उर्दू प्रेस: सरकारी नौकरियों में तेज़ी से घटे मुसलमान

  • 22 दिसंबर 2013
भारतीय मुसलमान

बीते हफ़्ते पाकिस्तान के उर्दू अख़बारों में जहां पोलियो मुहिम के ख़तरे और तालिबान से बातचीत की आख़िरी कोशिशों का जिक्र रहा हो भारत में लोकपाल विधेयक उर्दू अख़बारों की सुर्ख़ियों में रहा.

भारतीय संसद को दोनों सदनों में लोकपाल बिल को मिली मंज़ूरी पर राष्ट्रीय सहारा लिखता है कि इसका मकसद भ्रष्टाचार को रोकना और उसका ख़ात्मा है.

ऐसे में सबसे पहला ये सवाल जेहन में आता है कि इस क़ानून के वजूद में आने के बाद क्या इसके बाद भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा.

अख़बार के अनुसार इसका जवाब क़ानून मंत्री कपिल सिब्बल ने राज्यसभा में अपने भाषण में देने की कोशिश की और कहा कि ये क़ानून बनने से ही भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हो जाएगा, बल्कि इसके लिए देश में अमीर और ग़रीब के बीच की खाई को सबसे पहले पाटना होगा.

अल्पसंख्यक पिछड़े

अमरीका में अपनी नौकरानी को कम वेतन देने और वीज़ा के लिए फ़र्ज़ी दस्तावेज देने के मामले में भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की गिरफ़्तारी और उनसे कथित बदसलूकी पर आज समाज ने संपादकीय लिखा है.

अखबार कहता है कि यूं तो अमरीकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने इस मामले की पूरी तरह जांच का वादा किया है और भारत के तीखे तेवरों को देखते हुए इस पर अफ़सोस भी जताया है लेकिन राजनयिक की निवस्त्र तलाशी पर उन्होंने कहा कि ये सामान्य प्रक्रिया है.

अखबार लिखता है कि अमरीका के घमंड को ख़त्म करने के लिए जरूरी है कि उसके अनैतिक रवैये पर सारी दुनिया विरोध करे ताकि वो फिर ऐसी हरकत न करे.

हिंदोस्तान एक्सप्रेस लिखता है कि भारतीय मुसलमान ये मानते हैं सरकारी नौकरियों में उनकी नुमाइंदगी घट रही है.

Image caption रंग लाया अन्ना हज़ारे का आंदोलन

अख़बार के मुताबिक़ आज़ादी से पहले सरकारी विभागों में मुसलमानों की संख्या 25 से 35 फ़ीसदी थी जो अब घट कर दो से तीन प्रतिशत रह गई है.

संपादकीय में ज़िक्र है कि बीते दिनों संसद में कार्मिक मामलों के राज्य मंत्री नारायण सामी ने कहा कि सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों की नियुक्तियां का अनुपात 2011-12 में 11.56 प्रतिशत से घट कर 2012-13 में 6.56 प्रतिशत रह गया.

अख़बार कहता है कि एक तरफ़ सरकारें अल्पसंख्यकों की शैक्षिक और आर्थिक स्थिति को सुधारने का ढिंढोरा पीटती है, तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों की ये हालत सरकारों की झूठी हमदर्दी की कलई खोलती है.

पोलिया मुहिम के ख़तरे

रुख़ पाकिस्तान का करें तो पोलियो विरोध मुहिम का समर्थन करने पर पाकिस्तान तहरीके इंसाफ पार्टी के नेता इमरान को मिली तालिबान की धमकी पर नवाए वक्त ने लिखा है कि पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और नाइजीरिया को छोड़ कर पूरी दूनिया इस बीमारी से छुटकारा पा चुकी है.

इसलिए पोलियो के खात्मे के लिए इमरान ख़ान की मुहिम वक़्त की ज़रूरत है. लेकिन पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान में पोलियो टीमों को बराबर निशाना बनाया जा रहा है जिसके चलते पिछले दो साल में 35 लोग मारे गए है.

