क्या राहुल पर भारी पड़ेगा तीखे सवालों को टालना?

  • 28 जनवरी 2014
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राहुल गांधी की सरलता को लेकर सवाल नहीं है. पार्टी की व्यवस्था को रास्ते पर लाने की उनकी मनोकामना को लेकर संशय नहीं. वह सच्चे मन से अपनी बात कहते हैं, इससे भी इनकार नहीं.

पर लगता है कि कांग्रेस को घेरने वाले जटिल सवालों की गंभीरता से या तो वह वाकिफ नहीं हैं, वाकिफ होना नहीं चाहते या पार्टी और सरकार ने उन्हें वाकिफ होने नहीं दिया है.

पिछले दस साल की सक्रिय राजनीति में राहुल का यह पहला इंटरव्यू था. उम्मीद थी कि वह अपने मन की बातें दमदार तरीके से कहेंगे.

खासतौर से इस महीने हुई कांग्रेस महासमिति की बैठक में उनके उत्साहवर्धक भाषण के संदर्भ में उम्मीद काफी थी. पर ऐसा हो नहीं पाया.

उनसे काफी तीखे सवाल पूछे गए, जिनके तीखे जवाब देने के बजाय वह सवालों को टालते नजर आए.

उनसे पूछा गया कि वह टू जी के मामले में कुछ क्यों नहीं बोले, कोल-गेट मामले में चुप क्यों रहे? पवन बंसल और अश्विनी कुमार के मामले में संसद में छह दिन तक गतिरोध रहा, आपको नहीं लगता कि उस समय बोलना चाहिए था? महंगाई पर नहीं बोलना चाहिए था?

ऐसे सवालों के जवाब में उन्होंने देश की बुनियादी समस्याओं का हवाला देना शुरू कर दिया. पर ऐसी कोई ठोस योजना पेश नहीं की, जो आश्वस्त करती हो. उनकी बातों से एक बात साफ झलकती है कि उन्होंने देश की प्रशासनिक व्यवस्था का गहराई से अध्ययन नहीं किया है.

दो नेताओं का मुकाबला

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राहुल गांधी चाहें या न चाहें लोकसभा चुनाव दो नेताओं के इर्द-गिर्द ही लड़ा जाएगा. राष्ट्रीय स्तर पर पार्टियों के दो चेहरे सामने हैं. आम सभाओं के मार्फत राहुल जनता के सामने आते रहे हैं. वहाँ वह अपनी बात कहते रहे.

हाल में दो-एक प्रेस कांफ्रेंसों को भी उन्होंने संबोधित किया. आमतौर पर हर जगह एजेंडा उनका रहा. उन्होंने जो चाहा वो कहा.

पर सोमवार की रात अर्णब गोस्वामी ने उनसे जब कुछ सीधे सवाल किए तो वो इन सवालों के जवाबों पर खरे नहीं उतर पाए.

आम सभाओं में बाँहें चढ़ाकर तेज-तर्रार अंदाज में बात करने वाले राहुल पूरे इंटरव्यू के दौरान बजाय आक्रामक होने के अपने और अपनी पार्टी के अंतर्विरोधों का बचाव करते हुए नजर आए.

उन्होंने यह जरूर कहा कि मुझे किसी बात से डर नहीं लगता, पर वह मुकाबले में आने से क्यों हिचकते रहे हैं- इसका जवाब नहीं दे पाए.

ऐसा लगता है कि उनकी तैयारी नहीं थी. बेशक उन्हें इस बात का अंदाज होगा कि कौन से सवाल उनसे किए जाएंगे और उनका जवाब क्या होगा.

ज्यादातर सवालों के जवाब में उनके पास सिस्टम को ठीक करने, महिलाओं और युवाओं को बढ़ावा देने और भ्रष्टाचार के खिलाफ छह कानूनों को पास कराने का समाधान था.

नरेंद्र मोदी से तुलना

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लगता नहीं कि उनके जवाब कांग्रेस के लिए मददगार साबित होंगे. क्या उनकी तुलना नरेंद्र मोदी से नहीं की जाएगी, खासतौर से इस किस्म के इंटरव्यू में?

पिछले साल अप्रैल के पहले सप्ताह में सीआईआई की सभा में राहुल गांधी के भाषण और फिर चार दिन बाद फिक्की की महिला शाखा की सभा में नरेंद्र मोदी के भाषण से इस तुलना की शुरूआत हुई है.

राहुल यदि मीडिया के साथ संवाद जारी रखेंगे तो लगता है कि दोनों के बीच परोक्ष बहस का सिलसिला शुरू होने जा रहा है. अभी 17 जनवरी को कांग्रेस महासमिति की बैठक में राहुल के भाषण के फौरन बाद भाजपा की राष्ट्रीय परिषद में मोदी के भाषण से माहौल फिर गरमा गया है.

नरेंद्र मोदी को मीडिया-मुखी बनने में समय लगा. सन 2002 या उसके बाद कम से कम पाँच साल बाद तक वह मीडिया की शिकायत ही करते रहे. सन 2007 में ऐसे ही एक इंटरव्यू में करन थापर मोदी साहब, मोदी साहब कहते रह गए.

