मोदी पर गरम अमरीका, अब पड़ा नरम

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भारत में अमरीका की राजदूत नैंसी पॉवेल अगले कुछ दिनों में गांधीनगर में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात करने वाली हैं. इस ख़बर से ये भी संकेतमिलता है कि अमरीका में मोदी के प्रवेश पर अब तक लगी 'पाबंदी' के मामले में अमरीकी प्रशासन की राय बदल रही है.

अगर अमरीका अभी इस दिशा में कदम नहीं उठाता है तो वह ख़ुद को भारत में आम चुनाव के बाद असहज स्थिति में पा सकता है क्योंकि इस चुनाव में मोदी प्रधानमंत्री पद तक पुहंच सकते हैं.

इसलिए अमरीकी प्रशासन की बाध्यता है कि वो भारत की राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के बढ़ते प्रभाव को स्वीकार करें. हालांकि अभी अमरीका केवल अपने प्रतिनिधि की मोदी से मुलाकात पर सहमत हुआ है. इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं कि वो मोदी को अमरीकी वीज़ा देने पर सहमत हो गया है.

लेकिन इस सहमति से भी यह स्पष्ट है कि अमरीकी प्रशासन मोदी को जल्दी ही वीज़ा दे सकता है. यह बदलाव अमरीका में मोदी समर्थक और मोदी विरोधी गुटों की बदलती स्थिति से काफी हद तक प्रभावित रहा है.

हालांकि अमरीकी विदेश विभाग ने साफ़ किया है कि अमरीकी राजदूत और मोदी की भेंट का अमरीका की वीज़ा नीति पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

इस मामले पर पूछे गए सवाल के जवाब में विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता जेन साकी का कहना था, "जब कोई व्यक्ति वीज़ा के लिए आवेदन देता है, तो उसपर अमरीकी क़ानून और नीतियों के तहत फ़ैसला लिया जाता है. ये किसी बदलाव को नहीं दर्शाता है. .. हम उसके बारे में बात नहीं करते हैं क्योंकि ये निजता का मामला है."

विरोधी कमज़ोर

2005 में अमरीका ने मोदी को वीज़ा देने से इनकार कर दिया था, इसकी वजह गुजरात में हुए 2002 के दंगे थे जिसे रोकने के लिए कथित तौर पर मोदी ने कोई कार्रवाई नहीं की थी. इस दंगे में एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई थी और इनमें ज़्यादातर मुस्लिम थे.

उस वक्त विभिन्न समूहों ने एकजुट होकर मोदी के अमरीका में प्रवेश का विरोध किया था. इनमें यहूदी नेता, इवानजेलिकल क्रिश्चियंस, भारतीय हिंदू और भारतीय मुसलमान के अलावा रिपब्लिकन कांग्रेस के लोग शामिल थे. ये लोग दुनिया भर में धार्मिक स्वतंत्रता के हिमायती हैं.

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गुजराती मुसलमान ज़ाहिर जान मोहम्मद उन लोगों में एक थे. वे तब अमरीकी कांग्रेस के साथ काम करते थे. उन्होंने बताया, "तब मोदी का विरोध करने वाली लॉबी काफ़ी मज़बूत थी जबकि मोदी का समर्थन करने वाली लॉबी ने हमारा विरोध नहीं किया."

तब मोदी विरोधी गुट को सबसे बड़ा समर्थन दक्षिण पंथी इवानजेलिकल क्रिश्चियंस समुदाय का मिल गया था. इसको भारतीय मूल के अमरीकी प्रभुदास भी स्वीकार करते हैं. वे अमरीका में मोदी के प्रवेश का विरोध करने वाले गुट में शामिल थे. तब मोदी का समर्थक गुट भी वहां था, लेकिन वह बेहद कमज़ोर था.

लेकिन जान मोहम्मद मानते हैं कि रिपब्लिकन भारत के पक्ष में होते गए और इवानजेलिकल क्रिश्चियंस ने भी मोदी का विरोध त्याग दिया.

बढ़ रहा है समर्थन

गुजरात दंगों के मामले में भारत की किसी अदालत ने मोदी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया है. दंगों को हुए लंबा वक़्त बीत चुका है जिस दौरान मोदी विरोधियों वाला धड़ा कमज़ोर पड़ है.

इसके उलट मोदी समर्थकों की स्थिति, जिसमें अमरीका में काम करने वाले गुजराती भारतीय शामिल हैं, बेहतर हुई है. ओबामा प्रशासन इस समूह पर ध्यान देता है, जबकि जॉर्ज बुश अपने कार्यकाल में इसे ज़्यादा तवज्जो नहीं देते थे.

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मोदी के समर्थक और विरोधी दोनों मानते हैं कि मोदी प्रधानमंत्री बन सकते हैं. अगर अमरीकी प्रशासन मोदी को अमरीका का वीज़ा देने की घोषणा करता है तो मोदी विरोधी गुट की आवाज़ पर किसी का ध्यान नहीं जाएगा. पिछले कुछ सालों में यह सबसे बड़ा बदलाव हुआ है.

इसके साथ, मोदी अब एक राष्ट्रीय स्तरके नेता हो चुके हैं और कारोबारी समूह के हिमायती नेता माने जाते हैं. अमरीका में बसे भारतीयों के बीच भी उनका समर्थन बढ़ा है. यह अमरीकी सरकार और मोदी समर्थकों से छुपा नहीं होगा.

हालांकि दिलचस्प यह देखना होगा कि मोदी के प्रति अमरीका की नरमी पर कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली भारत सरकार किस तरह से प्रतिक्रिया जताती है.

मोदी का फ़ायदा

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2005 में जब अमरीका ने मोदी को वीज़ा देने से इनकार किया था तब भारत सरकार ने इस फ़ैसले पर कड़ा विरोध जताया था. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसके बाद की अपनी अमरीकी यात्रा के दौरान व्यक्तिगत तौर पर इस मुद्दे को उठाया था. इससे अमरीका कांग्रेस अचंभे में आ गई थी, क्योंकि उन्हें लगा था कि भारत सरकार इस क़दम का स्वागत करेगी. लेकिन अब कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार ख़ुद को मुश्किल में पा रही होगी.

वहीं दूसरी ओर मोदी इसका निश्चित तौर पर फ़ायदा उठाएंगे. जान मोहम्मद कहते हैं कि जब अमरीकी सरकार ने मोदी को वीज़ा देने से इनकार किया था तब मोदी ने उसे भुनाया था और अब जब अमरीकी सरकार उनसे सुलह करने की कोशिश कर रही है तो वे उसे भी भुनाएंगे.

सोशल मीडिया पर मोदी की अमरीकी राजदूत के साथ प्रस्तावित बैठक की ख़ूब चर्चा हो रही है. इसे मोदी की जीत के तौर पर देखा जा रहा है. लेकिन मोदी उच्च नैतिकता दिखाते अमरीकी वीज़ा के लिए आवेदन देने की जल्दी नहीं करेंगे.

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