जहां उत्पात मचाने वाले हाथियों की बरसी मनाई गई

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इसे गंवई मन कहें या घर-गांव की हिफ़ाज़त के लिए कथित भय से निजात का रास्ता. या फिर जंगल व जंगली जानवरों से आत्मीय लगाव. जिस इलाक़े में अमूमन हर चौथे-पांचवें दिन हाथियों का झुंड उत्पात मचाता हो, वहीं एक गांव के लोगों ने दो हाथियों की मौत की बरसी मनाई.

झारखंड के सोनाहातू क्षेत्र के होटलो परास टोली गांव में पिछले साल छह फरवरी को बिजली के तार से सटकर दो हाथियों की मौत हो गई थी.

हाथियों की मौत के एक साल पूरे होने पर गांव के लोगों ने बरसी मनाई.

बरसी पर पूरे गांव के लोग इकट्ठे हुए. मृत हाथियों को याद किया और कामना की गई कि गांवों में जंगली हाथियों का उत्पात कम हो.

याद रखी तारीख

गांव के परमेश्वर महतो बताते हैं कि जिन हाथियों की मौत हुई थी, वे अक्सर खेतों में लगी फसलों को नुकसान पहुंचाते थे.

लेकिन मृत जानवरों को वन विभाग के अधिकारी जब दफ़नाने आए थे, तो गांव वालों ने सरकारी मुलाजिमों का पूरा साथ दिया था.

सुभाष महतो बताते हैं कि गांव के लोगों को हाथियों के मरने की तारीख़ याद थी. कुछ दिन पहले आपस में तय किया गया कि उसी तारीख़ को पूरे गांव के लोग बरसी मनाने जुटेंगे.

गांव के लोगों ने बाक़ायदा पुजारियों को भी बुलाया था. पात लगाकर दान-दक्षिणा भी दिए गए.

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वे बताते हैं कि जिस जगह पर हाथियों की मौत हुई थी, वहां पर आपसी सहयोग से गणेश मंदिर बनाने का फैसला हुआ है.

हाथियों की समाधि स्थल पर स्थानीय विधायक सुदेश कुमार महतो भी पहुंचे थे. उन्होंने ग्रामीणों से बातचीत कर उनके विचार भी जाने.

गांव की तिलोका देवी बीए पास हैं. वह बताती हैं कि पिछले साल गांव में ही हाथियों की मौत से ग्रामीण बहुत आहत थे. गांव के लोगों ने पूरे श्रद्धाभाव से हाथियों को दफनाया था.

तब से यह माना जाता है कि होटलो परास टोली गांव को किसी बड़े खतरे या नुकसान का सामना करना नहीं पड़ा है. उस घटना के बाद गांव में जंगली हाथी भी नहीं आए.

मुखिया गिरिबाला देवी कहती हैं कि वन विभाग जंगली हाथियों के उत्पात से गांवों को निजात दिलाने का मुकम्मल उपाय नहीं करता. क्षति का मुआवजा भी समय पर नहीं दिया जाता. परासटोली के लोगों का फैसला अच्छा है.

सोनाहातू क्षेत्र के अधिकतर गांव जंगल और पहाड़ों से घिरे हैं.

टकराव भी

स्थानीय पत्रकार ओमप्रकाश बताते हैं कि हफ्ते भर में हाथियो के झुंड ने तेतला, बांधटाड़, दुधीटांड़, कोलमा, चितरूडीह, कुदाडीह, जिंतू आदि गावों में भारी उत्पात मचाया है.

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हाथी, खेतों में लगी आलू और गेंहू की फसलों को बर्बाद करने के अलावा ग्रामीणों के कई कुंतल धान खा गए हैं. उन्होंने कई मौकों पर देखा है कि ग्रामीण तबाही का सामना करते हैं, इसके बाद भी वे लोग हाथी पर आक्रमण नहीं करते.

दूसरी ओर झारखंड में हाथी और मानव के बीच टकराव की की घटनाएं भी हो रही हैं.

इसे जानने-समझने और टकराव कम करने के उपाय निकालने के लिए एक टास्क फोर्स का भी गठन किया गया है.

फोर्स के चेयरमैन वन संरक्षक दिनेश प्रसाद बताते हैं कि सोनाहातू के अलावा खूंटी इलाके में भी जंगलों से घिरे कई गांवों के लोग हाथियों से लगाव रखते हैं. विपरीत परिस्थितयों में आक्रमण नहीं करते.

कई मामलों में देखा गया है कि फसलों की क्षति पर वे मुआवजा लेने से भी इनकार कर देते हैं.

इस सवाल पर कि ग्रामीण क्या चाहते हैं- जंगली जानवरों की हिफाजत या टकराव? वह बताते हैं कि क्षेत्रवार ग्रामीणों के ख्याल अलग-अलग होते हैं.

टास्कफोर्स इन्हीं मामलों का अध्ययन कर रहा है.

मुआवज़े के लिए संघर्ष

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आंकड़े बताते हैं कि जंगली जानवरों द्वारा सुदूर इलाकों में बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हो रही है.

अलग राज्य निर्माण के बाद से 2013 तक 900 सौ से अधिक लोगों की जान हाथियो ने ली है.

डेढ़ हजार लोगों को घायल किया है. जान-माल की क्षति को लेकर तेरह सालों में वन विभाग ने मुआवज़े के तौर पर 21 करोड़ रुपये बांटे हैं.

ताजा घटना में पिछले 31 जनवरी को रांची जिले के तमाड़ थाना क्षेत्र के बीरगांव में हाथी ने एक व्यक्ति को पटक कर मार डाला था.

इसी हफ्ते सिमडेगा जिले के ठेठईटांगर थाना क्षेत्र में हाथियों के बढ़ते उत्पात से प्रभावित ग्रामीणों को उचित मुआवजा दिलाने की मांग को लेकर स्थानीय लोग सड़क पर उतर गए थे.

स्थानीय विधायक और ग्रामीणों ने तीस घंटे तक राष्ट्रीय राजमार्ग जाम रखा था.

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