पश्चिम बंगाल के जंगलों में जानवरों का ख़ास दोस्त

  • 5 जनवरी 2014
रंजन तालुकदार, वन विभाग

कहा जाता है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता. लेकिन समय-समय पर कुछ लोग अपनी लगन और दृढ़संकल्प के बूते अपने दम पर कुछ नया करने का साहस दिखाते हैं. रंजन तालुकदार भी ऐसे ही लोगों में से हैं.

पेशे से फ़ॉरेस्ट रेंजर रंजन तालुकदार ने अपनी सरकारी नौकरी की ज़िम्मेदारियों से ऊपर उठते हुए इंसान और जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष पर अंकुश लगाने की दिशा में जो काम किया है, उसे लोग एक मिसाल समझते हैं.

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से कोई आठ सौ किलोमीटर दूर जलपाईगुड़ी और कूचबिहार ज़िलों में फैला है एक सींग वाले गैंडों के लिए मशहूर जलदापाड़ा नेशनल पार्क. रंजन इसी में फ़ॉरेस्ट रेंजर के पद पर तैनात हैं.

सिकुड़ते जंगल

उत्तर बंगाल के नाम से परिचित इस इलाके में जंगल, वन्यजीव अभयारण्यों और नेशनल पार्कों की भरमार होने की वजह से देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां भी इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष की घटनाओं में तेज़ी आई है. तेज़ी से कटते जंगल की वजह से जानवरों के घर यानी जंगल लगातार सिकुड़ रहे हैं.

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यही वजह है कि भोजन की तलाश में हाथी और दूसरे जानवर अक्सर जंगल से बाहर निकल कर नजदीक की बस्तियों में पहुंचते रहते हैं. इस दौरान अपनी जान बचाने के लिए लोग कई बार इन जानवरों को मार भी देते हैं. लेकिन अकेले रंजन की वजह से जलदापाड़ा में ऐसी घटनाओं पर काफी हद तक अंकुश लगाया जा सका है.

रंजन जानवरों के सिकुड़ते घर को बचाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं. वह कहते हैं, "जंगलों की कटाई और दूसरी वजहों से जानवर भोजन की तलाश में अक्सर इंसानी बस्तियों में पहुंच जाते हैं और जान-माल का नुकसान करते हैं. लेकिन मैं चाहता हूं कि इंसान और जानवरों का सह-अस्तित्व बना रहे."

जंगल बचाने की ज़रूरत

वह कहते हैं कि जंगल से सटी बस्तियों में स्थानीय लोग पीढ़ी दर पीढ़ी जानवरों के साथ रहने-जीने के अभ्यस्त हैं लेकिन जंगल के सिकुड़ने की वजह से अब इन दोनों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं. इन पर अंकुश लगाने के लिए जहां जंगल को बचाना ज़रूरी है, वहीं इंसानों को यह याद दिलाना भी ज़रूरी है कि हमारे पर्यावरण के लिए जंगल और दूसरे जीव भी काफी महत्वपूर्ण हैं.

इस इलाके में पहले हाथियों का काफी उत्पात था. हाथियों का झुंड अक्सर इंसानी बस्तियों में पहुंच कर तोड़-फोड़ करता था और खड़ी फसलों को नष्ट कर देता था.

रंजन की पहल पर इलाके की बस्तियों में कंटीले तारों की बाड़ लगाई गई. इससे यह नुकसान काफी हद तक कम हो गया है. बाड़ लगाने का यह खर्च वन विभाग और बस्ती वालों ने मिल कर उठाया था.

रंजन बताते हैं, "अब इलाके में जंगली भैंसों के इंसानी बस्तियों में पहुंचने की समस्या बढ़ रही है. दरअसल, जंगल में इन भैंसों की आबादी हाल के वर्षों में काफी बढ़ी है." इसके अलावा तेंदुए इन बस्तियों में घुस कर बकरी और दूसरे जानवरों को उठा ले जाते हैं.

जंगल से सटी बस्तियों में ऐसे मामलों में वन विभाग बस्तीवालों को मुआवजा देता है. रंजन के मुताबिक, पिछले साल तेंदुए के हमले की 100 घटनाएं हुईं.

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रंजन इस बात का ख्याल रखते हैं कि जंगल पर इंसानों का अवैध कब्ज़ा नहीं हो. वह कहते हैं, "जंगल में रहने का हक़ जानवरों का है. हम अब उनके घर में अतिक्रमण नहीं कर सकते." तालुकदार ने इलाके में बसी कम से तीन अवैध बस्तियों को हटाया है.

अतिक्रमण हटाने में कामयाब

इसमें उनको काफी दिक्कतों से भी जूझना पड़ा. रंजन बताते हैं, "हर जगह कुछ न कुछ शरारती तत्व होते ही हैं."

उन बस्तियों को हटाने की कोशिश के दौरान उनको धमिकयां भी मिलीं. लेकिन वे अपने संकल्प से नहीं डिगे. आखिर में बस्ती के लोगों को जंगल छोड़ कर जाना पड़ा. अब जलदापाड़ा में अवैध अतिक्रमण और शिकार की घटनाएं लगभग नहीं के बराबर होती हैं.

लेकिन आखिर उनके मन में इसका ख्याल आया कैसे ? इस सवाल पर रंजन बताते हैं कि साल 1989 में वन विभाग की नौकरी में आते समय ही मैंने मन में ठान लिया था कि मुझे जानवरों के घर से इंसानों का अवैध अतिक्रण हटाना है.

11 साल पहले जलदापाड़ा में पोस्टिंग होने पर उन्होंने देखा कि पार्क के भीतर भूटिया लोगों की बस्तियां तेजी से बढ़ रही हैं. इससे वन्यजीव संरक्षण का काम भी प्रभावित हो रहा था. रंजन ने धीरे-धीरे उन तमाम बस्तियों को पार्क से हटा कर दूर बसाया.

वह बताते हैं कि इस अभियान के दौरान उन पर अमानवीय होने के भी आरोप लगे. लेकिन उनका कहना था कि जानवरों के घर में इंसानों का अवैध अतिक्रमण नहीं चलेगा.

जंगल और जानवरों से रंजन का लगाव इलाके में सब लोग जानते हैं. नेशनल पार्क के जानवर भी उनको पहचानने लगे हैं. रंजन को अब जंगल से बाहर जाना भी अच्छा नहीं लगता.

जारी है मिशन

वह कहते हैं, "शहर में अपने घर जाने पर मैं बेसब्री से जंगल में लौटने का इंतज़ार करता हूं." तालुकदार घंटों जंगल में जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करते हैं.

वह कहते हैं, "हाथियों के झुंड में जो मूल्य कायम हैं उनको इंसान भी अपना सकता है. कई बार हाथी इंसान से ज़्यादा बुद्धिमानी का परिचय देते हैं. वे संकट में एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते. हमारा समाज भी इसे अपना सकता है."

(गुप्तचर या मासूम जानवर)

तालुकदार के साथी भी मानते हैं कि रंजन ने जलदापाड़ा को अवैध बस्तियों से मुक्त कराने और शिकार पर अंकुश लगाने में अहम भूमिका निभाई है. नौकरी से रिटायर होने के बाद भी रंजन जानवरों का घर बचाने का अपना काम जारी रखना चाहते हैं.

वह कहते हैं, "अब तो जंगल ही मेरा घर है. सरकार ने अनुमति दी तो मैं रिटायर होने के बाद भी अपना अभियान आगे बढ़ाता रहूंगा." शायद जलदापाड़ा के जानवर भी समझ गए हैं कि रंजन के रहते न तो उनकी जान को कोई ख़तरा है और न ही उनके घर में अतिक्रमण का.

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