है. बच्चों को 'क्यों' और 'क्या' की समझ देना एक पेचीदा मामला है. लेकिन हमें यह चुनौती हर हाल में स्वीकार करनी होगी और बच्चों को सिखाना होगा कि आगे की बात कैसे सोची जाए.

अक्सर लोग हैरान होते हैं कि भारत की इस त्रुटिपूर्ण शिक्षा प्रणाली के बावजूद इतने सारे भारतीय मूल के निवासी बेहतरीन वैज्ञानिक, शिक्षाविद और उद्योगपति कैसे बन गए.

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि इतनी बड़ी जनसँख्या वाले हमारे देश में कुछ एक लाख लोग अंतराष्ट्रीय मापदंडों पर खरे उतरें. बहुत से लोग विषम परिस्थितियों में भी आगे बढ़ जाते हैं. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि लोगों को जानबूझ कर विषम परिस्थितियों में धकेल दिया जाए.

'मैं ग़रीबी हूँ, मैं तुम्हें प्यार करती हूँ'

स्टैनफोर्ड में मेरे शुरुआती तीन साल तो बहुत निराशाजनक थे. मुझे लगता था कि उस भीड़ में मैं सबसे बेवकूफ शख्स था.

मैं वहाँ तक सिर्फ इसलिए पहुँच पाया था क्योंकि मुझे सही जवाब लिख कर इम्तिहान पास करने का गुर आता था. मैंने कई बार सब कुछ छोड़ने का मन बनाया. लेकिन मेरे दोस्तों और मेरी होने वाली बीवी ने मुझे ऐसा करने से रोका.

मैं और मेरी पत्नी अक्सर उन तीन मूल्यों पर विचार करते हैं जो हम अपने बच्चों को देना चाहते हैं.

वो तीन संस्कार हैं दूसरों की भावनाओं का सम्मान, कुछ नया जानने की इच्छा और बौद्धिक ईमानदारी. मेरे मित्र अमित कनौडिया ने इस फेहरिस्त में एक चौथा गुण भी जोड़ दिया. वो है किसी काम में लगे बच्चे को बीच में न टोकना. भले ही वो वह काम कर रहा हो जो आपके हिसाब से उसे नहीं करना चाहिए.

लंबी दौड़ के घोड़े

आज जब भारत में बदलाव की हवा तेज़ी से बह रही है हम भी खुद को बदलने की तैयारी में जुट सकते हैं. हम बहुत से समझौतों और जुगाड़ों में खुश हैं. हम लोग बिज़नेस प्रोसेस की आउटसोर्सिंग तो कर लेते हैं लेकिन जब उन्ही प्रोसेसेज को अपनाने की बात आती है बगलें झांकने लगते हैं.

हमें दूसरों के सम्मान की कतई कोई परवाह नहीं है और इसीलिए हमारा व्यवहार मूर्खतापूर्ण और लालच भरा हो जाता है. हम अपने घर का कचरा पड़ोसी के घर में फेंकने से नहीं कतराते क्योंकि हमें दूसरों के सम्मान कि कोई परवाह नहीं है.

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यदि हम अपनी इच्छाओं के बदले अपनी ज़रूरतों के बारे में सोचें तो हमारा जीवन ज़यादा संतोषजनक हो जाएगा और हमें शायद बहुत कम चीज़ों की ज़रुरत रह जाए.

हिंदुस्तान में आज भी करोड़ों लोग ऐसे हैं जो सिर्फ ज़रूरतों भर के लिए सोच पाते हैं. भारत का प्रगतिशील मध्यम वर्ग की इच्छाओं के अनुसार चलने की सोच देश में बाकियों के लिए कुछ नहीं छोड़ेगी.

मुझे उद्यमियों की संगत में रहना अच्छा लगता है क्योंकि वो लोग इस तरह के सवालों के जवाब ढूढ़ते और देते रहते हैं.

वो हिंदुस्तान के लम्बी दौड़ के ऐसे घोड़े हैं जिनकी ज़रुरत देश को बहुत ज़्यादा है. ऐसे घोड़े जिनमे आत्म-सम्मान भरा हो और जिनके पास क्यों और क्या के सवालों का जवाब हो और यह हमारी खुशकिस्मती है कि हमारे यहाँ ऐसे बहुत से नए रास्तों की खोज में लगे बाशिंदे हैं जो इस मुल्क को एक रोमांचक जगह बनाते हैं.

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