वोटों की सियासत में मूर्तियों का बढ़ता क़द

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पहले गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण. लेकिन इन दोनों से भी पहले बहुजन समाज पार्टी की नेता और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती.

यूँ तो भारत में ऐतिहासिक हस्तियों की मूर्तियों के निर्माण का सिलसिला पुराना है लेकिन ऐसा लगता है कि पिछले कुछ सालों से इस सिलसिले ने एक सियासी रंग ले लिया है और अब सबसे ऊंची और सबसे आकर्षक मूर्तियां बनाने का एक नया दौर शुरू हो गया है.

महाराष्ट्र सरकार ने बुधवार को छत्रपति शिवाजी की एक ऊंची मूर्ति बनाने की योजना पारित कर दी. ये मूर्ति साल 2004 और 2009 के चुनावी वादों का हिस्सा थी जिसे अब 2014 के चुनाव से पहले कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ( एनसीपी) की मिली-जुली सरकार ने पारित कर दिया है.

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव भी आम चुनाव के साथ ही होने वाले हैं.

मूर्तियां बनाने की इस दौड़ में मुख्यमंत्री एक-दूसरे को पीछे छोड़ने पर लगे हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का दावा है कि छत्रपति शिवाजी की मूर्ति अब तक की सबसे ऊंची मूर्ति होगी. उनका कहना था कि अरब महासागर में बनने वाली इस मूर्ति पर 100 करोड़ रुपए ख़र्च होंगे.

कहा यह जा रहा है कि शिवाजी की यह मूर्ति पिछले साल अक्तूबर में देश के पहले गृह मंत्री और स्वतंत्रता सेनानी सरदार वल्लभभाई पटेल की मूर्ति को लेकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के जवाब में बनाई जा रही है.

शायद यह सही भी हो क्योंकि ऐसा दावा किया जा रहा है कि शिवाजी की मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति होगी जो पटेल की मूर्ति को लेकर किए जा रहे दावों को सीधी चुनौती देगी.

पैसे की बर्बादी?

वैसे महाराष्ट्र सरकार ने इस मूर्ति के निर्माण का वायदा पिछले दो चुनावों में किया था लेकिन इसे कभी पूरा नहीं किया जा सका था.

लेकिन अब सवाल सबसे ऊंची और सबसे सुन्दर मूर्ति के निर्माण का नहीं है. सवाल यह है कि एक ऐसे समय में जब देश की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है क्या इतने पैसे खर्च करना उचित है?

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Image caption उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियां बनवाईं

आम जनता ने सोशल मीडिया पर इस बारे में टिप्पणियां की हैं और अधिकतर लोगों की राय यह है कि ये पैसे की बर्बादी है.

हाल में जब मायावती ने उत्तर प्रदेश में लखनऊ और नोएडा में दो बड़े पार्क बनाए और उनमें अपनी मूर्तियों के अलावा दलित नेता भीमराव अंबेडकर और अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी की मूर्तियां बनवाईं तो उस पर एक बड़ा विवाद खड़ा हुआ था और मायावती की काफी आलोचना की गयी थी.

कहा गया कि वो इसके ज़रिए सियासी लाभ लेना चाहती हैं

लेकिन सालों पहले जब आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने राज्य के नामी कवियों और कलाकारों की मूर्तियों से राज्य के पार्कों को सजाया था तब उनकी आलोचना नहीं की गई थी क्योंकि इसे राजनीतिक लाभ हासिल करने से नहीं जोड़ा गया था.

वोटों की राजनीति

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Image caption महाराष्ट्र की सरकार ने छत्रपति शिवाजी की बड़ी मूर्ति बनाने की घोषणा की है

कांग्रेस की सरकार सालों से देश भर में गांधी जी, अंबेडकर और नेहरू की मूर्तियां लगवाती रही हैं. लेकिन महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार की तरह उन पर राजनीतिक लाभ का इल्ज़ाम नहीं लगाया गया.

इसमें कोई संदेह नहीं कि सरदार वल्लभ भाई पटेल और छत्रपति शिवाजी लोकप्रिय हस्तियां हैं और महाराष्ट्र में शिवाजी एक महान हस्ती माने जाते हैं लेकिन महाराष्ट्र सरकार के आलोचकों का कहना है कि अगर शिवाजी को सम्मान देना ही है तो मूर्तियां बनाने के बजाय राज्य में उनके अनेक क़िलों की मरम्मत कराई जानी चाहिए क्योंकि इन क़िलों का बुरा हाल है.

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि शिवाजी के जीवन और उनकी उपलब्धियों पर सांस्कृतिक केंद्र बनाए जाने चाहिए.

लेकिन फिलहाल मूर्तियां बनाने की दौड़ ख़त्म होती नज़र नहीं आती. एक विचार यह है कि यह सिलसिला उसी समय ख़त्म होगा जब नेता यह समझ सकेंगे कि मूर्तियां बनाने के बजाए आम लोगों की आर्थिक स्थिति बेहतर करने से अधिक वोट मिलेंगे.

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