मोबाइल इंडियन: हैलो व्हाट्सऐप...बाय-बाय एसएमएस!

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डॉक्टर सुधा रमन (बदला हुआ नाम) अपने परिवार के साथ तीन सप्ताह की छुट्टी पर क़रीब दो साल बाद भारत आईं हैं. परिजनों और दोस्तों को साथ लेकर चलने में माहिर सुधा ने आने से पहले इस बात का ख़ास ध्यान रखा कि उनके भारत आने की सूचना दिल्ली में पहले से ही सबको हो.

भारत की यात्रा शुरू करने से पहले उन्होंने व्हाट्सऐप पर अपने दोस्तों का एक ग्रुप बनाया और मैसेज से सबको बता दिया कि वो आ रही हैं.

जब वो भारत आईं, तो एक बार में वो दोस्तों और रिश्तेदारों से जुड़ गई. तस्वीरें, वीडियो और मैसेज भेजकर अपनी यात्रा की जानकारियां शेयर करने में उन्हें कभी दिक़्क़त महसूस नहीं हुई.

उन्हें सब कुछ उतना ही आसान लगा जितना ब्रिटेन में रहकर संपर्क करने में लगता था. भारतीय टेलिकॉम ऑपरेटरों की 3जी सेवाओं की बदौलत वो लगातार इंटरनेट पर रहीं.

डॉक्टर रमन कहती हैं, "दो साल पहले जब मैंने भारत छोड़ा था तब तक ये सब इतना आसान नहीं था. सिर्फ़ 250 रुपए में जो इंटरनेट कनेक्शन मिलता है, वो काफ़ी सस्ता है और इससे 24 घंटे मैं ऑनलाइन रह पाती हूं."

एसएमएस की जगह व्हाट्सऐप?

मोबाइल कंपनियों के लिए ये काफ़ी सुखद समाचार है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग डाटा सेवाओं से जुड़ रहे हैं. लेकिन इसी में उनका दुख भी छुपा है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय एसएमएस और कॉलिंग की जगह अब इंस्टंट मैसेजिंग टूल्स ने ले ली है.

महंगे कॉल्स और एसएमएस की जगह व्हाटसऐप और वाइबर पर अब मुफ्त में संदेश भेजे जा रहे हैं.

पिछला दशक मोबाइल पर एसएमएस के विकास का साल रहा और एसएमएस के ज़रिए कई तरह की सेवाएं लोगों ने हासिल की जिससे टेलीकॉम कंपनियों को भारी लाभ भी हुआ.

एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया और रिलायंस को काफ़ी फ़ायदा हुआ. ये दशक इंटरनेट के ज़रिए सुविधाओं के दोहन का होगा. अपुष्ट रिपोर्टों के अनुसार इंटरनेट सेवाओं मसलन स्काइप, निंबज़ और वीचैट पर बिना पैसे दिए कॉल करने की सेवाओं का कारोबार एक अरब डॉलर से अधिक का है.

मोबाइल के ज़रिए फ़ोन सेवाओं में पिछले दो दशक में कोई बहुत बड़ा बदलाव नहीं हुआ है. मोबाइल ने बातचीत के तौर तरीक़े तक बदल दिए लेकिन मैसेजिंग और इंटरनेशनल कॉलिंग अब धीरे धीरे इंटरनेट की तरफ बढ़ चुका है और अब टेलीफ़ोन से ये सेवाएं दूर हो रही हैं.

ये बदलाव इतनी तेज़ी से हो रहा है जितना टेलीफ़ोन कंपनियों को उम्मीद नहीं थी.

निंबज़ भी पीछे नहीं

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जैसे जैसे भारत के छोटे छोटे इलाक़ों तक मोबाइल सेवाएं फैल रही हैं, इंटरनेट से जुड़ी सेवाएं भी इंटरनेट के ज़रिए बढ़ रही हैं. स्मार्टफ़ोन की बढ़ती ख़रीद से एक बात साफ़ है कि वायरलेस इंटरनेट का ज़माना बढ़ने ही वाला है.

निंबज़ के सीईओ विकास सक्सेना कहते हैं, "एसएमएस को अब ऐसे देखा जाता है मानो वो पिछली सदी की कोई घटना हो. अब मैसेज में की जाने वाली बातें सोशल नेटवर्किंग साइट पर हो रही हैं- नए लोगों से मिलना, फ़ोटो, वीडियो शेयर करना, जगह, ग्रुप मैसेज और चैटिंग ये सारी चीज़ें एसएमएस पर होती थीं जो अब सोशल मीडिया पर हो रही हैं."

कुछ समय पहले तक चुटकुले, भविष्यवाणी और ऐसी ही कई सेवाओं के लिए मोबाइल कंपनियां महीने के पैकेज देती थीं.

नील्सन के एक रिसर्च के अनुसार भारत में इस समय पांच करोड़ स्मार्टफ़ोन यूज़र हैं और स्मार्टफ़ोन के बढ़ते मार्केट में भारत तीसरे नंबर पर है.

'फ्रीमियम'

जैसे जैसे लोग मोबाइल के ज़रिए इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं, मैसेजिंग प्लेटफॉर्म सेवाओं इन लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ज़ोर लगाने लगी हैं ‘फ्रीमियम’ मॉडल के ज़रिए.

फ्रीमियम मॉडल यानी ऐसा मॉडल जिसमें कुछ लोगों के बीच मुफ्त कॉल और मैसेज हो. बाक़ी के बीच कॉल मैसेज के लिए पैसे लगें.

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भारत में कोई भी चीज़ मुफ्त में मिलने का क्रेज़ तो है ही. उदाहरण के लिए इंडियन ऑयल देश की सबसे बड़ी कंपनी है. इस कंपनी ने अपने ग्राहकों से कहा कि अगर वो कंपनी में रजिस्टर्ड अपने मोबाइल से इंडियन ऑयल के एक नंबर पर मिस्ड कॉल दें जिससे उनके खाली हो चुके गैस सिलेंडर की बुकिंग हो सके तो कई लोगों ने इस सुविधा का लाभ उठाया.

हालांकि इस सेवा का नुकसान कंपनी को हुआ लेकिन फिर भी कंपनी ने ये सुविधा दी.

मैसेजिंग और इंटरनेशनल कॉल्स की सेवाएं अब टेलीकॉम से इंटरनेट पर जा ही रही हैं. माना जा सकता है कि अब इंटरनेशनल कॉल्स टेलीफ़ोन के ज़रिए कम ही हो रही हैं.

जो आंकड़े हैं वो बहुत कुछ कह रहे हैं इस मामले में. निम्बज़ हर महीने दक्षिण एशिया में एक महीने में 50 अरब संदेशों का आदान प्रदान करता है और पूरी दुनिया में एक महीने में कम से कम 100 अरब संदेशों का.

वैल्यू एडेड सर्विसेज़

इसी के साथ अगर फ्री डाउनलोड को जोड़ दिया जाए तो देखा जा सकता है कि टेलीकॉम आपरेटरों पर कितना बुरा असर पड़ रहा होगा.

वैल्यू एडेड सर्विसेज़ के बारे में हमेशा कहा जाता रहा है कि ये टेलीकॉम कंपनियों के लिए अच्छा पैसा लाती हैं.

ये बात सही है कि डाटा सेवाओं से पैसा आता है लेकिन देखने वाली बात ये भी है कि इससे कंपनियों को एक हद तक का नुक़सान भी हो रहा है क्योंकि डाटा के ज़रिए लोग इंटरनेट एक्सेस कर के कई ऐसी सेवाएं मुफ्त में पा रहे हैं जो टेलीफ़ोन कंपनी से पैसे देकर मिलतीं.

अब एक तुलना कीजिए सब्सक्राइबर आंकड़ों की. एयरटेल के पास 25 करोड़ से अधिक यूज़र हैं जो भारत में सबसे बड़ा मोबाइल ऑपरेटर है और दुनिया में चौथा सबसे बड़ा.

वीचैट, जिसके मालिक टेनसेंट्स हैं, के पास 30 करोड़ यूज़र हैं. निंबज़ ने कुछ ही समय पहले 25 करोड़ का आंकड़ा पूरा किया है और लाइन के पास 15 करोड़ से अधिक ग्राहक हैं.

व्हाट्सऐप के पास क़रीब 40 करोड़ ग्राहक हैं और अगस्त 2012 के बाद से व्हाट्सऐप हर दिन कम से कम 10 अरब संदेशों का आदान प्रदान करता है.

पिछले साल मोबाइल मैसेज सेवाओं के बारे में एक रिपोर्ट में गार्टनर ने लिखा था, "जो बड़े खिलाड़ी हैं वो और बड़े होते चले जाएंगे अगले तीन वर्षों में अगर वो अपने क्षेत्र में और ग्राहकों को जोड़ना बंद न करें तो. इसमें एक बहुत महत्वपूर्ण बात नेटवर्क प्रभाव की है. जब आपके सभी दोस्त व्हाट्सऐप पर होंगे तो आपको भी उस प्लेटफॉर्म पर आना पड़ता है. आपके पास औऱ कोई उपाय नहीं रहता."

मैसेजिंग का अर्थशास्त्र

टेलीकॉम कंपनियां अब ये समझ रही हैं कि फ्री मैसेजिंग और कॉलिंग का बाज़ार बन रहा है और अब उन्हें ऐसी कंपनियों के साथ समझौता करना होगा जो फ्री ऐप बना रही हैं.

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निंबज़ ने अब भारत में चार बड़े मोबाइल ऑपरेटरों के साथ क़रार कर लिया है. निंबज़ के ग्राहक अब अगर किसी पेड सर्विस का उपयोग करते हैं तो उससे जो पैसा आता है वो निंबज़ और टेलीकॉम कंपनी में शेयर होता है.

जहां तक पिछले दो सालों की बात है तो यह समय संदेशों, सोशल नेटवर्किंग और दोस्तों के बीच फ्री कॉलिंग मैसेजिंग जैसी सेवाओं में बढ़ोतरी का रहा है. आने वाले दिनों में मैसेजिंग तो बढ़ेगी और एक बार गेमिंग कंपनियों ने अगर मोबाइल मैसेजिंग और कॉलिंग ऐप्स वालों से गठजोड़ किया तो ये बाज़ार और बढ़ेगा ही.

यह कोई आसान खेल नहीं होगा. इंटरनेट एक गंभीर व्यवसाय की तरह उभरा है और इसने भारत की हाथी जैसी अर्थव्यवस्था को नचा कर रख दिया है. डॉक्टर रमन जैसे ग्राहक बड़ी ही कम क़ीमत पर संगीत और इस नृत्य का आनंद ले रहे हैं लेकिन बाहर से ही.

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