'ठेकेदारनुमा नेता नहीं चाहते तेलंगाना बने'

  • 17 फरवरी 2014
तेलंगाना विरोध प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट AFP GETTY

आंध्र प्रदेश का विभाजन करके अलग तेलंगाना राज्य बनाए जाने को लेकर विरोध प्रदर्शन उग्र रूप ले चुका है. इस मुद्दे पर हमने स्थानीय वरिष्ठ पत्रकार किंगशुक नाग से बातचीत करके जानना चाहा कि नए सियासी समीकरणों में किस पार्टी को फ़ायदा मिलेगा और किसे झेलना पड़ेगा नुक़सान.

बढ़ सकता है सत्र

तेलंगाना मुद्दे पर अब आगे क्या होगा, ख़ासतौर से तब जब कांग्रेस दावा कर रही है कि उसने संसद में अलग तेलंगाना राज्य का बिल पेश कर दिया है?

किंगशुक नाग: मुझे लगता है कि संसद में अब सोमवार को वोट ऑन अकाउंट के बाद तेलंगाना पर चर्चा होनी चाहिए.

ये भी हो सकता है कि प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के साथ चर्चा करके मौजूदा सत्र को तीन-चार दिनों के लिए आगे बढ़ा दिया जाए ताकि तेलंगाना के मुद्दे पर सदन में चर्चा की जा सके.

संशोधनों की वजह

लेकिन बिल में जो संशोधन की बात की जा रही है फिर उसका क्या होगा. अभी तक तो सरकार उस पर कुछ बोल नहीं रही है?

किंगशुक नाग: संशोधन तो बाद में होते रहेंगे. उसका सिलसिला तो चलता ही रहेगा. मगर सवाल उठता है कि किस तरह के संशोधन होने चाहिए?

जो लोग संशोधन की मांग कर रहे हैं वो सीमांध्र के सांसद हैं, जो तेलंगाना के ख़िलाफ़ हैं. वो तो इस बिल को रुकवाने के लिए हज़ारों बहाने ढूंढते रहेंगे.

भाजपा का रुख़

इमेज कॉपीरइट Reuters

अब आगे का रास्ता क्या हो सकता है क्योंकि अब लोकसभा के चुनाव भी क़रीब आ रहे हैं ?

किंगशुक नाग: कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच अगर समझौता हो जाता है तो ये बिल पारित हो सकता है. ये अब भाजपा को तय करना है कि वो अलग तेलंगाना राज्य का समर्थन करेगी या नहीं. अब तो तेलंगाना के इलाक़े में भाजपा को इस रूप में देखा जा रहा है जैसे वो अलग राज्य के गठन के ख़िलाफ़ हो.

सीमांध्र में जो राजनीतिक लाभ है वो तेलुगु देशम पार्टी और जगन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस ने ले लिया है. मुझे तो भाजपा को सीमांध्र में भी कोई बड़ा राजनीतिक फ़ायदा होता नहीं दिखता. भाजपा ने तेलंगाना बिल का न समर्थन किया है न विरोध.

कहीं ऐसा न हो कि भाजपा दोनों तरफ़ से बाज़ी हार जाए. मुझे तो ये भी लगता है कि जो भाजपा और तेलुगू देशम पार्टी के बीच गठबंधन की बात चल रही थी वो भी कहीं खटाई में न चली जाए. अलबत्ता ऐसा गठबंधन चुनाव के बाद हो सकता है क्योंकि इन इलाक़ों में तेलुगू देशम पार्टी अकेले ही चुनाव लड़ने का माद्दा रखती है.

किसे है दिक़्क़त

इमेज कॉपीरइट Reuters

तेलंगाना के मुद्दे पर गुरुवार को संसद में जो कुछ हुआ, उससे सीमांध्र या रायलसीमा के इलाक़े में किस तरह का संदेश जाता है?

किंगशुक नाग: ये आम लोग नहीं हैं. कहने को तो ये जनता के प्रतिनिधि हैं लेकिन वास्तविक रूप में ये लोग ठेकेदार हैं. सीमांध्र के आम लोगों को विभाजन से कोई दिक़्क़त नहीं है. सिर्फ़ ठेकेदारनुमा नेता परेशान हैं.

यही लोग सीमांध्र में लोगों को उकसाने का काम भी कर रहे हैं. इन लोगों को लगता है कि इन्होंने संसद में जो कुछ किया उससे इनकी वाहवाही हो रही है तो ये ग़लत है. इनके प्रति न तो कोई सहानुभूति है न लोगों को कोई फ़र्क़ ही पड़ रहा है. अलबत्ता विजयवाड़ा में जहाँ के सांसद एल राजगोपाल हैं, वहाँ के लोग काफ़ी शर्मिंदिगी महसूस कर रहे हैं. राजगोपाल के कुछ मित्र कह रहे थे कि संसद की घटना ने सीमांध्र के मुद्दों को गौण कर दिया है.

बिल का भविष्य

क्या आपको लगता है कि संसद में अलग तेलंगाना राज्य का बिल पारित हो पाएगा?

किंगशुक नाग: मुश्किल तो लग रहा है, लेकिन इस प्रश्न का उत्तर भाजपा के नेता बेहतर तरीक़े से दे सकते हैं क्योंकि सब कुछ उन पर निर्भर करता है. मुझे तो इसके आसार कम ही नज़र आ रहे हैं. अगर भाजपा ने तय कर लिया है कि बिल को पारित करवाना है तो ये संभव हो पाएगा. गेंद भाजपा के ही पाले में है अब.

संसद में जो कुछ हुआ उसका फ़ायदा कांग्रेस को तेलंगाना के इलाक़े में होगा?

किंगशुक नाग: बिल्कुल होगा. अलबत्ता सीमांध्र और रायलसीमा में कांग्रेस को अगर एक भी सीट मिल जाए तो ये चमत्कार ही होगा. भाजपा अलग तेलंगाना राज्य के बिल का समर्थन करती है तो उसे भी इस इलाक़े में कुछ सीटें मिल जाएंगी. आंध्र में तो जगन को फ़ायदा होता साफ़ दिख रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार