'धीरे से, कहीं उन्हें चोट न लग जाए'

सुचित्रा सेन इमेज कॉपीरइट AP

वैसे तो इस दुनिया में बंगाली महिलाओं के हुस्न के प्रशंसकों की कमी नहीं है, लेकिन बंगाली महिलाओं में भी सुचित्रा सेन की सुंदरता का जब भी ज़िक्र होता है, कई दिल और तेज़ी से धड़कने लगते हैं.

बंगाली फ़िल्म हल्कों में मिसेज़ सेन के नाम से मशहूर सुचित्रा सेन शायद भारतीय फ़िल्म इतिहास की पहली अभिनेत्री थीं जिन्होंने अपनी पहली फ़िल्म उस समय की जब वो एक बच्ची की माँ बन चुकी थीं.

बंगाल में उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि दुर्गा पूजा के दौरान बनने वाली लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियों को उनकी शक्ल देने की कोशिश की जाती थी.

उनका साड़ी बांधने का अंदाज़, बाल काढ़ने का ढंग और धूप का चश्मा पहनने की अदा युवाओं में उन्माद की हद तक लोकप्रिय थी.

'उत्तम के जाने के बाद सबसे दूर हो गईं थीं सुचित्रा'

सुचित्रा का ही बूता था कि उन्होंने सत्यजीत राय का उनके साथ काम करने का न्योता सिर्फ़ इसलिए ठुकरा दिया था क्योंकि उनकी शर्तें उनसे मेल नहीं खाती थीं.

कहा जाता है कि एक बार मुंबई के एक प्रोड्यूसर ने सेट पर उनसे थोड़ी आज़ादी लेने की कोशिश की थी और सुचित्रा सेन ने सबके सामने उसके चेहरे पर थप्पड़ रसीद दिया था.

आँधी फ़िल्म में उनके निर्देशक गुलज़ार उन्हें हमेशा ‘सर’ कह कर पुकारा करते थे- सम्मान में नहीं बल्कि तफ़रीह में, क्योंकि फ़िल्म की शूटिंग के दौरान कहीं सीनियर होते और दोस्त होते हुए भी सुचित्रा गुलज़ार को ‘सर’ कहा करती थीं.

गुलज़ार याद करते हैं कि सुचित्रा को ये कभी नहीं भूला कि वो ठंडा दूध पीने के शौकीन हैं. जब भी वो उनसे मिलने जाते थे वो उन्हें ठंडा दूध पिलाना नहीं भूलती थीं.

'प्रियो बांधबी'

Image caption सुचित्रा सेन अपने दौर में सबसे ज़्यादा पारिश्रमिक लेने वाली अभिनेत्री थीं.

एक बार जब सुचित्रा से उत्तम कुमार से उनके संबंधों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बहुत मशहूर जवाब दिया था कि वो भाई-बहन तो नहीं ही हैं और न ही प्रेमी हैं. वो उनकी प्रियो बांधबी (बंगाली में प्यारी दोस्त) हैं. 1970 में इस नाम की फ़िल्म में दोनों ने साथ-साथ काम किया था.

उनके बारे में मशहूर था कि अगर वो किसी से फ़ोन पर बात नहीं करना चाहती थीं तो हिंदी में इस तरह जवाब देती थीं जैसे वो उनकी नौकरानी बोल रही हों, ‘मेम साब घर पर नहीं हैं. थोड़ी देर बाद फ़ोन करिएगा.’

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उनकी एकांतप्रियता का ये आलम था कि जब वो अस्पताल में भर्ती हुईं तो उनकी सेवा में ग़ैरबंगाली नर्सों को रखा गया और जिस फ़्लोर पर उन्हें रखा गया, वहाँ जाने से पहले डॉक्टरों और नर्सों के मोबाइल फ़ोन ले लिए जाते थे ताकि वो उनकी तस्वीर न खींच सकें.

बहुत कम लोगों को पता है कि सुचित्रा ने एक बार बाटा जूतों के लिए मॉडलिंग की थी. उन्होंने कुल 60 फ़िल्मों में काम किया. 53 बंगाली और 7 हिंदी फ़िल्मों में.

फ़िल्मी जीवन

अधिकतर फ़िल्मों में उन्होंने कामकाजी महिला की भूमिका को निभाया, हालांकि उस समय महिलाओं का बाहर काम करना अच्छा नहीं समझा जाता था. 'सप्तापदी' में वो एक आर्मी नर्स थीं. 'हरानो सुर' में उन्होंने एक डॉक्टर की भूमिका निभाई थी. 'जीबन तृष्णा' में वो कलाकार बनीं और 'आँधी' में उन्होंने एक राजनीतिज्ञ के रोल को बख़ूबी निभाया.

कहा जाता है कि सुचित्रा को एक फ़िल्म के लिए एक लाख रुपए की फ़ीस दी जाती थी और कई बार उनके हीरो की फ़ीस उनसे कम हुआ करती थी. 1962 में 'बिपाशा' में काम करने के लिए उन्हें एक लाख रुपए मिले थे जब कि हीरो उत्तम कुमार को सिर्फ़ अस्सी हज़ार रुपयों से संतोष करना पड़ा था.

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'बिपाशा' की सफलता के बाद उन्होंने यकायक अपनी फ़ीस डेढ़ लाख कर दी थी जो उनके प्रोड्यूसरों को काफ़ी नागवार गुज़री थी. स्क्रीन पर उत्तम कुमार के साथ उनकी जो कैमिस्ट्री थी, उसका मुकाबला आज तक कोई नहीं कर पाया है.

उत्तम कुमार अकेले इंसान थे जो उन्हें उनके असली नाम रोमा से पुकार सकते थे. वो एक दूसरे को ‘तुई’ (हिंदी में तू) कह कर भी पुकारते थे.

उत्तम का देहांत होने पर सुचित्रा रात के ढाई बजे उन्हें श्रद्धांजलि देने उनके निवास पर पहुंची थीं. जब उनके लाए फूल उत्तम के शव पर चढ़ाए जा रहे थे तो सुचित्रा के मुंह से बेसाख़्ता निकला था, ’धीरे से, कहीं उन्हें चोट न लग जाए.’

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