मुज़फ़्फ़रनगर दंगों से किसका नुक़सान?

  • 28 दिसंबर 2013

मुज़फ़्फ़रनगर में इस साल सितंबर में हुए दंगों ने पहले ही इलाक़े के साम्प्रदायिक सौहार्द को छलनी कर दिया था, लेकिन राजनीतिक दल अब भी उसकी आग में हाथ सेकने में लगे हुए हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ चुकी है.

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव का यह कहना कि राहत कैंपों में अब कोई दंगा पीड़ित नहीं हैबल्कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के षड्यंत्रकारी समर्थक हैं, उसी वर्चस्व की लड़ाई का एक पहलू है.

मुलायम एक ओर तो मुस्लिम वोट के लिए पुरज़ोर कोशिश में हैं और दूसरी ओर जाट वोट भी खोना नहीं चाहते. 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश से केवल चार सीटें मिली थीं, जबकि बहुजन समाज पार्टी को सात, भाजपा और राष्ट्रीय लोकदल दोनों को पांच-पांच और कांग्रेस को केवल दो सीट मिली थीं.

जाट वोट की खातिर

2012 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र से जहाँ मुलायम सिंह के दल को 23.8 प्रतिशत वोट मिले थे, बहुजन समाज पार्टी को उससे कहीं अधिक 28.7 प्रतिशत वोट मिले.

ऐसा तब है जब इस क्षेत्र में मुसलमान मतदाता 15 से 45 प्रतिशत हैं और 'मौलाना' मुलायम उनके हितों के सबसे बड़े रक्षक.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम मतदाता की बेरुखी देखते हुए ही समाजवादी पार्टी जाट (10 से 42 प्रतिशत) और अन्य पिछड़ी जाति (10 से 25 प्रतिशत) के मतदाता को जीतना चाहती है क्योंकि दलित जिनकी संख्या 15 से 30 प्रतिशत के बीच है, लगभग पूरी तरह मायावती के साथ हैं.

दंगा पीड़ितों के लिए यदि मुलायम को बहुत हमदर्दी नहीं है तो उसके पीछे जाट वोट को बचाना मुख्य उद्देश्य है. उनकी रणनीति साफ़ है- मुस्लिम मतदाता समझेगा कि भाजपा की बढ़ती लोकप्रियता को केवल समाजवादी पार्टी ही रोक सकती है इसलिए वे थोड़ा आश्वस्त हैं.

दूसरी ओर क्योंकि दंगों के बाद क्षेत्र में भाजपा का पलड़ा निश्चित रूप से भारी हुआ है, मुलायम का ध्यान जाट वोट पर केंद्रित है.

जाट वोट के लिए भूतपूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की 111वीं जयंती को भी समाजवादी पार्टी ने उसी दृष्टिकोण से मनाया.

23 दिसंबर को एक समारोह में मुलायम ने वैसे तो अपने विधायकों और कार्यकर्ताओं को नसीहत दी कि वे गुंडागर्दी बंद करें, किन्तु वे चरण सिंह की प्रशंसा करना नहीं भूले. उसी दिन उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रीय लोकदल के कार्यकर्ताओं को चरण सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने से रोका.

20 दिसंबर को समाजवादी पार्टी के महासचिव और मुलायम के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर चरण सिंह को भारत रत्न की उपाधि देने की मांग की. उसी दिन पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने एक बयान में कहा कि राजनीतिक दृष्टिकोण से मुलायम सिंह चरण सिंह के ज्यादा नज़दीक थे. 18 दिसंबर को प्रदेश सरकार ने चरण सिंह के जन्मदिवस 23 दिसंबर को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया.

राजनीतिक बाज़ीगरी

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वोट के लिए यह राजनीतिक बाजीगरी केवल मुलायम तक सीमित नहीं है. मुज़फ़्फ़रनगर में हुए दंगे चौधरी अजित सिंह के लिए भी उतने ही चिंताजनक हैं. संकल्प दिवस के रूप में मनाए गए 23 दिसंबर को राष्ट्रीय लोकदल ने मेरठ में एक जनसभा में अजित सिंह ने कहा, "यदि दोनों सम्प्रदायों के किसान एकजुट नहीं होते, तो आपकी पार्टी (राष्ट्रीय लोकदल) सत्ता में नहीं आ पाएगी."

उनकी चिंता वाजिब है. अभी तक उनकी पार्टी को दोनों ही संप्रदायों के वोट मिल रहे थे किन्तु दंगों की आंच उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है. अजित सिंह को यह भी चिंता होगी कि वे हरित प्रदेश की मांग को अमली जामा पहनाने में असफल रहे हैं. उस दिशा में मायावती ने विधानसभा से हरित प्रदेश के गठन के लिए प्रस्ताव पारित करवाकर अजित सिंह को पीछे छोड़ दिया था.

इस पूरे प्रकरण में यह तो तय है कि भाजपा को सीधा फायदा होगा. मायावती, जो इस मामले में ज़्यादा बयानबाजी नहीं कर रही हैं, को भी उम्मीद है कि अबकी मुसलमान और दलित वोटर यहाँ सात से कहीं अधिक सीट दिलवाएगा.

राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष नहीं चाहते हैं कि इस बार के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी के सांसदों की संख्या कम हो. समाजवादी पार्टी उनके लिए उतना ही बड़ा खतरा है जितनी भाजपा. देखना है मुज़फ़्फ़रनगर के दंगे किसको कितनी चोट पहुंचाते हैं.

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