दलितों की आवाज़ बन रहा 'दलित कैमरा'

  • 23 मार्च 2014
भारत के दलित इमेज कॉपीरइट AP

यू ट्यूब पर 'दलित कैमरा' नाम से एक चैनल है, जो भारत के दलितों को समर्पित है. दलितों के लिए यह अपनी बात रखने का एक ज़रिया बन गया है. इसकी पड़ताल कर रही हैं वन्या मेहता.

दक्षिण भारतीय राज्य केरल के शहर कोट्टायम में माइक लेकर खड़ी महिला अधिकार कार्यकर्ता और दलितों के मुद्दे उठाने वाली रेखा राज कहती हैं, ''मेरा मानना है कि दिल्ली में एक छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार को लेकर हुए प्रदर्शन का मध्य वर्ग के गुस्से के अलावा कोई राजनीतिक महत्व नहीं है.''

राज पिछले साल दिल्ली में 23 साल की एक पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के खिलाफ चले धरना-प्रदर्शन और मीडिया कवरेज के महत्व को लेकर दलित कैमरा पर अपनी बात रख रही हैं.

दलितों की स्थिति

हिंदू जाति व्यवस्था में दलितों को सबसे नीचे और ग़रीब माना जाता है. भारत की आबादी में उनकी हिस्सेदारी क़रीब 16 फ़ीसदी है. कई बार उनकी इच्छा के खिलाफ उन्हें काम करने और कम भुगतान लेने के लिए मजबूर किया जाता है. कई सकारात्मक परियोजनाओं के बाद भी दलितों को लगातार भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है.

दलित कैमरा, एक अछूत की नजर से भारत में जीवन की सच्चाइयों को देखने और उनके ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण का एक प्रयास है.

इसकी स्थापना भाथरन रविचंद्रन ने की थी. वे आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद की इंग्लिश एंड फॉरेन लैंग्वेज़ यूनिवर्सिटी (ईएफ़एलयू) में अंग्रेजी विषय में शोध कर रहे हैं.

दो साल पहले बने इस चैनल को 23 लोगों की एक टीम चलाती है. इस टीम के पास चार वीडियो कैमरे हैं और 14,00 लोग इसके ग्राहक हैं. इसके कुछ वीडियो को 50 हज़ार से भी अधिक बार देखा गया है.

रविचंद्रन हाथ से मैला साफ़ करने वाली जाति के हैं. ये लोग उन घरों से मानव मल को अपने हाथों से हटाते और उठाते हैं, जिनमें आधुनिक शौचालय नहीं हैं.

दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के अपने ज़िले में इतनी अधिक शिक्षा पाने वाले वे इस जाति के पहले व्यक्ति हैं. वो बताते हैं कि विश्वविद्यालय परिसर में 20 छात्रों के एक समूह ने उन पर हमला किया था. इसके बाद से उन्होंने दलित उत्पीड़न की घटनाओं की वीडियों रिकार्डिंग शुरू की.

रविचंद्रन कहते हैं, ''उस घटना ने वास्तव में मेरे जीवन को बदल दिया.''

इंटरनेट पर आवाज़

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वो कहते हैं कि दलित आंदोलन और दलित उत्पीड़न की घटनाओं को मुख्य धारा की मीडिया में जगह नहीं मिलती है. इसलिए दलित कैमरा के जरिए उन्होंने "दलितों को इंटरनेट पर एक आवाज़ देने का फ़ैसला किया.''

इन कार्यकर्ताओं में से कुछ आरोप लगाते हैं कि निचली जाति की महिलाओं को अपने खेतों में काम देने वाले ऊंची जाति के ज़मींदार कई बार उन महिलाओं के साथ यौन हिंसा भी करते हैं. लेकिन इन महिलाओं के पास अपनी बात रखने का कोई ज़रिया नहीं है, इसलिए ये घटनाएं मीडिया में ख़बर नहीं बन पाती हैं.

वहीं अन्य लोगों का मानना है कि भारत में महिलाओं की समस्या जाति और वर्ग से बड़ी समस्या है.

महिला और बाल अधिकार कार्यकर्ता लिंकन सुबुद्धी ने अपने साथियों को दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड के बाद महिलाओं की स्थिति को लेकर दलित कैमरा पर बोलने के लिए प्रेरित किया है.

असुरक्षित महिलाएं

वो कहती हैं, ''बलात्कार होने के लिए जाति कोई कारण नहीं है. आज हर महिला असुरक्षित है.''

ईएफ़एलयू में दलित अध्ययन के प्रोफ़ेसर के सत्यनाराणन कहते हैं कि दलित कैमरा न केवल दलित महिलाओं की दुर्दशा बल्कि बल्कि अन्य विवादास्पदों मुद्दों पर भी सूचनाएं उपलब्ध कराता है.

इस चैनल पर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक अरुंधति रॉय, दलित संगीत, दक्षिण भारतीय सिनेमा उद्योग में पुरुषों के वर्चस्व पर बोलने वाली एक सी ग्रेड अभिनेत्री का भी वीडियो है.

इससे पहले दलितों की आवाज उठाने के किसी अन्य प्रयास को ऐसी सफलता मिलती नहीं दिखी है.

साल 1997 में पुनिता पांडियन ने तमिलनाडु में 'दलित मासुरा' के नाम से एक अख़बार शुरू किया था लेकिन वह चल नहीं पाया. क्योंकि दुकानदार उसे बेचने से मना कर देते थे. वे अपने आप को दलित संघर्ष से नहीं जोड़ना चाहते थे.

प्रोफ़ेसर सत्यनारायण कहते हैं कि साल 2011 में यू ट्यूब पर लांच होने के बाद से दलित चैनल ने आंध्र प्रदेश के बाहर भी लोगों को आकर्षित किया है. यह चैनल केरल और पश्चिम बंगाल में पहले से ही मशहूर है. अब यह धीरे-धीरे अन्य राज्यों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मशहूर हो रहा है.

वो कहते हैं, ''दलित कैमरा मेनस्ट्रीम हो गया है. आज इसकी जितनी पहुँच है, उसकी मैं कल्पना तक नहीं कर सकता था.''

(वन्या मेहता एक स्वतंत्र पत्रकार हैं और बोस्टन में रहती हैं)

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