मोदी ने पहले पानी माँगा और फिर माइक्रोफोन हटाकर इंटरव्यू खत्म कर दिया. थापर का सवाल था कि आप अपनी छवि सुधारने के लिए खेद प्रकट क्यों नहीं करते. मोदी ने कहा, अब वक्त नहीं है, आप 2002 में मिले होते, 2003 में मिले होते मैं सब कर देता.

मोदी ने इसके बाद कई मौकों पर अपनी कमीज पर लगे माइक्रोफोन को हटाया. केवल यह साबित करने के लिए कि गुजरात के दंगों को लेकर कांग्रेस पार्टी निराधार आरोप लगा रही है और मीडिया के लोग उन आरोपों को फैला रहे हैं. मोदी की वह आक्रामकता उनकी राजनीतिक सफलता का कारण भी बनी.

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फिलहाल राहुल गांधी इस इंटरव्यू के मार्फत इस धारणा को नहीं तोड़ पाए कि वह नरेंद्र मोदी का सामना करने से घबराते हैं. उनसे सीधे पूछा गया कि क्या आप नरेंद्र मोदी का सीधा आमना सामना करने से बच रहे हैं?

इसका सीधा जवाब देने के बजाय उन्होंने कहा, इसे समझने के लिए आपको यह भी समझना होगा कि राहुल गांधी कौन है और राहुल गांधी के हालात क्या रहे हैं.

उन्होंने अर्णब गोस्वामी से उल्टा सवाल किया, आप एक पत्रकार हैं. जब आप छोटे रहे होंगे तो आपने सोचा होगा कि मैं कुछ करना चाहता हूं, किसी एक पॉइंट पर आपने जर्नलिस्ट बनने का फैसला किया होगा, आपने ऐसा क्यों किया?

इस पर अर्णब गोस्वामी ने कहा, आप मेरे सवाल का जवाब देने से बच रहे हैं. राहुल का जवाब था कि मुझे केवल एक चीज दिखाई देती है कि सिस्टम को बदलना है.

सिस्टम कैसे बदलेगा

पर सिस्टम क्या है, क्यों है और उसका इलाज क्या है, यह भी वह बता नहीं पाए.

पार्टियों के चंदे को आरटीआई के तहत लाने के मामले पर उनका जवाब अटपटा था.

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वह बोले मेरा नजरिया है कि ज्यादा खुलापन हो तो अच्छा है. कानून संसद से बनता है. राजनीतिक दलों को आरटीआई के तहत लाने के लिए ऐसा ही करना होगा. मेरा यह निजी नजरिया है. असली सवाल सिस्टम के अलग-अलग स्तंभों का है. अगर आप किसी एक को आरटीआई में लाते हैं और दूसरों को मसलन ज्यूडिशियरी और प्रेस इससे बाहर रहते हैं तो असंतुलन होगा.

यह सवाल का सीधा जवाब नहीं है. पर इसके पीछे एक खुर्राट नेता की पटुता नहीं अपरिपक्वता और नासमझी नजर आती है. भ्रष्टाचार के सवाल पर आदर्श सोसायटी और अशोक चह्वाण के संदर्भ में उनके जवाबों से नहीं लगता कि वह अच्छी तरह तैयार होकर आए थे.

लालू यादव के साथ गठबंधन के सवाल पर उनका कहना था कि पार्टी के बड़े नेता फैसले करते हैं. जब यह पूछा गया कि आप तो बॉस हैं तो कहा कि गठबंधन पार्टी के साथ है किसी व्यक्ति के साथ नहीं.

1984 का सवाल

राहुल न तो मोदी के प्रति आक्रामक हो पाए और न प्रभावशाली तरीके से इस बात को बता पाए कि गुजरात के दंगों और सन 1984 की सिख विरोधी हिंसा में अंतर क्या था?

उल्टे उन्होंने बातों-बातों में इस बात को स्वीकार कर लिया कि कुछ कांग्रेस नेताओं का सिखों के खिलाफ हिंसा में हाथ हो सकता है.

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उनका यह कहना कि मैं उस वक्त सक्रिय राजनीति में नहीं था, खासा अटपटा था. लगता नहीं कि राहुल ने मीडिया से मुखातिब होने का कोई सुविचारित कार्यक्रम तैयार किया है.

हाल में उनका यह दूसरा इंटरव्यू है. पहला इंटरव्यू दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ था, जिसमें उनसे तीखे सवाल नहीं किए गए थे. इस इंटरव्यू में किए गए.

इसमें उनसे पहला सवाल मीडिया से मुखातिब न होने के बाबत था और वह उस पर ही अटक गए. वह चाहते थे कि लोग उनकी परिस्थितियों को समझें. वह आसानी से कह सकते थे कि भाई नहीं मिल पाया, पर अब तो सामने हूँ.

वह इस बात को स्पष्ट नहीं कर पाए कि पार्टी के अंदरूनी मामलों को देखने का मतलब महत्वपूर्ण सवालों से कन्नी काटना नहीं है. बहरहाल मीडिया में उनके बारे में यही धारणा बनी रही और वह इसे इस इंटरव्यू में भी दूर नहीं कर पाए.

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