'साहित्य की बौद्धिकता ख़तरे में है'

  • 1 जनवरी 2014
विनोद कुमार शुक्ल

हिंदी के मशहूर साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल बीते दिनों बीबीसी के स्टूडियो में आए. ‘नौकर की कमीज़’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ जैसी रचनाओं के रचयिता विनोद जी एक जनवरी को 77 वर्ष के हो गए हैं. इस मौके पर पढ़िए उनसे बीबीसी हिंदी के संपादक निधीश त्यागी और संवाददाता अमरेश द्विवेदी की बातचीत के अंश.

अमरेश- विनोद जी बीबीसी के स्टूडियो में आपका स्वागत है. सबसे पहले आपसे ये पूछना चाहूंगा कि आजकल आप क्या कर रहे हैं.

विनोद कुमार शुक्ल – आजकल मैं अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में हूं और वहां आवासीय लेखक हूं. जो काम घर में करता था वो अब वहां कर रहा हूं और वो काम है लिखने का. मैं दो उपन्यास वहां लिख रहा हूं.

एक तो किशोरों का उपन्यास है जो भोपाल से निकलने वाली चकमक पत्रिका में पहले से धारावाहिक प्रकाशित हो रहा है. इसके बाद जैसा मैं लिखता हूं वैसा ही एक दूसरा उपन्यास भी लिख रहा हूं.

विनोद कुमार शुक्ल से पूरी बातचीत सुनिए

मां ने बनाया लेखक

अमरेश – थोड़ा पहले जाकर यानी आपके जीवन की शुरुआत से अगर हम बात करें तो एक लेखक के बनने की, आपके लेखक बनने की प्रक्रिया कैसे शुरू होती है.

विनोद कुमार शुक्ल – ये बताना तो बहुत ज़्यादा मुश्किल है कि मैं लेखक कैसे बन गया. लेकिन तब भी घर में इस तरह का वातावरण तो ज़रूर था. सभी लिखते थे. मेरा ख्याल है कि किसी को पढ़ते हुए देखकर मेरी भी इच्छा होने लगी हो कि मैं भी लिखकर देखूं. मेरे चचेरे बड़े भाई कविताएं लिखा करते थे.

दूसरी ये बात है कि मेरी मां का बचपन जो है वो आज के बांग्लादेश के जमालपुर में बीता. मेरे नाना कानपुर के थे और किसी व्यापार के सिलसिले में बांग्लादेश चले गए थे. जब अम्मा नौ-दस साल की थीं तो लौट कर आ गईं. नाना की मौत हो गई थी. बल्कि दंगों वगैरह की वजह से उनकी हत्या कर दी गई थी.

तो अम्मा जब लौट करके आईं तो अपने साथ अपनी गठरी में वो कुछ बंगाल के संस्कार भी लेकर आईं. मेरी रुचि बनने में अम्मा का भी बहुत बड़ा हाथ है. जब मैं बहुत छोटा था तो मेरे पिता चल बसे थे, बहुत धुंधली यादें हैं उनकी. हमारा संयुक्त परिवार था.

एक बार बहुत मुश्किल से मैंने दो रुपए बचाए थे. मैंने अम्मा से पूछा कि अम्मा मैं इनका क्या करूं तो अम्मा ने मुझसे कहा कि कोई अच्छी किताब खरीद लो. और अच्छी किताब के रूप में उन्होंने शरत चंद्र का नाम लिया, बंकिम का नाम लिया, रवींद्रनाथ टैगोर का नाम लिया.

तब मैंने अपने बचाए हुए पैसों से सबसे पहली किताब ‘विजया’ ख़रीदी शरतचंद्र की. उस किताब को मैंने पढ़ने की कोशिश की. अम्मा हमेशा मुझसे कहती थीं कि जब भी पढ़ना तो संसार की सबसे अच्छी किताब पढ़ना. फिर बाद में उन्होंने खुद मुझसे कहा कि तुम अपने परिवार के बारे में ज़रूर लिखो.

