टेलीग्राम की मौत पर रोए थे लोग

  • 31 दिसंबर 2013
टेलीग्राम

मेरा साल आधा ख़त्म होने के बाद शुरू होता है. जून के दौरान एक ऐसी घटना समेटने और पाठकों तक पहुंचाने का मौक़ा मिला, जो ऐतिहासिक थी.

यह थी टेलीग्राम की मौत. बढ़ते घाटे के मद्देनज़र सरकारी दूरसंचार कंपनी बीएसएनएल ने 162 साल पुरानी टेलीग्राम सेवा को बंद करने का फ़ैसला लिया. यह भारतीयों के लिए एक भावुक ख़बर थी.

मुझे याद है जब मैं इस दम तोड़ते संचार के साधन की कहानी दर्ज करने दिल्ली के वेस्टर्न कोर्ट पहुंचा, तो टेलीग्राफ़ दफ़्तर लोगों से भरा था. गहमागहमी थी.

ज़्यादातर कर्मचारी ख़ामोश और मायूस थे. टेलीग्राम बुकिंग की खिड़की पर कम ही लोग थे. जो थे वो आख़िरी बार तार भेजकर इसे यादगार तोहफ़े के बतौर संजोना चाहते थे. कुछ मुझ जैसे पत्रकार इसकी मौत के पलों का दीदार करना चाहते थे, ताकि उसे बाक़ी दुनिया तक पहुंचा सकें. मैंने टेलीग्राफ़ दफ़्तर के कर्मचारियों से बात की तो उनका ग़ुस्सा साफ़ झलकता दिखाई दिया. उनके लिए यह वज्रपात की तरह था.

काउंटडाउन जारी था कि 14 जुलाई आ गई. मुझे याद है उस रात देश भर के टेलीग्राफ़ दफ़्तरों में मौजूद ऐसे लोगों की तस्वीरें हमारे पास आईं, जिनकी आंखों में आंसू थे, मानो वे किसी अपने से बिछड़ रहे थे.

यह बेवजह नहीं था. शादी-ब्याह, बच्चे की पैदाइश, मौत, नई नौकरी पाने की ख़ुशी या फिर अदालती केस का निपटारा, मौक़ा चाहे जो रहा हो, टेलीग्राम भारतीयों की ज़िंदगी का अभिन्न हिस्सा रहा था. बेशक ईमेल, एसएमएस और अत्याधुनिक संचार साधनों से होड़ में वह हार रहा था, मगर उसे अलविदा कहना आसान न था. वह परिवार के एक अपाहिज बच्चे की तरह था, मगर उसकी कोई हत्या नहीं करना चाहता था.

मगर वह 19वीं सदी में सियासी ज़रूरतों से उपजा था. इतिहास खंगालते हुए जब मैं दिल्ली के कश्मीरी गेट इलाक़े पहुंचा, तो वहां एक स्मारक खड़ा मिला. जिसे वक़्त के थपेड़े तो नहीं हिला सके थे, पर दिल्ली वालों ने भुला दिया था. स्मारक पर मुझे टेलीग्राफ़ दफ़्तर के उन अंग्रेज़ कर्मचारियों के नाम खुदे मिले, जिन्होंने 1857 के विद्रोह की सूचनाएं देते अपनी जान गंवाई थी. इन्हें सर रॉबर्ट मॉन्टगोमरी ने यूं श्रद्धांजलि दी है– 'इलेक्ट्रिक टेलीग्राफ़ ने भारत को बचाया'. टेलीग्राम के साथ अब यह स्मारक भी शायद इतिहास की किताबों में कहीं गुम हो जाएगा.

एक ख़बर जिसने मुझे बेज़ुबानों की ज़ुबान बनने का मौक़ा दिया, वह थी इंसान की 'किस्मत चमकाने' वाले काले घोड़ों की. मैंने पाया कि घोड़े वाले चंद रुपयों के लिए देश भर में घूम-घूमकर घोड़ों की नाल बेचते हैं और बार-बार नाल निकालने लगाने की वजह से घोड़े लंगड़े हो रहे हैं. ब्रिटेन की एक संस्था द ब्रूक इंडिया से बात करने पर पता चला कि घोड़े की नाल की ख़रीद-फ़रोख़्त अब एक संगठित कारोबार बन चुका है.

तकनीक और साहित्य से लगाव ने मुझे एक और ख़बर के रू-ब-रू ला खड़ा किया. यह थी शायरी और सोशल मीडिया के बीच बनते रिश्तों की कहानी. सिर्फ़ 140 करेक्टर में बात कहने की सीमा बांधने वाले माध्यम ट्विटर पर उर्दू शायरी कैसे परवान चढ़ रही है, यह दिलचस्प दास्तां बयान की राना सफ़वी ने.

तकनीक सिर्फ शायरी को ही नहीं छू रही, सुदूर अंतरिक्ष में भी नित नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है. मैं ऐसे लोगों के संपर्क में आया, जो अपनी दुनिया को अलविदा कहकर मंगल पर बसने की तमन्ना रखते हैं.

भारत के मंगल अभियान के बहाने मैं उन भारतीय वास्को-डि-गामाओं की दास्तां दर्ज करने लगा जो मंगल पर बसना चाहते हैं. हालांकि मैंने पाया कि बहुतों को मार्स वन पर भरोसा नहीं. कई का कहना था कि यह सिर्फ़ सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का स्टंट है.

हो सकता है कि कुछ साल बाद मंगल पर कोई इंसानी बस्ती बसे और उसके बाशिंदों में कोई भारतीय हो.

सवालों से जूझना, पहेलियां समझने-समझाने की कोशिश पत्रकारिता का काम है. ऐसी नई पहेलियों के ज़रिए कहानियों का कारवां आगे बढ़ेगा, मुझे उम्मीद है.

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