इस्तीफ़ा हो सकता है केजरीवाल का मास्टरस्ट्रोक

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मध्यकालीन युग में इटली के राजनेता और दार्शनिक मैकियावेली ने कहा था, "यथास्थिति को क़ायम रखने में मेरी दिलचस्पी नहीं है. मैं उसे पलटना चाहता हूं."

क्या अरविंद केजरीवाल यही संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं या फिर उनकी मंशा कुछ और है. अरविंद केजरीवाल ये दावा करते हैं कि वे प्रमुख राजनीतिक दलों को ये बताने आए हैं कि राजनीति कैसे की जाती है.

दिल्ली विधानसभा में जन लोकपाल विधेयक के पारित नहीं होने पर केजरीवाल के इस्तीफ़े की चेतावनी में अचरज जैसा कुछ भी नहीं है. इसके बाद चित भी केजरीवाल के पक्ष में है और पट भी.

अगर वे विधेयक को पारित करा लेते हैं तो जिन लोगों ने उन्हें सत्ता में लाने के लिए वोट दिया था उनके लिए वे हीरो बन जाएंगे, क्योंकि यह विधेयक उनका मुख्य चुनावी वादा था. इस विधयेक के लागू होने पर भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों से लेकर मुख्यमंत्री तक पर भ्रष्टाचार के मामलों पर कार्रवाई संभव हो पाएगी.

चित भी मेरी, पट भी मेरी

अगर केजरीवाल इस विधेयक को पारित कराने में नाकाम हुए तो वे फिर से अपने समर्थकों के पास वापस जाएंगे और कहेंगे कि उन्होंने तो विधेयक को लाने की पूरी कोशिश की लेकिन कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा होने नहीं दिया. ऐसा करने पर लोगों को समर्थन और सहानुभूति केजरीवाल को मिलेगा.

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी केजरीवाल की स्थिति से वाक़िफ़ हैं. यही वजह है कि केजरीवाल के विरोधी उन्हें 'चतुर' कह रहे हैं. क्योंकि केजरीवाल ऐसी स्थिति में हैं जहां वे सिक्का उछाल कर टॉस कर यह कह सकते हैं कि हेड आने पर मैं जीतूंगा और टेल आने पर आप हारेंगे.

विपक्षी दल केजरीवाल पर आरोप लगा रहा है कि वे सरकार चलाना ही नहीं चाहते और चुनावी वादों को पूरा करने में वे नाकाम रहे हैं.

कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही कह दिया था कि वे इस विधेयक का विरोध करती हैं. उनके मुताबिक़ यह विधेयक असंवैधानिक है और इसे पहले केंद्र के पास भेजा जाना चाहिए.

लेकिन आम आदमी पार्टी के गेम प्लानको समझने के बाद दोनों पार्टियों ने अपना सुर बदलते हुए कहा अगर केजरीवाल इस विधेयक को विधानसभा में पेश करते हैं तो वो समर्थन देंगे. ऐसा करने से दोनों राजनीतिक दलों को यक़ीन है कि विधेयक नहीं पारित होने की सूरत में आम आदमी पार्टी के नेता इन दोनों दलों पर दोष नहीं मढ़ पाएंगे.

पद छोड़ेंगे केजरीवाल?

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हालांकि केजरीवाल ने कहा है कि वे नई राजनीतिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं जो आम लोगों के प्रति कहीं ज़्यादा जवाबदेह हो, जो अमीर और ग़रीब के साथ एक जैसा बर्ताव करे. ऐसे में ये लगता है कि वो आज नहीं तो कल पद से इस्तीफ़ा तो देंगे. चाहे वह जन लोकपाल विधेयक को पारित कराने के मुद्दे पर दें या फिर किसी और अहम मुद्दे पर.

दरअसल केजरीवाल ने ये भी भांप लिया है कि दिल्ली सरकार की गद्दी छोड़ने पर मई में होने वाले आम चुनाव में उनकी पार्टी ज़्यादा बेहतर प्रदर्शन कर पाएगी.

उन्हें यह भी मालूम है कि अगर मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को बदलना है तो उन्हें केंद्र में आना होगा. ताकि उनके पास ज़्यादा अधिकार हों और ताकत हों. उनकी नजर संसदीय चुनाव में ज़्यादा से ज्यादा सीटें जीतने पर लगी है.

कहने को तो केजरीवाल बहुत बड़ा जोख़िम मोल ले रहे हैं लेकिन उन्हें यकीन है कि उनके पास खोने को कुछ भी नहीं है और पाने को बहुत कुछ है.

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