उस तरह से मेरा ध्यान तो ज़रूर रहा कि मुझे लिखना है. लिखने की कोशिश में जब भी मैं किसी प्रकार की मुश्किल में पड़ता था तो मुश्किल तो ये होती थी कि ठीक-ठीक अपनी मौलिकता को पाना बहुत कठिन काम है. यानी आप लिखें तो अपना ही लिखें. तो इसकी शुरुआत बचपन से ही हो गई थी और इसका कारण भी अम्मा ही थीं.

एक बार क्या हुआ कि लिखते-लिखते भवानी प्रसाद मिश्र की ये पंक्ति ‘मैं गीत बेचता हूं’ मेरी कविता में आ गई. तो मेरे चचेरे बड़े भाई ने मुझसे कहा कि ये तो भवानी प्रसाद मिश्र की कविता की पंक्ति है ये तुम्हारे में कैसे आई. और वो कुछ नाराज़ भी हुए तो मुझे बहुत दुख हुआ.

मुझको चोरी से बहुत डर लगता था. संयुक्त परिवार में रहते थे. वहां हर किसी की चीज़ इधर से उधर हो जाया करती थी. हम लोग चूंकि आश्रित थे तो हर बार ये लगता था कि कहीं कोई ये न सोच ले क्योंकि परिवार में लोगों के पास अच्छी चीज़ होती थी, अच्छे खिलौने होते थे. दूसरे मेरे सारे चाचा काफी संपन्न थे. तो मेरे लिए बड़ी मुश्किल होती थी तो मुझे चोरी से बहुत डर लगता था.

जब अम्मा ने उस दौरान कहा कि कुछ कर क्यों नहीं रहे हो तब फिर मैंने यही कहा कि मैंने एक कविता लिखी, लेकिन न जाने कहां से उसमें भवानी प्रसाद मिश्र की कविता की पंक्ति आ गई, मैं तो नहीं जानता कि ये कैसे आ गई. 'मैं गीत बेचता हूं' ये बहुत लोकप्रिय कविता थी.

इन सब चीज़ों में अपनी याददाश्त में, अपने अंदर बस जानेवाली रचनाओं के बाद में अपनी रचनाओं को पाना बड़ा कठिन काम था. तब मैंने अम्मा से कहा कि फिर मैं क्या करूं. तो अम्मा ने मुझसे ये कहा कि “देखो अपनी छननी भी बनाओ. जैसे हम चाय बनाते हैं तो चाय की छननी होती है, आटे की छननी होती है, मैदे की छननी होती है, इसी तरह अलग-अलग चीजों की छननी होती है. तुम भी अपने लिखऩे की छननी बनाओ कि तुम्हारा लिखा ही तुम्हारे पास में रहे. दूसरों का लिखा तुम्हारे पास में न आए.”

Image caption बीबीसी हिंदी संपादक निधीश त्यागी और विनोद कुमार शुक्ल स्टूडियो में इंटरव्यू के दौरान.

तो एक अतिरिक्त किस्म की छान देने वाली ज़िम्मेदारी मेरी रचना के साथ में स्वत: पता नहीं कैसे आई, ये मैं नहीं जानता. इस बात की कोशिश रहती थी कि दूसरे का लिखा मेरे लिखे में न आ जाए. अपने लिखे पर बार-बार ज़ोर देने से इसकी शुरुआत हुई.

अमरेश – कितनी उम्र रही होगी उस समय आपकी?

विनोद जी – मेरा ख्याल है कि 12-13-15 साल की उम्र रही होगी कि मैं ठीक-ठीक से कविता लिख रहा हूं या कहानी लिख रहा हूं.

फैंटेसी

अमरेश – हिंदी साहित्य में कहा जाता है कि आपकी रचनाओं में मैजिक रिएलिज़्म है यानी एक तरह का जादुई संसार उसमें उभर कर आता है. जो भी क्रांतदर्शी, यथार्थवादी लेखक होता है वो बहुत इमैजिनरी होता है, वो सोचता है और यथार्थ को लिखने की कोशिश करता है. इस मैजिक रिएलिज़्म की शुरुआत कहां से कैसे हुई?

विनोद जी – जादुई स्थितियां जिसको कहा जाता है ये एक बहुत अद्भुत चीज़ है. ये कहीं से आता नहीं है, ये अपने आप होता है. हम जो नहीं कर सकते उसको करने की कोशिश करते हैं. चिड़िया उड़ सकती है लेकिन हम नहीं उड़ सकते लेकिन उड़ने की कल्पना तो कर सकते हैं.

तो ये जादुई स्थितियां शुरू से हैं, ये कहीं बाहर से नहीं आतीं. अभी साहित्य में जिस तरह की स्थितियां हैं, यथार्थ के पीछे लोग हाथ धोकर पड़ गए हैं.

लेकिन ज़िंदगी में यदि केवल यथार्थ हो तो जीना बहुत मुश्किल हो जाएगा. जब हम कहीं किसी कठिनाई में होते हैं, बहुत दुखी होते हैं, बहुत परेशान होते हैं तो किसी बहुत क़रीबी व्यक्ति के पास जाते हैं और ये सोचकर अपना दुख उससे कह देते हैं कि दुख हल्का हो जाएगा और हमारा क़रीबी समझे के लिए यही कहता है कि सब ठीक हो जाएगा. तो ‘सब ठीक हो जाएगा’ ये जो कथन है यही सबसे बड़ी फैंटेसी है. और सब ठीक कभी नहीं होता है.

लेकिन यथार्थ से लड़ने का ये सबसे बड़ा हथियार भी है जो हमें ताक़त देता है. बिना इस ताक़त के हम यथार्थ के साथ लड़ नहीं सकते. तो फैंटेसी को एक ताक़त मानकर चलना चाहिए. यथार्थ एक तरह से आपको इतना व्यवहारिक बनाने की कोशिश करता है, डराता है कि आप उसके साथ कभी नहीं लड़ सकते. घर के सामने अगर किसी की हत्या होती हो तो हम सारे खिड़की दरवाज़े बंद कर लेंगे. हम बाहर निकल कर नहीं आएंगे, कोई बाहर नहीं आएगा.

लेकिन इसी हत्या को हम किसी नाटक में देखें या किसी कथा में पढ़ें तो उसके प्रति हम दूसरे तरीके से ताकत पाते हैं और शायद ये ताकत हमारी समझ की है. यथार्थ से लड़ने की ताकत तो तभी आएगी जब हमारी समझ बनेगी और रचना ये समझ हमको देती है.

अमरेश – कहा जाता है कि मुक्तिबोध ऐसे लेखक थे जिन्होंने अपने समय से आगे देखा और चूंकि उस देखे हुए को वो उस तरह से नहीं कह सकते थे इसलिए शायद उन्होंने फैंटेसी का आवरण लिया. तो वो जो फैंटेसी है, वो जो बुनावट है, वो जो बात कहने की कला है और जिसमें बहुत गहरी बात कहने की कला है, उसकी प्रेरणा आपमें कहीं है क्या?

विनोद जी – देखिए प्रेरणा तो सब जगह है. किसी की रचना दूसरे की रचना की प्रेरणा होती है. प्रभाव दूसरी चीज़ है, मौलिकता दूसरी चीज़ है. एक अच्छा प्रभाव अच्छी प्रेरणा ही है लिखने की. अगर ये न हो तो आदमी अपनी रचना के साथ अकेला हो जाएगा. रचना हमें उस तरह से अकेला होने का मौक़ा नहीं देती है.

हम जब भी अकेले होते हैं तो कोई न कोई रचना हमारे साथ होती है. जहां तक आपने फैंटेसी की बात की, मुझे लगता है कि ये जन्मजात जैसी स्थिति है. किसी नवजात बच्चे के सामने तो यथार्थ पूरी तरह से गैरहाज़िर है, वो तो बिल्कुल नहीं जानता यथार्थ को. तब भी उसमें बुद्धि तो होती है, तब भी वो सोचता तो ज़रूर होगा. मेरा ख़्याल है कि उसके आसपास जो कुछ भी है वो सब फैंटेसी ही है. मां भी एक फैंटेसी के रूप में उसके पास होती है.

धीरे-धीरे वो फैंटेसी जो है वो यथार्थ के रूप में चुनाव और अनुभव के ज़रिए वो पाता है. तो यथार्थ तो एक ऐसा अनुभव है जो धीरे-धीरे आदमी अपने साथ जीने की स्थितियों में उसके क़रीब होता हुआ चला जाता है और अनुभव का संसार उसका इकट्ठा और बड़ा होने लगता है.

