नरेंद्र मोदी: राहत के बाद बढ़ेगी आफ़त?

नरेंद्र मोदी

गुजरात के गुलबर्ग सोसायटी मामले में एसआईटी की रिपोर्ट के ख़िलाफ़ अदालत में ज़किया जाफ़री की याचिका ख़ारिज होने को राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को मिली क्लीन चिट बताया जा रहा है. लेकिन क्या वाक़ई मोदी को क्लीन चिट मिल गई है?

इसके अलावा बृहस्पतिवार को केंद्र सरकार ने मोदी के ख़िलाफ़ लड़की की जासूसी के मामले में जाँच आयोग गठित हुआ है.

तो क्या मोदी की मुश्किलें 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले बढ़ने वाली हैं? मोदी की राजनीति पर करीबी नज़र रखने वाले पत्रकार इस पर क्या कहते हैं?

अहमदाबाद के वरिष्ठ पत्रकारों की राय में अदालत के फ़ैसले से मोदी की राह आसान तो हो गई है लेकिन संकट कम नहीं हैं. अभी गुलबर्ग सोसायटी के मामले में क्लीन चिट मिली है लेकिन स्नूपिंग का मामला आगे भी मोदी के परेशानी का कारण बनता रहेगा.

आकार पटेल, वरिष्ठ पत्रकार- अहमदाबाद

मैं इसे क्लीन चिट मानता हूँ. जब यह मुद्दा अदालत में गया था तो एसआईटी ने कहा था कि मोदी के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है. एसआईटी ने आगे काफ़ी अच्छा काम किया है. भाजपा के एक मंत्री (माया कोडनानी) को जेल में डाला है.

हम यह नहीं कह सकते कि उसका काम भेदभावपूर्ण है. एसआईटीकी जाँच-पड़ताल के बाद यह पता चला कि मोदी के ख़िलाफ़ व्यक्तिगत तौर पर कोई सबूत नहीं था या कम था.

यह सिर्फ़ एहसान जाफ़री के एक केस की बात है. जो 28 फ़रवरी 2002 को गुलबर्ग सोसायटी में हुआ था.

एसआईटी ने यह भी कहा है कि उनके ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं है. लेकिन अब मोदी को स्नूपिंग वाला मामला और तकलीफ देगा.

स्नूपिंग का मामला

Image caption गुलबर्ग सोसायटी मामले में मोदी को क्लीन चिट मिल गई है

जाँच आयोग गठित होने के बाद के बाद जासूसी का मामला आगे चलेगा. लेकिन यह मसला ख़तरनाक नहीं होगा क्योंकि यहाँ पर शिकार कौन है? जिस शख़्स की स्नूपिंग हुई थी, उसकी शादी हो चुकी है. वह नहीं चाहती कि इसमें जाँच और आगे बढ़े.

इस मामले में हमें यह कहा गया था कि कोई टेप हैं इसमें, जिसमें शायद मोदी हैं. यह 2009 की बात है और पिछले चार साल में ऐसा कोई टेप सामने नहीं आया है. इसलिए मुझे नहीं लगता कि आगे भी कुछ होगा.

लेकिन जाँच आयोग गठित होने के बाद कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि जाँच के बाद कोई चार्जशीट दायर हो और अमित शाह के ख़िलाफ़ मुक़दमा चले. वह उस समय गुजरात के गृह मंत्री थे. लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह बात उनके ख़िलाफ़ व्यक्तिगत तौर पर ख़तरनाक होगी.

अजय उमठ, वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार- अहमदाबाद

गुलबर्ग सोसायटी मामले में नरेंद्र मोदी को साफ़ क्लीन चिट मिल गई है. अब ज़किया जाफ़री चाहे हाईकोर्ट जाएं या सुप्रीम कोर्ट जाएं देश के लीगल सिस्टम को देखते हुए नहीं लगता कि अगले छह महीने में मोदी को कोई तकनीकी दिक्कत होगी. तब तक लोकसभा के चुनाव शांति से सपंन्न हो जाएंगे.

तो मोदी को लोकसभा चुनाव के लिए स्पष्ट रूप से साफ़ रास्ता मिल गया है, अब उनके लिए कोई बाधा नहीं होगी.

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जिस रफ़्तार से मामले चलते हैं, सुप्रीम कोर्ट ने यही फ़ैसला 2011 सितंबर में दिया था. तब से लेकर आज तक दिसंबर 2013 में देखें तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी बहस और रिपोर्ट दाख़िल करने में करीब दो साल चार महीने चले गए.

मुझे नहीं लगता कि चार महीने या छह महीने में सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट सीधे कोई फ़ैसला लेगी. यह जो फ़ैसला है करीब साढ़े तीन सौ पेज़ का, यह काफ़ी अच्छे रीजनिंग वाला तार्किक फ़ैसला है. इसलिए मुझे नहीं लगता है कि अगले एक-दो महीने में नरेंद्र मोदी के ऊपर कोई सीधा प्रभाव होगा.

ध्रुवीकरण से लाभ

Image caption गुजरात दंगों की छाया से मोदी को आसानी से राहत मिलने की संभावना नहीं दिखती

लेकिन मोदी पर गुजरात दंगों का साया हमेशा मंडराता रहेगा. मोदी ने इससे बचने की काफ़ी कोशिश की.

तकरीबन दो साल पहले साल 2011 सितंबर में 13 तारीख़ को यह फ़ैसला आया था. इसके बाद मोदी ने 16 सितंबर से तीन दिन का सद्भावना उपवास किया था. इसके पीछे उनकी एक मंशा अपनी छवि बेहतर बनाने की थी ताकि वह इस मामले से दूरी बना पाएं.

मोदी कहना चाहते थे कि मुझे सुप्रीम कोर्ट ने क्लीन चिट दे दी है और मैं अब मुसलमानों को साथ लेकर चलूँगा. इतना ही नहीं उनके सद्भावना मिशन में मुसलमानों को काफ़ी बड़ी संख्या में लाया जाता था. लेकिन बावजूद इसके आप देखिए उत्तर प्रदेश या बिहार में जो घटनाएं हो रही हैं, उससे नहीं लगता कि मोदी गोधरा कांड से पीछा छुड़ा पाएंगे.

यह साया उनके ऊपर मंडराता रहेगा और अब जिस तरीके से मोदी राम मंदिर बनाने की बात कर रहे हैं, अनुच्छेद 377 की बात कर रहे हैं ख़ुद भी उनको लगता है कि ध्रुवीकरण से उनको राजनीतिक लाभ मिलेगा. इसको उन्होंने एक राष्ट्रीय वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है.

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