प्याज़: कभी तो हँसाए, कभी ये रुलाए

  • 14 फरवरी 2014
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एक सुबह मनोज कुमार जैन लसलगांव में एक कार पार्किंग में प्याज़ के पहाड़ के बीच में अपने मोबाइल फ़ोन पर ऑर्डर ले रहे थे.

अपने पीछे आते, सफ़ेद टोपी पहने- उदास किसान जैसे दिखने वाले, एक निर्यातक से उन्होंने कहा, "आपको रूस के लिए बड़े लाल प्याज़ चाहिए न? मैं अभी आपको एक सैंपल भिजवाता हूं."

उन्होंने फ़ोन बंद किया, प्याज़ की तस्वीर ली और एक लोकप्रिय फ़ोन ऐप से ज़रिये उसे भेज दिया.

मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा, "तकनीक ने व्यापार को आसान बना दिया है. हमें यहां सारा वक़्त बर्बाद करने की ज़रूरत नहीं है."

महाराष्ट्र में स्थित लसलगांव प्याज़ मंडी एशिया का सबसे बड़ा प्याज़ बाज़ार है और महाराष्ट्र भारत के 1.60 करोड़ टन प्याज़ का एक तिहाई पैदा करने वाला राज्य है.

मनोज जैन उन 200 लाइसेंसधारी व्यापारियों में से एक हैं जो 1,700 किसानों से प्याज़ ख़रीदते हैं. किसान नज़दीक-दूर से अपनी फ़सल को ट्रैक्टरों में भरकर 13 में से किसी एक नीलामी स्थल में लाते हैं जिनमें पांच से छह दिन काम होता है.

कमाल की सब्ज़ी

प्याज़ एक कमाल की सब्ज़ी है. यह लाखों अमीर-गरीब भारतीयों की सब्ज़ी का अनिवार्य तत्व है. देश में कम ही ऐसे रसोईघर होंगे जिनका काम इस तीखी चीज़ के बिना चल सकता है.

खाने में इसे तलकर, पीसकर या ऊपर से सजाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है और सलाद के रूप में भी खाया जाता है.

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भारत के कृषि लागत और मूल्य आयोग के प्रमुख कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी कहते हैं, "प्याज़ की मांग बाज़ार में स्थिर बनी रहती है. आप किसी भी सब्ज़ी के साथ इसे बदल नहीं सकते."

इसलिए भारतीय प्याज़ के बिना काम नहीं चला सकते.

आपूर्ति ज़्यादा हो जाए तो दाम गिर सकते हैं जिससे लाखों किसान प्रभावित होते हैं. देश में प्याज़ की 60% पैदावार महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक में होती है. इसलिए मूल्य निर्धारण के प्रति यही राज्य सबसे ज़्यादा संवेदनशील हैं.

इसके विपरीत प्याज़ में कमी से दाम उछल सकते हैं जो ग़ुस्से, विरोध का कारण बनते हैं और तो और सरकारों को गिरा भी सकते हैं.

निर्यात रोकने पर मजबूर

साल 2010 में प्याज़ के दाम बढ़ने के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों को रोकने के लिए कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार निर्यात रोकने पर मजबूर हो गई थी.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा था, "जब प्याज़ के दाम चढ़ते हैं तो सरकारें गिर सकती हैं."

पिछले साल जब बारिश की वजह से फ़सल बर्बाद हो गई और उसके आने में देर हुई तो प्याज़ के दाम 270% तक बढ़ गए थे. सबसे ग़रीब परिवारों को खाद्य पदार्थों के महंगे होने की क़ीमत सबसे ज़्यादा चुकानी पड़ती है क्योंकि वह अपनी कमाई का 60% तक इस पर ख़र्च करते हैं.

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मनोज जैन कहते हैं, "प्याज़ बहुत अस्थिर है, कोई नहीं जानता की कब इसके दाम बढ़ेंगे या घटेंगे. हम इसे जमा करके नहीं रख सकते क्योंकि यह ख़राब होने वाली चीज़ है और यह खुले बाज़ार में बेचा और ख़रीदा जाता है."

प्याज़ का व्यापार एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की कमज़ोरियों को भी रेखांकित करता है- यह भारी मुद्रास्फ़ीति और धीमे विकास से जूझ रही है.

जैसे कि यह व्यापार बताता है कि कृषि अर्थव्यवस्था मौसम की अनिश्चितताओं पर कितनी ज़्यादा निर्भर है.

मुद्रास्फ़ीति

बेमौसमी बरसात फ़सलों को बर्बाद कर सकती है, आपूर्ति को बाधित कर सकती है और क़ीमतों को चढ़ा सकती है. सूखा गंभीर कमी और मुद्रास्फ़ीति की ओर ले जा सकता है.

जहां उपभोक्ता और किसानों का नुक़सान होता है वहीं थोक और किराना व्यापारी कमाते हैं.

यह व्यापार इसका स्पष्ट उदाहरण है कि कैसे सिर्फ़ आधा दर्जन बिचौलियों वाली जटिल और अस्त-व्यस्त आपूर्ति व्यवस्था मूल्य निर्धारित करती है और सब्ज़ियों की फुटकर क़ीमतों को बहुत ज़्यादा बढ़ा देती है.

सप्ताहांत में लसलगांव नीलामी के दौरान आपूर्ति अच्छी थी और जैन आठ से साढ़े नौ रुपये प्रति किलो के हिसाब से किसानों से प्याज़ ख़रीद रहे थे.

यहां से क़रीब 223 किलोमीटर दूर मुंबई में प्याज़ दुकानों और बाज़ारों में इससे कम से कम तीन गुना क़ीमत पर बिक रहा था.

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अशोक गुलाटी कहते हैं, "आपूर्ति में कमी की वजह से उपभोक्ता तक पहुंचने तक प्याज़ की क़ीमतों में 400 से 500% वृद्धि के उदाहरण मौजूद हैं. सब ख़ुशी-ख़ुशी अपना हिस्सा बना रहे हैं."

चुनौती

वैसे उत्पाद को बाज़ार तक पहुंचाना भी एक चुनौती है. भारत के हिस्सों में माल ढुलाई, या इसकी कमी भी भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की एक बड़ी कमज़ोर आधारभूत ढांचे का ही हिस्सा है.

उसी दिन हमें इसका अहसास हुआ. मनोज जैन क़रीब 1,750 किलोमीटर दूर कोलकत्ता तक प्याज़ पहुंचाने वाले कुछ ट्रकों को लेकर अपने फ़ोन पर जूझ रहे थे.

उन्होंने मुझे बताया कि प्याज़ से लदे क़रीब 165 ट्रक रोज़ शहर की तरफ़ जा रहे थे लेकिन ये पर्याप्त नहीं थे. और ट्रेन भी इसका विकल्प नहीं हैं. क्षेत्र में चार रेलवे स्टेशन होने के बावजूद पूर्व और उत्तर में बड़ी प्याज़ मंडियों तक तेज़ी से माल पहुंचाने के लिए ढुलाई वाली गाड़ियों की व्यवस्था नहीं है.

मनोज जैन कहते हैं, "फ़सल को ले जाने के लिए पर्याप्त ट्रेनें या ट्रक नहीं हैं. और हम प्याज़ को लंबे समय तक जमा करके नहीं रख सकते क्योंकि यह बहुत जल्दी ख़राब होने वाली सब्ज़ी है."

स्थिति इसलिए भी और ख़राब हो जाती है क्योंकि प्याज़ में 85% पानी होता है. भारत में पड़ने वाली भीषण गर्मी में पुराने ढंग से जमा करने पर इसका वज़न बहुत जल्दी गिरने लगता है.

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मनोज जैन अपने प्याज़ को तिरपाल की छतों वाले दो एकड़ के धूल भरे प्लॉट में रखते हैं जहां 60 कर्मचारी उन्हें आकार और गुणवत्ता के हिसाब से छांटने में लगे रहते हैं. उनका अनुमान है कि 3 से 5 फ़ीसदी फसल तो नियमित रूप से जमा करने के दौरान ही ख़राब हो जाती है.

कोल्ड स्टोरेज के अभाव

गुलाटी कहते हैं, "अंततः जो आप बेचते हैं वह उससे बहुत कम होता है जो आपने ख़रीदा था."

और जब तक भारत पूरे देशभर में कोल्ड स्टोरेज का एक जाल नहीं बिछा लेता, यह ऐसा ही रहेगा.

ब्रिटेन के मैकेनिकल इंजीनियरों के एक संस्थान की ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज के अभाव में खेत और उपभोक्ता के बीच क़रीब 40% फल और सब्ज़ियां हर साल बर्बाद हो जाती हैं.

कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि प्याज़ की क़ीमतों की अस्थिरता को कम करने का एक तरीक़ा यह है कि इनका पानी निकाल लिया जाए और फिर प्रसंस्कृत प्याज़ को हर जगह उपलब्ध करवाया जाए.

अभी भारत के 5% से भी कम फल और सब्ज़ियों का प्रसंस्करण किया जाता है जिसमें से सिर्फ़ 1,50,000 टन ही प्याज़ होता है.

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गुलाटी कहते हैं, "अगर आप प्याज़ का पानी निकाल लें तो आपका खाना बनाने का समय बचता है, उसे जमा करने का समय बढ़ जाता है और क़ीमतें स्थिर हो जाती हैं. और मुझे तो स्वाद में भी कोई फ़र्क नज़र नहीं आता."

प्याज़ के लिए उन्माद

उनके जैसे अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत को अपने बेहद कमज़ोर खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा देने की ज़रूरत है ताकि अनिवार्य रूप से ख़राब हो जाने वाली सब्ज़ियों और फलों को बचाया जा सके और उनकी क़ीमत स्थिर हो पाए.

उधर नीलामी स्थल पर मनोज जैन कहते हैं कि उन्हें भारत का प्याज़ के लिए 'उन्माद' समझ नहीं आता.

वह कहते हैं, "यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो बहुत सी ज़िंदगियां बचा रही हो. लोग प्याज़ के पीछे पागल क्यों हैं? लोग, मीडिया और राजनेता इसके लिए उत्तेजित क्यों होते हैं? मुझे देखो मैं प्याज़ नहीं खाता."

लेकिन वह भारत के पचास लाख जैनियों में से एक हैं जो शाकाहारी होने के साथ ही प्याज़ और लहसुन नहीं खाते.

लेकिन प्याज़ न खाने के बावजूद उनके परिवार की दो पीढ़ियां इसके व्यापार से अमीर हो गई हैं और यह जल्द ही बदलने वाला नहीं है.

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