चुनाव बीतने के बाद वादे भूली रमन सिंह सरकार

चुनाव प्रचार करते डॉ. रमन सिंह

छत्तीसगढ़ में चुनावी साल में शुरू की गईं योजनाएं और घोषणाओं को सरकार ने चुनाव बीतने के साथ ही वापस लेना शुरू कर दिया है.

विधानसभा चुनाव निपटने के बाद राज्य के हज़ारों शिक्षाकर्मियों के मानदेय व भत्ते घटा दिए गए हैं.

धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने के मुद्दे पर कांग्रेस राज्य सरकार को घेर रही है.

मुख्यमंत्री रमन सिंह ने धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने के मामले को केंद्र के पाले में डाल दिया है.

शिक्षाकर्मी आंदोलन

छत्तीसगढ़ में पंचायत द्वारा नियुक्त दो लाख शिक्षाकर्मी अपनी नियुक्ति के समय से ही विभिन्न मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. राज्य के ग्रामीण स्कूल इन्हीं शिक्षाकर्मियों के भरोसे चलते हैं.

रमन सिंह के पहले कार्यकाल में 2006 में शिक्षाकर्मियों ने 28 दिन तक बहिष्कार किया था. इसके बाद सरकार ने उनका मानदेय 2,800 रुपए से बढ़ाकर 3,800 रुपए प्रति महीना कर दिया था.

मुख्यमंत्री रमन सिंह ने 2007 में शिक्षाकर्मियों के मानदेय में हर साल 20-20 फ़ीसदी बढ़ाने और उन्हें शिक्षा विभाग समेत दूसरे विभागों में शामिल कर लिए जाने की घोषणा की थी.

नई सरकार बनने के बाद सरकार ने जब अपना वादा पूरा नहीं किया तो शिक्षाकर्मियों ने 17 दिनों तक आंदोलन किया. सरकार ने किसी तरह 15 फ़ीसदी अंतरिम राहत देकर नया वेतनमान देने की घोषणा कर उनका आंदोलन खत्म कराया.

शिक्षाकर्मियों ने 2011 में सरकारी घोषणा पर अमल कराने के लिए सात दिन तक आंदोलन किया था. लेकिन मामला अटका रहा.

इस साल राज्य के शिक्षाकर्मियों ने अपनी मांगों को लेकर हड़ताल की और सड़क पर उतरे. यह अब तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था.

राज्य में 38 दिन तक चले प्रदर्शन और भूख हड़ताल के दौरान आधा दर्जन से अधिक शिक्षाकर्मियों की मौत हो गई. मानदेय के अभाव में कई लोगों ने आत्महत्या कर ली. लेकिन सरकार टस से मस नहीं हुई.

वापस खींचे क़दम

चुनावी साल को देखते हुए राज्य सरकार ने 17 मई को आठ साल की सेवा पूरी कर चुके शिक्षाकर्मियों को शिक्षकों के समतुल्य मानदेय देने का निर्देश जारी किया.

इसके अलावा शिक्षकों को आवास भत्ता, चिकित्सा भत्ता, गतिरोध भत्ता, अनुसूचित क्षेत्र भत्ता भी दिया जाने लगा.

राज्य सरकार के निर्देश से शिक्षाकर्मी बेहद खुश थे.लेकिन राज्य में चुनाव निपटते ही सरकार ने सभी भत्ते खत्म करने की तो घोषणा कर दी. इसके अलावा सरकार ने क्रमोन्नति वेतनमान और समयमान वेतनमान का लाभ भी शिक्षाकर्मियों को देने से मना कर दिया है.

छत्तीसगढ़ शिक्षाकर्मी संघ के अध्यक्ष संजय शर्मा कहते हैं, ''राज्य के दो लाख शिक्षाकर्मी शासन के इस आदेश से भौचक हैं. नौकरशाहों ने जिस तरह हमें अधिकारों से वंचित करने का काम किया है, उससे हम छला हुआ महसूस कर रहे हैं.''

हालांकि राज्य के पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर कहते हैं कि सरकार शिक्षाकर्मियों को लेकर संवेदनशील है. वो कहते हैं, ''मैंने अपने विभाग से पूरी फाइल मंगवाई है. इस दिशा में जो कुछ हो सकेगा, हम सकारात्मक तरीके से इसकी पहल करेंगे.''

धान पर राजनीति

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री चरणदास महंत भाजपा को धान ख़रीदी के मामले में भी वायदे से मुकरने वाला बता कर घेरने की कोशिश कर रहे हैं.

धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार किसानों से समर्थन मूल्य पर धान ख़रीदती है. पिछले साल सरकार ने 71 लाख 13 हज़ार 466 मीट्रिक टन धान खरीदा था.

इसके बदले सरकार ने किसानों को आठ हजार 966 करोड़ 12 लाख रूपए का भुगतान किया था. सरकार ने पतले धान के लिए 1280 रुपए और मोटे धान के लिए 1250 रुपये प्रति क्विंटल की दर से भुगतान किया था.

इस साल सरकार ने 1310 रुपए और 1345 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीद करने की घोषणा की. चुनाव में भाजपा ने बार-बार दुहराया कि अगली सरकार बनने पर वह धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,100 रुपए प्रति क्विंटल कर देगी. धान पर अगले पांच साल तक तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल का बोनस दिया जाएगा.

कांग्रेस ने भी सरकार में आने पर धान का समर्थन मूल्य दो हज़ार रुपए प्रति क्विंटल करने का वादा किया था.

हालत यह थी कि विधानसभा चुनाव का परिणाम आने तक राज्य के किसान धान लेकर मंडियों तक नहीं पहुंच रहे थे. लेकिन राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद भी धान का समर्थन मूल्य नहीं बढ़ा.

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते हैं, ''भाजपा ने किसानों से वादा किया था कि वह धान का समर्थन मूल्य 2,100 रुपए करेगी. लेकिन सरकार कोई पहल नहीं कर रही है. इससे किसान निराश हैं.''

कांग्रेस को सलाह

मुख्यमंत्री रमन सिंह इस मामले को कांग्रेस के पाले में डाल कर कांग्रेस को पहल करने की सलाह दे रहे हैं. उनका कहना है कि तीसरी बार सरकार बनने के बाद उन्होंने पहली चिट्ठी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को धान समर्थन के मुद्दे पर ही लिखी है.

वो कहते हैं, ''हम अपने प्रयास से जो कुछ कर सकते हैं, उससे पीछे नहीं हटे हैं. प्रधानमंत्री जी को हमने लिखा है कि वर्तमान खरीफ विपणन वर्ष 2013-14 के लिए धान का प्रति क्विंटल न्यूनतम समर्थन मूल्य 21 सौ रुपए निर्धारित किया जाए, जिससे सेंट्रल पूल के लिए दिए जाने वाले धान के लिए किसानों को राज्य सरकार की ओर से घोषित तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल का बोनस मिलाकर धान पर 24 सौ रुपए प्रति क्विंटल की राशि मिल सके. अब कांग्रेस को चाहिए कि वह इस दिशा में प्रयास करे.''

छत्तीसगढ़ कृषक बिरादरी के आनंद मिश्र मानते हैं कि दोनों पार्टियां अपनी जिम्मेवारी से मुक्ति चाहती हैं.

वो कहते हैं, ''चुनाव खत्म होते ही आम जनता की हालत सिर मुड़ाते ही ओले पड़े जैसी हो गई है. यही हाल रहा तो अब जनता को फिर पांच साल तक प्रतीक्षा करनी चाहिए जब राज्य में विधानसभा के चुनाव होंगे.''

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