'आधी रात को विक्रमादित्य बन सड़कों पर निकल जाना सुधार नहीं'

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आम आदमी पार्टी और दिल्ली सरकार के मुखिया अरविंद केज़रीवाल का धरना ख़त्म हो गया है. वे दिल्ली पुलिस के कुछ अधिकारियों के खिलाफ़ कार्रवाई की मांग कर रहे थे. कुछ पुलिस अधिकारियों को छुट्टी पर भेजे जाने के बाद आम आदमी पार्टी ने ये धरना ख़त्म कर दिया. लेकिन इस धरने की कुछ लोगों ने कड़ी आलोचना की है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आप पर अराजक होने के आरोप लग रहे हैं. बीबीसी ने संवैधानिक मामलों के जानकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के वकील डॉ सूरत सिंह से दिल्ली में पुलिस और सरकार के बीच जारी अनबन पर बात की.

पुलिस पर भ्रष्ट होने, दादागीरी करने का आरोप लगाने वाली आम आदमी पार्टी के बारे में बात करते हुए डॉ सूरत सिंह कहते हैं कि भारत में संविधान के तहत शासन है. यहां कोई जंगल राज नहीं है. ना ही मंत्री के लिए और ना ही पुलिस के लिए.

संविधान में एक व्यवस्था है कि जनता द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि नीतियां बनाएंगे. जब ये नीतियां एक प्रक्रिया के तहत कानून का रूप ले लेंगी तो कार्यकारिणी, जिसमें पुलिस भी आती है, उसे लागू करेगी.

सुधार का मतलब

किसी भी मंत्री के मन में कुछ भी आ जाए और बिना किसी नीति के तहत वह आकर कहे कि अभी इसे लागू करो, तो यह उस मंत्री के अनुभव की कमी को दिखाता है. कोई भी व्यवस्था ऐसे नहीं चलती.

साथ ही, चूंकि पुलिस को काफी अनुभव होता है तो इन परिस्थितियों में उन्हें नए मंत्रियों के साथ काफी चतुराई से पेश आना चाहिए.

आज दिल्ली में ऐसा माहौल है कि चूंकि जनता ने जनादेश दिया है कि सुधार करो तो बिना सोचे समझे कदम उठाएं जा रहे हैं.

सवाल है कि सुधार कैसे किया जाए. हर चीज का एक उचित तरीका होता है. उसी तरह कानून के तहत जांच की और सजा देने की एक उचित प्रक्रिया है.

सुधार का मतलब ऐसा बिलकुल नहीं है कि रात को कोई विक्रमादित्य की तरह अंधेरे में निकल जाए और जो मन में आए वो करे.

संपूर्ण राज्य का दर्जा

दिल्ली की कानून व्यवस्था को नहीं संभाल पाने के पीछे पहले भी ये तर्क दिया जाता रहा है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि दिल्ली पुलिस पर दिल्ली सरकार का नियंत्रण नहीं है.

सच्चाई ये है कि दिल्ली को संपूर्ण राज्य का दर्जा अभी तक नहीं मिला है. पुलिस और जमीन, ये दोंनो मामले संघीय सरकार के माध्यम से लेफ्टिनेंट गर्वनर ही नियंत्रित करते हैं.

इस तथ्य को जानने के बावजूद प्रशासन को चलाने के लिए दिल्ली सरकार पुलिस और जमीन से संबंधित कानून बना देती है.

इसलिए सबसे पहले ये जरूरी है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले. दूसरे राज्यों में पुलिस और जमीन स्थानीय विषय होता है.

दिल्ली देश की राजधानी होने के साथ ही संघीय क्षेत्र भी है. मगर जमीन और पुलिस से जुड़े विषयों पर निर्णय लेने का अधिकार जनप्रतिनिधि के पास नहीं है. सारी समस्या की जड़ यहीं से है.

पुलिस भी इन्हें अनदेखा कर देती है. क्योंकि पुलिस की जवाबदेही गृह मंत्रालय के प्रति है. दिल्ली पुलिस की गोपनीय रिपोर्ट का मामला गृह मंत्रालय से जुड़ा हुआ है न कि दिल्ली सरकार से.

अगर दिल्ली के पास पूर्ण राज्य का दर्जा होता तो दिल्ली के कानून मंत्री के छापा मारने पहुंचने पर पुलिस भी उनकी बातों को ज्यादा इज्जत से सुनती.

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