कर्नाटक: हाथियों को पकड़ने का सबसे बड़ा अभियान

  • 5 फरवरी 2014
हाथियों को पकड़ने के लिए सबसे बड़ा अभियान इमेज कॉपीरइट AP

भारत के दक्षिणी राज्य कर्नाटक में हाथियों को पकड़ने के लिए सबसे बड़े अभियान की शुरुआत होने वाली है. इसका मक़सद इंसानों और जानवरों के टकराव को रोकना है.

एक जानकार के अनुसार इस अभियान में 23 से 30 हाथियों को पकड़ने का प्रयास होगा जो दशकों में सबसे बड़ी संख्या होगी. उन्हें पकड़कर राज्य के चार अलग-अलग हिस्सों में ले जाने की योजना हैं जहां उन्हें प्रशिक्षित किया जाएगा.

हाथी कार्य बल यानी एलिफ़ैंट टास्क फ़ोर्स के अध्यक्ष और एशियन एलिफ़ैंट से जुड़े प्रोफ़ेसर रमन सुकुमार ने बीबीसी हिंदी को बताया, “इससे पहले भी छत्तीसगढ़ के इलाक़े में हाथियों को पकड़ने के प्रयास हो चुके हैं, जब वो मध्य प्रदेश का हिस्सा था. लेकिन ये देश में हाथियों को पकड़ने का सबसे बड़ा प्रयास है.”

प्रोफ़ेसर सुकुमार बंगलौर में भारतीय विज्ञान संस्थान के सेंटर फ़ॉर इकोलॉजिकल स्टडीज़ के निदेशक हैं. उन्हें कर्नाटक हाई कोर्ट के निर्देश पर एलिफ़ैंट टास्क फ़ोर्स का प्रमुख बनाया गया है.

गंभीर समस्या

हाथियों की पकड़ने की इस मुहिम पर कर्नाटक के चीफ़ वाइल्डलाइफ़ वार्डन विनय लूथरा का कहना है, “ये मामला बहुत गंभीर है. पिछले कुछ वर्षों में हासन ज़िले के अलुर गांव में हाथियों ने लगभग 50 लोगों को मार दिया है. ये 30 से 40 वर्ग किलोमीटर का इलाक़ा है जहां पहाड़ी रास्ते हैं, कॉफ़ी की खेती होती है, धान के खेत हैं और सिर्फ़ एक प्रतिशत वन क्षेत्र है.”

हाथियों की पकड़ने का ये काम व्यवस्थित तरीक़े से होगा.

प्रोफ़ेसर सुकुमार बताते हैं, “सबसे पहले वयस्क नर हाथियों को पकड़ने का प्रयास होगा. प्रक्षिशित हाथियों पर बैठकर पशु चिकित्सक जाएंगे और इन नर वयस्कों की गतिशीलता को कम करेंगे. इसके लिए उन्हें एक इंजेक्शन दिया जाएगा जिसका असर उन पर 15 से 20 मिनट रहेगा.”

वो बताते हैं, “वयस्क नर ज़मीन पर गिर जाएंगे. इसके बाद वन विभाग के कर्मचारी और महावत पारंपरिक रस्सी से हाथी को बांधेंगे. फिर उन्हें पहले दिए गए इंजेक्शन का असर कम करने वाला इंजेक्शन दिया जाए. इसके बाद प्रक्षिशित हाथियों की मदद से उन्हें ट्रक में चढ़ाया जाएगा ताकि उन्हें निर्धारित जगहों पर पहुंचाया जा सके.”

लेकिन इस अभियान में एक अहम बात ये होगी कि हाथियों के परिवारों को साथ रखा जाए. इस बारे में प्रोफ़ेसर सुकुमार कहते हैं, “इनके छह परिवार हैं. इसलिए मादा हाथियों और उनके छोटे बच्चों को एक साथ रखना बहुत ज़रूरी है ताकि भावनात्मक क्षति को कम से कम किया जा सके.”

भीड़ को लेकर चिंता

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Image caption हाथियों का इंसानों से टकराव लगातार समस्या बना हुआ है

इन जानवरों को गतिशीलता कम करने के लिए मादा हाथियों और उनके बच्चों को कम असर वाला इंजेक्शन दिया जाएगा.

इसके बाद हाथियों को शिमोगा ज़िले में सावनदुर्गा, मैसूर ज़िले के नागरहोल वन क्षेत्र में मैतिगोड़, कोडागु ज़िले के दुबारे और मैसूर ज़िले के पेरियापटना में भेजा जाएगा.

प्रोफ़ेसर सुकुमार बताते हैं, “शुरू में इन्हें लड़की के बने खानों में रखा जाएगा जहां उन्हें ट्रेनिंग दी जाएगी. इन जानवरों को महावतों के निर्देशों पर चलना सिखाया जाएगा. कर्नाटक को इस तरह जानवरों को प्रशिक्षित करने में विशेषज्ञता हासिल है. तमिलनाडु और असम को भी इस तरह की विशेषज्ञता प्राप्त है.”

इससे पहले 1971 में हाथियों को पकड़ने के लिए पारंपरिक खेड़ा अभियान चलाया गया था जिसमें जंगली हाथियों को निगरानी में रखे जाने वाले हाथियों में तब्दील करना था.

लूथरा और सुकुमार को विश्वास है कि इससे अलुर गांव में हाथियों और इंसानों का टकराव कम होगा, जहां ये एक बहुत गंभीर समस्या है. लेकिन उनकी चिंता लोगों की उस भीड़ को नियंत्रित करना है जो हाथियों को पकड़ने के उनके इस अभियान के दौरान जमा हो सकते हैं.

लूथरा कहते हैं, “क़ानून व्यवस्था की स्थिति को लेकर सभी तरह के ज़रूरी उपाय कर लिए गए हैं.”

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