असम: जातीय हिंसा में 16 मरे, हज़ारों का पलायन

भारत के उत्तरी पूर्वी राज्य असम में दो समुदायों की बीच हुई झड़प में अब तक सोलह लोगों की मौत हो चुकी है.

कारबी और रेंगमा नागा समुदाय के तीन हज़ार से ज़्यादा लोगों ने राहत शिविरों की शरण ली है.

पिछले कुछ सालों से असम में समय-समय पर सामुदायिक और अलगाववादी संघर्ष होते रहे हैं.

राज्य की सामुदायिक झड़पों की मुख्य वजह प्रतिद्वंदी जनजातीय समुदायों के बीच किसी ख़ास हिस्से पर कब्ज़े की कोशिशें हैं.

असम के पुलिस अधिकारी एमजे महंता ने बीबीसी को बताया कि कारबी आंगलोंग ज़िले के स्थानीय स्कूलों में बने शरणार्थी शिविरों में करीब 1600 रेंगमा नागा समुदाय के और करीब 1500 करबी समुदाय के लोगों ने शरण ली हुई है.

कड़ाके की ठंड और कैंप

कारबी आंगलोंग ज़िले के मुख्य शहर दीपहू में एक समाचार पत्र को संपादित करने वाले सुशांता रॉय ने कहा, "शरणार्थी शिविरों में रहने वाले ग्रामीणों को आधारभूत सुविधाएं मसलन भोजन और कपड़े नहीं मिल रहे हैं और उन्हें भीषण सर्दी में रहना पड़ रहा है."

ग्रामीणों का पलायन राहत शिविरों में पिछले महीने से हो रहा है जिसमें दोनों समुदायों के बीच संघर्ष हो रहा है.

27 दिसंबर को करबी पीपल्स लिबरेशन टाइगर्स (केपीएलटी) के विद्रोहियों ने कारबी आंगलोंग ज़िले के बोकाजन इलाके के रेंगमा गाँव पर हमला कर छह रेंगमा नागाओं की हत्या कर दी जिसमें पांच महिलाएं शामिल थीं.

केपीएलटी करबी समुदाय के लोगों के लिए अलग राज्य की मांग कर रही है.

बृहतर नागालैंड की मांग

स्थानीय लोगों के मुताबिक प्रतिद्वंदी रेंगमा नागा हिल प्रोटेक्शन फोर्स (आरएनएचपीएफ) ने तुरंत हमले का जवाब करते हुए केपीएलटी के तीन सदस्यों की हत्या कर दी.

विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हिंसा की वजह करबी समुदाय के विद्रोहियों का रेंगमा नागा समुदाय के आधिपत्य वाले इलाके पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिशें हैं.

इस हिंसा से अलग पड़ोसी नागालैंड में भी सात कारबी समुदाय के लोगों के शव मिले हैं, जिसमें एक छात्र नेता का शव भी शामिल था.

नागालैंड स्थित अख़बार ईस्टर्न मिरर की संपादक बानो हरालू ने कहा, "जिन लोगों के शव मिले, उनके हाथ पीछे करके बंधे हुए थे और उनके सिर में गोली मारी गई थी. इससे बंधक बनाकर हत्या किए जाने के संकेत मिलते हैं."

नागालैंड पुलिस के मुताबिक इन हत्याओं के पीछे किसका हाथ हो सकता है, यह साफ नहीं है.

हिंसा का असर

असम सरकार ने हत्या का आरोप मुख्या नागा विद्रोही गुट, नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैंड (एनएससीएन आई-एम) पर लगाया है जो राज्य सीमा के बाहर से रेंगमा नागा विद्रोही गुट का समर्थन करता है. हालांकि इस समूह ने इस हत्याकांड में संलिप्ता से इनकार किया है.

एनएससीएन आई-एम भारत सरकार से पिछले 15 साल से बृहतर नागा राज्य के गठन की मांग के साथ बातचीत कर रहा है. इस राज्य में असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के नागा बहुल समुदाय के इलाकों को शामिल करने का प्रस्ताव है. नागालैंड का गठन वर्ष 1963 में अलगाववादी हिंसा के बाद हुआ था.

असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश की सरकारें और राजनीतिक दल एनएससीएन की मांगों का विरोध करते रहे हैं. इन सबका कहना है कि वे नागालैंड में मिलाने के लिए अपना हिस्सा नहीं दे सकते.

स्थानीय विश्लेषक उद्दीपन गोस्वामी ने बताया कि विद्रोही गुट प्रतिस्पर्धी चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं और अलग राज्य की मांग से हिंसा बढ़ रही है जिसके चलते असम के जनजातीय लोग अपने अपने घरों से निकल कर राहत शिविरों में रहने को मज़बूर हैं.

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