'द हिंदूज़': पेंगुइन के फ़ैसले की आलोचना

'द हिंदूज़: ऐन अल्टरनेटिव हिस्ट्री
Image caption पेंगुइन इंडिया ने इस मामले पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है

भारत के प्रमुख लेखकों, शायरों और बुद्धिजीवियों ने एक कट्टर हिंदूवादी संगठन के दबाव में आकर अमरीकी लेखिका की किताब को दुकानों से वापस लेने के फ़ैसले पर अंतरराष्ट्रीय पब्लिशर पेंगुइन इंडिया की आलोचना की है.

हिंदूवादी संगठन 'शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति' ने अमरीकी लेखिका वेंडी डॉनिगर की किताब 'द हिंदूज़: ऐन ऑल्टरनेटिव हिस्ट्री' (हिंदू धर्म का वैकल्पिक इतिहास) के ख़िलाफ़ ये कहकर मुक़दमा दायर किया था कि इस किताब में कथित तौर पर हिंदू देवी देवताओं की बेइज्ज़ती की गई है.

उनका यह भी कहना है कि इस किताब में हिंदू धर्म को ग़लत तरीक़े से पेश किया गया है.

शिक्षा बचाओ आंदोलन समिति का कहना है कि, ''लेखिका ने अपनी किताब में हिंदू देवी-देवताओं को बेहद अश्लील अंदाज़ में पेश किया है, ये किताब गंदगी से भरी हुई है, इससे हमारी भावनाओं को बहुत ठेस पहुँची है.''

पेंगुइन ने बुधवार को हिंदू संगठन के प्रतिनिधियों से समझौते के बाद किताब को दुकानों से वापस लेकर नष्ट करने का फ़ैसला लिया था.

इसके बाद कई बुद्धिजीवियों का कहना है कि ये नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने से पहले बुद्धिजीवियों को चेतावनी देने का क़दम है.

लेकिन पेंगुइन के इस फ़ैसले के पीछे क्या वजह थी, इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है. बीबीसी ने पेंगुइन से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ़ से किसी भी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी.

'मोदी का बढ़ता प्रभाव'

कई बुद्धिजीवियों ने एक बयान जारी कर कहा है कि समाज का एक वर्ग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से सहमत नहीं है. बुद्धिजीवियों का कहना है कि किसी लेख का बेहतरीन जवाब हमेशा लेख ही होता है और उस का जवाब किसी किताब पर पाबंदी लगाना नहीं है.

ऐसे ही एक बुद्धिजीवी विष्णु खरे ने बीबीसी से बातचीत में किताब के विरोध पर हैरानी ज़ाहिर की. उन्होंने कहा, "इस किताब के बारे में कोई नहीं जानता. ये थ्योरी की एक मोटी किताब है जो डेढ़ बरस पहले आई थी और इसका हिंदी में अनुवाद भी नहीं हुआ है."

वे कहते हैं, "ये भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के बढ़ते हुए प्रभाव का नतीजा है. पब्लिशरों को अंदाज़ा हो गया है कि केंद्र में एक हिंदू समर्थक सरकार आने वाली है और वे कोई ख़तरा मोल लेना नहीं चाहते. इससे लेखकों, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को भी आने वाले दिनों की चेतावनी दे दी गई है."

'कट्टरपंथी ताक़तवर हो रहे हैं'

चर्चित इतिहासकार प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन कहते हैं कि ये कट्टरपंथी संगठन अब ताक़तवर होते जा रहे हैं. उनके अनुसार ख़तरनाक बात ये है कि ये समूह और संगठन अब सरकार और संस्थाओं पर अपना प्रभाव बनाने में कामयाब हो रहे हैं.

प्रोफ़ेसर हसन कहते हैं कि भारतीय समाज में संयम और बर्दाश्त करने की क्षमता कम होती जा रही है और इन सवालों पर अब कोई बहस नहीं होती है और सरकार से भी कोई ये नहीं पूछता कि वो चाहती क्या है.

उन्होंने कहा कि पिछले बीस पच्चीस सालों में देश में सहिष्णुता में कमी आई है, इसका असर सिर्फ़ जनता पर ही नहीं पड़ा है बल्कि बुद्धिजीवी भी बँटते जा रहे हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी कमज़ोर हो रही है.

वैसे यह पहला मौक़ा नहीं है जब भारत में कट्टर संगठनों की वजह से किसी किताब पर पाबंदी लगाई गई है. लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब एक बड़े पब्लिशर ने एक संगठन के दबाव में डेढ़ साल पुरानी किताब को किसी प्रतिरोध के बिना ही वापस लेने का फ़ैसला कर लिया है.

पेंगुइन इंडिया ने इस मामले पर कोई टिप्पणी करने से इंकार कर दिया है.

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