लेकिन तब भी जितना वो इकट्ठा कर पाता है वो बहुत थोड़ा होता है. हमें हर हालत में अपनी कल्पना का भी विकास करना होता है और यथार्थ के साथ ही कल्पना का विकास होता है.

रचना में लेखक

अमरेश – आपकी जो दो प्रमुख रचनाएं हैं ‘नौकर की कमीज़’ और ‘दीवार में खिड़की रहती थी’, चाहे वो संतू बाबू हों या रघुबर बाबू, इन दोनों में विनोद कुमार शुक्ल कितने हैं.

विनोद जी – मेरा ख़्याल है कि पूरे हैं. रचनाकार अपनी रचना में पूरा होता है. जो नहीं होता है वह भी होता है, जो होना चाहिए वह भी होता है. जब हम लिखते हैं तो सबसे पहले हमारी नज़र अपने पर पड़ती है, अपनी ज़िंदगी पर पड़ती है, अपने होने पर पड़ती है. लेकिन इस अपने होने में दूसरे भी शामिल होते हैं. परिवार, पास-पड़ोस, दुनिया सब पर हमारी नज़र पड़ती है. अपनी ज़िंदगी को दूसरों की ज़िंदगी के साथ जोड़कर हम सारा कुछ जान लेना चाहते हैं. और फिर हम वही बताते हैं जो लगता है कि इसके बारे में बता देना चाहिए.

निधीश – मैं ये पूछना चाहता था कि आपके लेखन में जो सहजता है, एक ग़ज़ब का कौतुक उसमें हमेशा दिखाई पड़ता है. कुछ से मैं खुद को जोड़ पाता हूं क्योंकि जीवन का कुछ हिस्सा मेरा छत्तीसगढ़ में बीता है. आप अपनी अनुभूतियों को कैसे बढ़ाते हैं. आपके भीतर बहुत सारा जंगल, प्रकृति और पृथ्वी है जो दुनियादारी, शहर और महानगर से बचा हुआ है. उसे आप कैसे बचाकर रखते हैं और आगे बढ़ाते हैं और बदले में वो आपको कैसे बदलता है.

विनोद जी – मैं जब भी लिखने की कोशिश करता हूं तो मेरे सामने एक दृश्य होता है. मैं लिखे जानेवाले संसार की बात सोचता हूं अपने संसार से. मेरा लिखने का जो कुछ भी भूगोल है वह सारा छत्तीसगढ़ का है. अगर कहीं दूसरे देश में होता हूं तो वहां के अनुभवों को भी छत्तीसगढ़ से ही जोड़कर देखता हूं. जब मैं पहली बार विदेश गया तो वहां के सूर्योदय को मैंने छत्तीसगढ़ के सूर्योदय जैसा ही पाया. कह सकता हूं कि मेरी वैश्विकता छत्तीसगढ़ की ही है, दूसरी वैश्विकता पाना मेरे लिए बहुत कठिन है.

निधीश – आपकी रचनाओं में गति और शोर नहीं है. गति और शोर के बाहर की जो दुनिया है और जिसमें हम रहते हैं उससे खुद को काट कर रख पाना आपके लिए कैसे संभव होता है.

विनोद जी – देखिए जीवन जीने में भी मैं इनसे बचता हूं तो शायद ये कारण होगा कि लिखते समय भी मैं इससे बचता हूं. मैंने आपसे कहा था कि मैं अपने बारे में ही लिखता हूं. ‘नौकर की कमीज़’ के बहुत बाद में जो उपन्यास मैंने लिखा ‘हरी घास की छप्पर वाली झोपड़ी और बौना पहाड़’ में आया. फिर उसके बाद ‘खिलेगा तो देखेंगे’ आया और अभी जो उपन्यास मैं लिख रहा हूं उसमें शायद मेरा बुढ़ापा आएगा. तो जिस तरह जीने की मेरी अपनी इच्छा-सी बन गई है, मेरा ख़्याल है कि मेरे रचना संसार में भी वैसी ही स्थितियां नज़र आती हैं या शायद मैं वैसा ही लिखना पसंद करता हूं.

