भारत में इंसानों पर बाघों के हमले क्यों बढ़ रहे हैं?

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Image caption 'आदमखोर' बाघ के आतंक को समझा पाना मुश्किल है.

उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में पिछले पांच हफ्तों में बाघ ने 17 लोगों को मार डाला. इन मौतों से भड़के स्थानीय लोग अब कानून व्यवस्था अपने हाथ में लेने को उतारू हैं.

मगर जो इन खबरों से अनजान हैं वे नहीं जानते कि एक 'आदमखोर' बाघ के आतंक के साये में रहना क्या होता है.

तमिलनाडु का नीलगिरी जिला. डोडाबेट्टा इलाका का स्कूल. यहां के स्कूल एक हफ्ते से ज्यादा वक्त से बंद हैं. यहां के अधिकांश निवासियों का पेशा दिहाड़ी मजदूरी है. मगर कई दिन से वे मज़दूरी करने नहीं गए.

इन इलाकों में ' बाघ कर्फ्यू' का ऐसा असर है कि चारों तरफ सन्नाटा और मातम पसरा हुआ है. यह 'बाघ कर्फ्यू' यदि ज़्यादा दिनों तक जारी रहा तो गरीबों के भूखों मरने की नौबत आ सकती है.

पिंजड़ों और कैमरों का जाल

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Image caption रंथंभौड़ राष्ट्रीय पार्क में बाघ

डोडाबेट्टा में 4 जनवरी को तीन लोगों को जिस बाघ ने मारा उसके बारे में पुष्टि हुई है कि वह आदमखोर है. मगर महाराष्ट्र के तडोबा इलाके में दो लोगों की हत्या करने वाला बाघ वाकई 'आदमखोर' हैं, इसमें अभी संदेह है.

उत्तर प्रदेश में जिम कार्बेट राष्ट्रीय पार्क में भटक रही बाघिन ने क्रिसमस के बाद से लेकर अब तक सात लोगों को मार डाला है. कर्नाटक में बाघ ने पांच और लोगों का शिकार किया.

कर्नाटक में पिछले महीने से अब तक दो 'आदमखोर' बाघ और मवेशियों का शिकार करने वाले एक बाघ को पकड़ा गया है. जबकि तमिलनाडु और उत्तरप्रदेश के वन अधिकारी अभी भी कुछ समझ नहीं पा रहे.

बाघों को पकड़ने के लिए जगह जगह पिंजड़ों और कैमरों का जाल बिछाया गया है.

एक ओर पैदल खोजी दस्ते हैं तो दूसरी ओर बेहोश करने वाले बंदूकों के साथ हाथी पर सवार पशु चिकित्सक जंगलों का चप्पा चप्पा छान रहे हैं.

यहां तक कि आदमखोर बाघों को लुभाने के लिए उन्हें रिकार्ड की हुई आवाजें सुनाई जा रही हैं. मगर अफसोस कोई परिणाम नहीं निकला है.

'आदमखोर' होना एक मिथ है

बाघों को पकड़ना तब बेहद मुश्किल हो जाता है जब उन्हें इंसानों का भय नहीं रह जाता.

सच तो ये है कि बाघ के साथ हुए अधिकांश मुठभेड़ों में शिकार कुछ ही मामलों में सचमुच में खाया गया या झाड़ियों में घसीटा गया. लोगों पर एक के बाद एक हो रहे हमलों से संकेत मिले कि बाघ आदमखोर है.

बाघों का इंसानों को शिकार बनाने की घटना अब तक असाधारण ही कही जा सकती है.

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Image caption बांदीपुर में इंसान पर हमला करने वाले बाघ की तस्वीर. वह बाद में पकड़ा गया था.

एक बाघ आमतौर पर एक हफ्ते में एक बड़ा शिकार करता है. भारत के 1700 बाघ एक साल में 85000 से ज्यादा शिकार करते हैं.

अगर ये मान लिया जाए कि बाघ के लिए इंसान का मांस ही उसका प्राकृतिक आहार है तो भारत की आबादी ज़्यादा होने के कारण बाघ के 85000 शिकारों में से अधिकांश शिकार इंसान ही होने चाहिए.

मगर सच्चाई इसके विपरीत है. भारत में एक साल में संयोगवश या किसी दूसरी वजह से 85 से भी कम लोग बाघ के शिकार हुए हैं. जबकि इससे कई गुना ज्यादा मौतें रेबीज़ या सांप के काटने से हुई. फिर भी लोगों के बीच आम धारणा यही है कि बाघ सबसे ख़तरनाक जानवर है.

लोग बाघ द्वारा आकस्मिक और जानबूझ कर किए गए शिकार में अंतर नहीं कर पाते हैं. जब भी बाघ कोई हमला करता है, मीडिया बंदूक तान लेता है.

कानून के तहत राज्य वन्य जीव विभाग का मुखिया बाघ को आदमखोर घोषित कर सकता है और बाघ को मारने की इजाजत दे सकता है.

जोखिम भरी देरी

मगर जिस तेजी से निजी शिकार के लिए शिकारियों को लाइसेंस देने का काम किया गया उसे देखते हुए संघीय पर्यावरण मंत्रालय को पिछले साल जनवरी में मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करनी पड़ी.

इस एसओपी के अनुसार, "यदि बाघ इंसान के शिकार का आदी नहीं तो वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत बाघ को छोड़ दिया जाना चाहिए."

लेकिन यदि बाघ इंसानों को पीछा करते हुए उसका शिकार करता है तो उसे मारने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता.

पशु कल्याण से जुड़ी भारत की मजबूत लॉबी इस बात जोर देती है कि 'आदमखोर' बाघ को मार गिराने की जगह उसे जिंदा पकड़ा जाए. 'आदमखोर' बाघ को जाल में फंसाना या बेहोश करना उन्हें मार गिराने से ज़्यादा कठिन काम है.

बाघ जीवविज्ञानी डॉ उल्लास करंत का तर्क है, "एक बार आदमखोर बाघ की पहचान हो जाने पर उसे मारने में देरी करना जोख़िम भरा काम है. इस देरी से स्थानीय लोगों में गुस्सा भड़क सकता है. इससे बाघ के एक प्रजाति के तौर पर संरक्षित करने की मुहिम को झटका भी लग सकता है."

संरक्षणवादी वाल्मिकी थापड़ भी इस बात पर जोर देते हैं कि बाघ आदमखोर है कि नहीं यह तय करने में स्वतंत्र विशेषज्ञों की भी राय जरूर ली जानी चाहिए.

उनका कहना है, "अगर यह साबित हो जाए कि जंगल में बाघ का रहना बहुत खतरनाक है तो इसे चिड़ियाघर में रखकर सेवा करने की अपेक्षा मार डालना ज्यादा बेहतर है."

ताज्जुब की बात नहीं कि पिछले दिनों आदमखोर बाघ से जुड़े अधिकांश मामले वैसे इलाकों में सामने आए जहां बाघों की बहुत संख्या ज़्यादा थी. जैसे कि बांदीपुर-नागरहोल, तडोबा, कार्बेट-राजाजी, रणथंबौर और काजीरंगा क्षेत्र.

जंगल में बाघों की घनी आबादी वाले इलाकों में वयस्क हो रहे और बूढ़े बाघों को सीमा रेखा से बाहर घूमते देखा गया. इन्हीं बाघों के लोगों से मुठभेड़ की संभावना अधिक रहती है.

बाघों की बहुत अधिक संख्या

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Image caption इंसानों पर बाघ शायद ही कभी प्राणघातक हमला करता है.

डॉ करंत कहते हैं, "जिन बाघों से लोगों की मुठभेड़ होती है वे या तो वयस्क हो रहे बाघ होते हैं जिन्हें नए इलाकों की तलाश में होते हैं, या वे बूढ़े और घायल बाघ होते हैं, जिन्हें उनके इलाके से बेदखल किया जा चुका होता है."

कनार्टक में 5 दिसंबर को जो आदमखोर बाघ पकड़ा गया था वह 12 साल का नर बाघ था. उसने अपना जीवनकाल लगभग पूरा कर लिया था.

और 2 जनवरी को जो बाघ पकड़ा गया वह 8 साल का नर बाघ था. वह दाहिने पंजे और कंधों से घायल था.

वन्यजीव विशेषज्ञ का कहना है कि चूंकि इस तरह के कमजोर शरीर के जानवरों का जीवन जंगल में ज़्यादा दिनों तक नहीं बचा रहता इसलिए उनका मारा जाना या चिड़ियाघर में भेज देना ज़्यादा मायने नहीं रखता.

चर्चित क्षेत्र जीवविज्ञानी, डॉ जार्ज शैलर मानते हैं, "आदमखोर के रूप में पहचाने जा चुके बाघों को जंगल से हटाया जाना चाहिए. मगर उन बाघों को छोड़ दिया जाना चाहिए जो अपनी सुरक्षा में किसी इसान को संयोगवश मार डालते हैं. चिड़ियाघर में पहले से ही बहुत सारी संख्या में बाघ मौजूद हैं."

इधर जीवन थम सा गया है. भारत के कई गांवों में बाघों का आतंक मचा हुआ है. आदमखोर की तलाश जारी है.

(जे मजूमदारस्वतंत्र पत्रकार हैं जो भारत और विदेशी प्रकाशनों के लिए लिखते हैं.)

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