फिर छिड़ी बात तीसरे मोर्चे की!

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पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा के नई दिल्ली के घर पर सोमवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और वामपंथी नेताओं के बीच बैठक हुई जिसमें ग़ैर-यूपीए और ग़ैर-एनडीए गठबंधन की संभावनाओं पर बात हुई.

बैठक के बाद जनता दल सेक्लयुलर के महासचिव दानिश अली ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया, "ये एक अनौपचारिक बैठक थी. चूंकि बिहार के मुख्यमंत्री दिल्ली में थे इसलिए उनसे मुलाकात की गई. इसमें लोकसभा चुनाव से पहले ग़ैर-भाजपा और ग़ैर-कांग्रेसी मोर्चे की संभावनाओं पर भी बातचीत हुई है."

दानिश अली का कहना था, "गत पांच फ़रवरी को संसद में जिन ग्यारह पार्टियों के नेताओं ने साथ मिलकर कुछ मुद्दों पर लड़ने की बात की थी, उन पार्टियों की अगले कुछ दिनों में दिल्ली में बैठक होगी जिसमें आगे की रणनीति तय की जाएगी."

शुरुआत

दरअसल, तीसरे मोर्चे के गठन की एक और पहल गत पांच फ़रवरी को हो चुकी है जब ग्यारह राजनीतिक दलों ने संसद के भीतर एक अलग गुट बनाने का ऐलान किया था.

हालांकि उस समय ये कहा गया था कि अभी यह मोर्चा संसद के भीतर जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने के लिए संघर्ष करेगा और संसद के बाहर की रणनीति सत्र खत्म होने के बाद तय करेगा.

Image caption अगले कुछ दिनों में तीसरे मोर्चे के बारे में दिल्ली में बैठक होगी

इन दलों में चार वामदलों के अलावा सपा, जद (यू), बीजद, अन्नाद्रमुक, झारखंड विकास मोर्चा, जेडीएस और असम गण परिषद शामिल हैं.

इसके पहले चेन्नई में एआईएडीएमके नेता जयललिता और सीपीआई के बीच चुनावी गठबंधन की घोषणा हुई थी.

यदि मौजूदा लोकसभा की बात की जाए तो इन सभी दलों के कुल सदस्यों की संख्या 92 है.

वैसे गठबंधन में और पार्टियों के आने के कयास लगाए जा रहे हैं जिनमें प्रमुख हैं तृणमूल कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस, तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा), तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी.

लेकिन सबसे बड़ी समस्या ये है कि तृणमूल कांग्रेस की पश्चिम बंगाल में मुख्य प्रतिद्वंद्वी जहां वाम मोर्चा है वहीं बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच उत्तर प्रदेश में छत्तीस का आँकड़ा है.

एक ही राज्य से आने वाले दूसरे दलों के बीच भी कमोवेश ऐसी ही स्थिति है.

ऐसे में ये दोनों सवाल बड़े अहम हैं कि तीसरा मोर्चा कैसी शक्ल लेगा और यदि इसने शक्ल ले भी ली तो आगे ये कितना स्थाई होगा.

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