निधीश – आपकी रचनाओं के जो मुख्य चरित्र हैं उसमें कोई अच्छा या बुरा नहीं है. वो सामान्य से लोगों की दिलचस्प कहानियां हैं. उनमें आप कहीं किसी का पक्ष लेते नज़र नहीं आते, कोई संदेश देते नज़र नहीं आते.

विनोद जी – मैं कोई उस तरह का संदेश नहीं देता. मेरे पास उस तरह से बताने के लिए कुछ भी नहीं है. मुझे लगता है कि मेरी कोई ज़िम्मेदारी अगर बनती है तो वो मनुष्य होने की ज़िम्मेदारी है. मेरा अत्यंत सामान्य जीवन रहा. कोई उस तरह की बड़ी घटना नहीं हुई. दुख तो मुझको भी मिला है जीवन जीने में, लेकिन मैं अपने दुख को बहुत छोटा मानता हूं. मेरा दुखी न होना उतना उसमें कहीं न कहीं आशा ज़रूर है. मैं अपनी रचनाओं में उसी आशा के साथ खड़ा हूं.

निधीश – मुक्तिबोध से आपकी मुलाकातें हुई होंगी. क्या आप बताना चाहेंगे कि वो कैसी मुलाकातें थीं.

विनोद जी – संभवत: सन् 1958 में मुक्तिबोध राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में आए थे. मेरे बड़े भाई जिनका हाल ही में निधन हो गया वो वहां एमए के विद्यार्थी थे. मुझे तब जानकारी नहीं थी कि मुक्तिबोध इतने बड़े कवि हैं. मेरे चाचाजी कॉलेज के पहले प्राचार्य थे. तो उनके पास एक किताब मैंने देखी जिसमें अज्ञेय ने वह किताब मुक्तिबोध को सप्रेम भेंट की थी.

तब तक मैंने अपनी कविता उन्हें नहीं दिखाई थी लेकिन ये चर्चा थी कि मुक्तिबोध एक बड़े कवि के रूप में राजनांदगांव आए हुए हैं. मेरे बड़े भाई मुझे लेकर उनके पास गए. मैंने उन्हें अपनी कविताएं दिखाईं. सबसे पहले मेरी कविता देख कर उन्होंने कहा कि ये कविताएं लिखना बहुत मुश्किल काम है.

उन्होंने कहा कि पहले अच्छी पढ़ाई-लिखाई करनी चाहिए और नौकरी कर लेनी चाहिए. उसके बाद में सोचना चाहिए कि कविता वगैरह करनी है या नहीं करनी है. मुझे लगा कि मेरी कविताएं उन्हें पसंद नहीं आईं. लेकिन मैंने लिखना बंद नहीं किया.

बाद में उन्होंने मुझे एक बार बुलवाया और मेरी आठ कविताओं को पढ़ने के बाद उन्हें श्रीकांत वर्मा के पास भेज दिया जो प्रकाशित हुर्ईं. ये मेरी कविताओं का पहला प्रकाशन था. बाद में मुक्तिबोध जी ने मुझे अपनी कविताओं का पाठक भी माना. उन्हें लगता था कि वो मुझे अपनी कविताएं सुना सकते हैं. मैं उनकी कविताएं समझ तो नहीं पाता था लेकिन यही सोचकर सुनता था कि मैं एक बड़े रचनाकार की कविताएं सुन रहा हूं.

निधीश – ‘दीवार में खिड़की रहती थी’ का नाट्य रूपांतर हुआ या फिर ‘नौकर की कमीज़’ पर फिल्म बनी. अब आपकी किताब के अंग्रेज़ी अनुवाद आ रहे हैं. मेरा सवाल है कि जो लोग छत्तीसगढ़ में नहीं रहे वो लोग जब आपकी रचनाओं को अलग-अलग रूप में अपनाते हैं तो रचना की पारिस्थितिकी के साथ कितना न्याय कर पाते हैं.

विनोद जी – वैसा नहीं हो पाता है. बदल देते हैं. स्थितियां बदल जाती हैं. कई बार मुझको लगता है कि जो मूल रचना है वो आधार रचना जैसी बन जाती है. वो एक घटना जैसी बन जाती है और अनुवाद जो है वो उस घटना के क़रीब दूसरी घटना सी बन जाती है. कुछ तो इतना बदल देते हैं कि लगने लगता है कि ये कैसा अनुवाद है.

जहां तक मेरी रचनाओं पर फिल्म निर्माण की बात है तो मेरा मानना है कि फिल्म निर्देशक की ही कृति है. मणि कौल ने ‘नौकर की कमीज़’ पर जो फिल्म बनाई वो उनकी अपनी कृति है. यहां न्याय या अन्याय जैसी बात नहीं होनी चाहिए. अनुवाद की बात अलग है.

निधीश – कई भाषाओं के लेखकों की रचनाएँ अंग्रेज़ी में अनुदित हो कर आ रही हैं. मुरोकामी जापान से अंग्रेज़ी में आए, कई ईरानी रचनाकारों की रचनाएं भी अंग्रेज़ी में आ रही हैं, लैटिन अमरीकी लेखकों की रचनाएं हम पढ़ पा रहे हैं, लेकिन हिंदी की रचनाओं के साथ ये बात क्यों नहीं दिखाई पड़ रही है.

विनोद जी – हिंदी तो दबी ज़बान के रूप में ही रही. लेकिन एक दिन इस पर नज़र ज़रूर पड़ेगी मजबूरी में ही. मेरा मानना है कि दूसरी भाषाओं में जैसा लिखा जा रहा है उससे हिंदी का स्तर कम नहीं है. लेकिन ये सच है कि हिंदी की रचनाओं का जितना और जैसा अनुवाद होना चाहिए वैसा नहीं हो रहा. ये हिंदी के लिए क्षति वाली बात है.

निधीश – हिंदी का तेज़ी से उभरता एक साक्षर समाज खड़ा हुआ है. लेकिन बौद्धिक विमर्श की जगह हमारे घरों में, हमारे मोहल्लों में सिमटी है, बदली है या कम हुई है. आपको क्या लगता है.

विनोद जी – बौद्धिक विमर्श की स्थितियां हिंदी में सचमुच कम हुई हैं. मुझे लगता है कि हमारे यहां गप्प की राजनीति ज़्यादा है. ऐसा लगता है जैसे हमारी सारी चिंता राजनीति में ही समाप्त हो जाती है. हम अधिक से अधिक बौद्धिक होने की कोशिश करें ऐसी कोई कोशिश नज़र नहीं आती. साहित्य में ये बात है हालांकि विज्ञान की बौद्धिकता बची हुई है, दूसरे विषयों की बौद्धिकता बची हुई है लेकिन साहित्य की बौद्धिकता खतरे में है.

हम ज़िंदगी को मनोरंजन के स्तर पर ज्यादा जीने की कोशिश करते हैं. मनोरंजन हमारी ज़िंदगी का ऐसा हिस्सा हो गया है जैसे उसके बिना हमारा पेट भरता नहीं है. साहित्य, बौद्धिकता या विमर्श हमारे परिवार की परंपरा नहीं बनी है. हमें अपने बच्चों से बौद्धिक तौर पर बातचीत करनी चाहिए. मैं अपनी नतिनी के साथ पूरी बौद्धिकता के साथ बातचीत करता हूं.

अमरेश – आज के भूमंडलीकरण, निजीकरण के दौर में हिंदी का भविष्य क्या देखते हैं आप.

विनोद जी – हिंदी अपने दम पर आगे बढ़ रही है. इसका जीवन बहुत छोटा क़रीब 100 साल का है. दक्षिण की कई आंचलिक भाषाएं हिंदी से भी पुरानी हैं. एक बात है जब तक राष्ट्रीयता नहीं बनेगी, तब तक आंचलिकता भी नहीं बनेगी. जब तक ठीक-ठीक आंचलिक नहीं होंगे तब तक राष्ट्रीय भी होना मुश्किल है. हमारी राजनीति ने आंचलिकता को भी ख़राब किया है और राष्ट्रीयता को भी ख़राब किया है.

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