अख़बार कहता है कि जो लोग इस मुहिम का विरोध कर रहे हैं उन्हें रास्ते पर लाने का प्रयास किया जाए, लेकिन फिर वो अपनी ज़िद पर कायम रहते हैं तो उनके ख़िलाफ़ क़ानून का शिकंजा कसने में देर न की जाए.

Image caption इमरान खान पोलिया विरोधी मुहिम का समर्थन कर रहे हैं

जंग ने लिखा है कि तालिबान ये कह कर पोलियो मुहिम का विरोध कर रहा है कि बच्चों को पिलाई जा रही दवा में कुछ ऐसी चीजें मिली हैं जो शरिया के मुताबिक हराम हैं.

साथ ही उसका ये भी कहना है कि पोलियो टीमों में अमरीका के लिए जासूसी करने वाले लोग भी शामिल हो सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे डॉ. शकील अफ़रीदी ने अल कायदा नेता ओसामा बिन लादेन को तलाशने में मदद की.

अख़बार लिखता है कि ऐसे में सरकार की ज़िम्ममेदारी है कि वो धार्मिक नेताओं और ख़ासकर तालिबान की आपत्तियों को दूर करने के लिए क़दम उठाए, और दुनिया के बाकी देशों की तरह पाकिस्तान को भी पोलियो से मुक्त बनाए.

ड्रोन ग़ैर क़ानूनी

दैनिक खबरें के कार्टून में पाकिस्तान में बढ़ती महंगाई को विषय बनाया गया जिसमें एक व्यक्ति किराने की दुकान के बाहर एंबुलेंस देखकर हैरान है क्योंकि उसके पास ही एक बोर्ड पर लिखा है- आगे यूटिलिटी स्टोर है और कमज़ोर दिल वाले ख़रीदारी के लिए तशरीफ़ न लाएं.

दैनिक एक्सप्रेस ने संपादकीय लिखा है- तालिबान से बातचीत की आख़िरी कोशिश. इसमें पिछले दिनों प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की अध्यक्षता में हुई बैठक का ज़िक्र है जिसमें शांति की ख़ातिर बातचीत को आख़िरी मौका देने पर रज़ामंदी हुई.

Image caption ड्रोन हमलों का पाकिस्तान में लंबे समय से विरोध होता रहा है

अखबार लिखता है कि अगर ड्रोन हमले में हकीमुल्लाह महसूद की मौत न होती तो अब तक सरकार के साथ तालिबान की बातचीत का एक दौर पूरा भी हो गया होता, ख़ैर अब सरकार भले ही बातचीत के लिए कोशिश करने की बात कहे लेकिन तालिबान को पहले ही ये विकल्प बंद कर चुका है.

इसी विषय पर आजकल का कार्टून का जिसमें नवाज़ शरीफ़ को बंदूक पर अमन का परचम बांध कर उन्हें तालिबान को बातचीत की दावत देते हुए दिखाया गया है.

दैनिक औसाफ ने संयुक्त राष्ट्र में ड्रोन हमलों के ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित होने पर अपने कार्टून में तंज़ किया और लिखा है- देश को मुबारक हो, 50 पहले कश्मीर के हक़ में प्रस्ताव पास होने के बाद अब ड्रोन हमलों के ख़िलाफ़ भी प्रस्ताव हुआ पास.

दैनिक इंसाफ लिखता है कि पाकिस्तान की तरफ से पेश इस प्रस्ताव को आम राय से पारित किया गया जिसमें कहा गया है कि अमरीकी ड्रोन हमले अंतरराष्ट्रीय कानून और देश की संप्रभुता का उल्लंघन हैं जिनमें बेगुनाह लोग मरते हैं जिसके चलते चरमपंथ को बढ़ावा मिलता है.

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