क्या यूपी में दौड़ सकेगा मायावती का 'हाथी'?

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में शायद अब तक सबसे अधिक दिलचस्प मोड़ तब आया था जब साल 1995 में बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी.

पार्टी संस्थापक कांशीराम की छाया से निकल जल्द क़द्दावर हो जाने वाली मायावती ने उसके बाद से पीछे मुड़ कर नहीं देखा और अब तक चार बार इस राज्य की सरकार का नेतृत्व कर चुकी हैं.

ये भी महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि उनके नेतृत्व में बसपा ने साल 2009 के लोकसभा चुनावों में 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश राज्य की 20 सीटों पर जीत हासिल की थी.

(तीसरे मोर्चे की जरूरत)

उस समय प्रदेश में बसपा सरकार थी जो कि साल 2007 के विधानसभा चुनावों में 30% से भी ज़्यादा मतों से जीत कर चुनी गई थी.

लेकिन साल 2012 के प्रदेश विधानसभा चुनावों ने मायावती और बसपा को एक करारा झटका दिया. 203 विधायकों वाली मायावती की बहुजन समाज पार्टी मात्र 80 सीटों पर सिमट कर रह गई.

मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ते हुए सरकार बनाई और अखिलेश यादव प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने.

अखिलेश को फ़ायदा

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जानकारों की राय थी कि मायावती सरकार के ख़िलाफ़ हुए मतदान से अखिलेश यादव को फ़ायदा हुआ.

जितनी मज़बूती से मायावती ने अपनी सरकार को पूरे कार्यकाल चलाया था उससे कहीं ज़्यादा बुलंदी से मुलायम सिंह की पार्टी ने जीत हासिल की. बहरहाल मायावती कहाँ हार मानने वाली थीं.

('लोकसभा चुनावों में गठबंधन नहीं')

अखिलेश सरकार को सत्ता संभाले हुए कुछ ही महीने हुए थे कि प्रदेश में एक के बाद एक, सांप्रदायिक हिंसा की कई कथित घटनाएं सामने आईं.

बहुजन समाज पार्टी ने इसी बात से सपा की सरकार को घेरना भी शुरू कर दिया. साल 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए भी बसपा की रणनीति पर कई तरह की अटकलें लगाई जा रहीं थीं.

कुछ वरिष्ठ विश्लेषकों ने यहाँ तक कह डाला था कि कांग्रेस और बसपा के लिए उत्तर प्रदेश चुनावों में सीटों का बंटवारा करना ही बेहतर रहेगा, वर्ना दूसरी पार्टियों को लाभ हो सकता है.

मायावती ने बेहद सावधानी से इन अटकलों पर कोई सीधी प्रतिक्रिया न करते हुए अपने मन की बात आम चुनावों के वर्ष में जाकर रखी.

चंद महीने में चुनाव

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अपने जन्मदिन के अवसर पर राजधानी लखनऊ में हुई 'सावधान विशाल महारैली' में मायावती ने हुंकार भरी कि बसपा न तो कांग्रेस और न ही भाजपा के साथ गठबंधन करेगी.

मायावती को इस बात का भरपूर एहसास है कि भले ही उनकी पार्टी को विधान सभा में विपक्ष में बैठना पड़ रहा है, लेकिन उसके बावजूद उनकी झोली में प्रदेश के 25% से ज़्यादा वोट भी हैं.

(मायावती को राहत)

उनको इस बात का भी भरोसा है कि अगर प्रदेश में अपने लगभग दो वर्ष के कार्यकाल में सपा एक सुशासन देने वाली सरकार बनाने की छवि से जूझ रही है तो, ज़ाहिर है, लोहा अभी गर्म है उस पर चोट कर देनी चाहिए.

अब जब कि चुनाव में चंद महीने ही रह गए हैं, मायावती की पार्टी ने सतर्कतापूर्वक प्रदेश में अपने उम्मीदवारों पर ग़ौर करना शुरू कर दिया है.

ख़ास बात ये भी है कि बसपा लोकसभा चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वी इलाक़ों की उन सीटों पर ज़्यादा ध्यान देने की सोच रही है जहाँ वो ऐतिहासिक तौर पर उतनी मज़बूत नहीं रही है.

ख़ुद मायावती से ज़्यादा किसी और को इससे बेहतर एहसास नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश में अपनी 20 लोकसभा सीटों को बढ़ाने का इससे सुनहरा अवसर कभी नहीं रहा होगा.

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