जिस्म बूढ़ा, पर आंख अब भी बदमाश!

  • 20 मार्च 2014
खुशवंत सिंह इमेज कॉपीरइट PTI

अपनी बेबाकी और बिंदासपन के लिए मशहूर रहे लेखक, पत्रकार खुशवंत सिंह का 99 साल की उम्र में देहांत हो गया है.

साल 2000 में बीबीसी संवाददाता क़ुर्बान अली ने खुशवंत सिंह से एक विशेष इंटरव्यू किया था. यह साक्षात्कार आज भी उतना ही प्रासंगिक है. पेश है उस बातचीत के चुनिंदा अंश.

खुशवंत जी आप जीवन के 85-86 बसंत देख चुके हैं, क्या आपको लगता है ज़िंदगी में आपकी ज़्यादातर ख़्वाहिशें पूरी हो गई हैं या अभी कुछ बाक़ी रह गई हैं?

तमन्ना तो बहुत रहती हैं दिल में, वो कहां ख़त्म होती हैं. जिस्म से तो बूढ़ा हूं लेकिन आंख तो अब भी बदमाश है. दिल अब भी जवान है. दिल में ख़्वाहिशें तो रहती हैं आख़िरी दम तक रहेंगी, पूरी नहीं कर पाऊंगा ये भी मुझे मालूम है.

कहीं यही आपकी तो ख़ूबसूरती नहीं है कि आप अपनी जो चीज़ें है, जो बकौल आपके बेईमानी है, उसे भी आप क़बूल कर रहे हैं और बहुत ख़ूबसूरती के साथ कर रहे हैं, यही चीज़ तो कहीं आपके लिए मेरिट नहीं बन गईं?

हो सकता है ये प्लस प्वाईंट, जिसे आप भी मान रहे हैं. मेरे अंदर किसी चीज़ को छुपाने की हिम्मत नहीं है. शराब पीता हूं तो खुल्लम-खुल्ला पीता हूं, कहता हूं मैं पीता हूं. मुलीद हूं, नास्तिक हूं छिपाया नहीं कभी, मैं कहता हूं कि मेरा कोई दीन-ईमान धरम-वरम कुछ नहीं है.

मुझे यक़ीन नहीं है इन चीज़ों में, तो लोग उसको डिसमिस कर देते हैं कि ये क्या बकता है, मैंने कई दफ़ा कहा है कि मैं किसी मज़हब में यक़ीन नहीं करता फिर भी मुझे निशाने खालसा भी दे दिया. गुरुनानक यूनिवर्सिटी ने मुझे ऑनररी डॉक्टरेट भी दे दिया तो मैंने क़बूल कर ली. मैंने कोई समझौता नहीं किया कि मुझमें किसी मज़हब का अहसास वापस आ गया है. मैंने खुल्लम-खुल्ला कहा कि इसमें कोई यक़ीन नहीं है क्योंकि मैं नास्तिक हूं.

लेकिन आपने मज़हब का मज़ाक़ नहीं उड़ाया, उसका अपमान नहीं किया और अपनी बात को रखा मगर साथ में उसकी इज़्जत भी की.

किसी के दिल को चोट पहुंचाना, मेरे ख़्याल से यह ग़लत बात है. इसीलिए जब सलमान रुश्दी की 'दि सैटेनिक वर्सेस' किताब आई थी तो वह छपने से पहले ही मैंने उसे मंगवाया था.

मैं एडवाइज़र हूं पेंगुईन वाइकिंग का, मैंने उसकी स्क्रिप्ट को पढ़ा और मैंने उनसे कहा कि हम हिंदुस्तान में इसे नहीं छापेंगे. तब मुझसे पेंगुईन वाइकिंग के मालिक ख़फ़ा हुए जो इंग्लैंड और अमरीका में हैं. टेलीफोन पर उन्होंने कहा कि विल यू रीड इट अगेन क्योंकि हमने करोड़ों रुपये दिए हैं एडवांस रॉयल्टी के तौर पर और हम समझते हैं कि हिंदुस्तान में यह किताब ख़ूब बिकेगी तो तुम हिंदुस्तान में छापो.

उन्होंने तीसरी दफ़ा मुझे धमकी देते हुए कहा कि पुट योर ओपिनियन इन राइटिंग. तो मैंने वो भी किया, आई पुट माई ओपिनियन इन राइटिंग. मैंने कहा कि दिस इज लीथल मटिरियल, इट विल हर्ट दि फीलिंग ऑफ दि मुस्लिम ऑर यू मे हैव सीरियस ट्रबुल इवन इन इंग्लैंड.

खुशवंत जी अभी एक क़िताब भी आपके बारे में प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है, 'तुझसा कहें किसे'. उसमें जो लेख हैं वो ज़्यादातर उन लोगों के हैं जिन्होंने आपके साथ काम किया है, आपके कलीग रहे हैं या आपके शागिर्द रहे हैं, जर्नलिज़्म के लोग हैं, इंडस्ट्री के लोग हैं और दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता हैं, उसमें काफी खट्टी-मीठी बातें आपके बारे में कही गई हैं, क्या कहेंगे आप?

मीठी बातें तो बहुत हैं, खट्टी बहुत कम हैं, मेरा ख़्याल है कि खट्टी बात तो सिर्फ़ मेरे बेटे ने ही लिखी है मेरे बारे में.

जी उन्होंने काफ़ी दिलचस्प चीज़ें लिखी हैं कि कई पार्टियों में उनका जाना होता था और वहां आपके बारे में टीका-टिप्पणियां होती थीं और वो ख़ामोश रहते थे.

हां अब वो उसका हक है, मुझसे उसकी राय मुख़्तलिफ़ है.

खुशवंत सिंह जी ये जो आपकी छवि बनी है कि ओल्ड डर्टी मैन, बूढ़ा गंदा आदमी, ये क्यों बनी है?

ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं मज़हब के ख़िलाफ़ लिखता हूं. सेक्स के बारे में खुल्लम-खुल्ला लिखता हूं. शराब की तारीफ़ करता हूं और यहां तो किसी को मजा आता है किसी को रन डाउन करने में.

मैं सुबह चार बजे से उठकर काम करना शुरू कर देता हूं क्योंकि मेरा पाठ-पूजा में कोई यकीन नहीं है तो मैं उसमें वक़्त जाया नहीं करता. मैं बस अपने काम पर लग जाता हूं. देखिए जिस आदमी ने 80 से ज़्यादा क़िताबें लिखी हों, उसके पास कितना वक़्त होता है ऐय्याशी के लिए. बहुत कम. मेरे पास तो बिल्कुल भी नहीं है.

आती हैं मेरे पास ख़ूबसूरत लड़कियां, शाम को कभी महफ़िल जम जाती है, मगर मज़ाल है किसी की कि कोई 15-20 मिनट से ज़्यादा रुक जाए यहां. मैं अपने आप ही कहता हूं कि भई आप जाइए, लेट मी गेट बैक टू माई बुक्स. लोग जानते हैं कि इसमें कोई सच्चाई नहीं है, मगर उनके दिल में ये कहने के लिए डर्टी ओल्ड मैन, एक जैसे क्लिशे बन गया मेरे नाम पे, मैं उसकी परवाह नहीं करता.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार