मुंबई: 39 कारख़ाने बंद, बेरोज़गार हुए हज़ारों मज़दूर

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कल तक यहां दिन रात मशीनों की आवाज़ सुनाई देती थी, मज़दूरों की चहलपहल रहती थी, गाड़ियों का आना जाना, सामान की आवाजाही होती थी लेकिन आज इन 39 कारख़ानों में सन्नाटा है. मशीनें बंद है, मज़दूर या तो अपने गांव चले गये हैं, या तो दूसरे काम की तलाश में हैं.

यह स्थिति है मुंबई से सटे डोंबिवली औद्योगिक इलाक़े की. यहां रसायन तथा कपड़ा बनाने वाले 39 कारख़ानों को महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल के कल्याण प्रादेशिक कार्यालय ने प्रदूषण फैलाने की वजह से बंद कर दिया है.

इस क़दम के बाद जहां डोंबिवली शहर के निवासियों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी है, वहीं क़रीब 13000-15000 मज़दूरों पर बेरोज़गारी की तलवार टूटी है.

मुंबई स्थित स्वयंसेवी संस्था वनशक्ति ने पिछ्ले साल डोंबिवली के रासायनिक तथा कपड़ा उद्योग से होने वाले प्रदूषण के ख़िलाफ़ मुहिम शुरू की थी और इस मामले में पुणे स्थित नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में अपील की थी.

अनदेखी

इन कंपनियों के बेपरवाह मालिक तथा महाराष्ट्र प्रदूषण मंडल के अधिकारियों द्वारा की गयी अनदेखी की वजह से पिछले 25-30 सालों से डोंबिवली शहर में भारी प्रदूषण फैल गया था जिसके चलते शहर के क़रीब 25 लाख निवासी कई स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त थे.

डोंबिवली निवासी राजू नलावडे ने कहा, “रासायनिक कंपनियों तथा कपड़ा बनाने वाली कंपनियों के मालिकों ने आज तक कभी भी प्रदूषण की समस्या को गंभीरता से नहीं लिया जिसके चलते कई लोग अनेक रोगों के शिकार बन गए."

उन्होंने कहा, "अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने इन कंपनियों को बंद करने के आदेश दिये हैं, यह अच्छी बात है.” नलावडे पिछले 25 सालों से प्रदूषण के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं.

डोंबिवली के गांधी नगर के निवासी डॉक्टर आनंद हार्डीकर ने बताया कि बेशुमार प्रदूषण की वजह से उल्हास नदी पूरी तरह से बर्बाद हो गयी है और लोगों की स्वास्थ्य समस्याएं भी काफ़ी बढ़ गई हैं.

वो कहते हैं, “यहां तक की, प्रदूषण की वजह से डोंबिवली में भूजल भी प्रभावित हुआ है. मेरे घर के कुंए में प्रदूषित पानी आता है. इस पानी की रासायनिक जांच से यह पता चला कि यह पीने योग्य नहीं है.”

कहीं ख़ुशी कहीं गम

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Image caption प्रदूषण की वजह से डोंबिवली शहर का भूजल भी प्रभावित हुआ है.

कारख़ानों के बंद होने से जहां एक ओर स्थानीय लोगों में ख़ुशी है, वहीं मज़दूरों में भविष्य को लेकर चिंता है.

इंडो अमाइन लिमिटेड में पिछले 20 सालों से काम करने वाले मुकुंद कुलकर्णी ने कहा, “अब मुझे कोई नया काम खोजना पड़ेगा. पता नहीं मुझे नई नौकरी मिलेगी भी या नहीं, क्योंकि जो काम मैं कर सकता हूं, वह सारी कंपनियां बंद कर दी गई हैं.”

कई मज़दूरों में इस घटना से रोष फैला हुआ है. नाम न बताने के शर्त पर एक मज़दूर ने कहा, “यह सब कंपनी के मालिकों और व्यवस्था का दोष है. पैसे बचाने के लिये आज तक कभी कंपनियों ने कारखानों से निकलने वाले रासायनिक पानी पर ध्यान नहीं दिया और प्रदूषण बढ़ता गया. यही वजह है कि आज यह नौबत आई है.”

कई मज़दूर तो सोमवार सुबह से ही या तो कहीं और काम पर लग गये हैं, या तो अपने गांव चले गए हैं. यहां अधिकतर मज़दूर उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले हैं.

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