चवन्नी की कॉलर ट्यून, करोड़ों का धंधा

  • 26 फरवरी 2014
मोबाइल म्यूज़िक

किसी को कॉल करने पर सुनाई देने वाली धुन यानी कॉलर ट्यून्स बोरिंग ट्रिंग-ट्रिंग से आज़ादी तो दिलाती ही है, साथ ही जिसको आप कॉल कर रहे हैं वो किस मूड में है उसके बारे में भी अंदाज़ा हो जाता है.

बॉलीवुड की धुनों पर खड़कते फ़ोन्स ने न सिर्फ़ सैकड़ों लोगों की ज़िंदगियां बनाई, बल्कि एक उद्योग को खड़ा किया है.

रिंगटोन और कॉलरट्यून ने बीते डेढ़ दशकों में मोबाइल वैल्यू ऐडेड सर्विस को एक उद्योग के रूप में ऊंचाई दी है.

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण की कड़ी नीतियों के बाद धीमी पड़ी रिंगटोन सेवाएं अब भी मोबाइल-वैल्यू ऐडेड सर्विसेज़ उद्योग का सबसे बड़ा हिस्सा है.

वहीं भारतीय संगीत उद्योग के जानकार अतुल चूड़ामणि कहते हैं, "रिंगटोन्स की बिक्री को पायरेसी से नुकसान पहुंचा है. कॉलर ट्यून की चूंकि पायरेसी नहीं हो सकती वो अब तक उद्योग में बना हुआ है. हालांकि टेलीकॉम ऑपरेटर्स को उसे और अहमीयत देने की ज़रूरत है. मोबाइल कंपनिया डाटा बिक्री पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं, लेकिन अगर वो यहां भी ध्यान दे तो उन्हें काफ़ी फ़ायदा हो सकता है. संगीत कंपनियों को एक साथ आकर इसे प्रमोट करना चाहिए."

कितने में बनता है रिंगटोन?

उद्योग जगत के जानकारों के अनुसार फिलहाल कॉलर ट्यून और रिंगटोन्स टेलिकॉम जगत में करीब ढाई सौ करोड़ रुपए का उद्योग है. हालांकि इन्हें बनाने में बेहद कम खर्च आता है.

मोबाइल कंटेट क्षेत्र की एक बड़ी कंपनी में मोबाइल ऑडियो विभाग की देखरेख कर रहे आदित्य श्रीवास्तव बताते हैं, “अगर कॉपीराइट से मुक्त गाने पर रिंगटोन बनाया जाए तो उस पर कोई खास खर्च नहीं आता, लेकिन अगर विशेष तौर पर संदेश युक्त ऑडियो मैसेज कॉलर ट्यून के लिए तैयार किया जाए तो उसका खर्च लाख-दो लाख तक जा सकता है, निर्भर करता है कि आवाज़ किसकी है.”

उनका कहना है कि कॉलर रिंग बैक टोन यानी सीआरबीटी के स्वरूप में आने वाले भविष्य में काफ़ी बदलाव भी हो सकते हैं.

उन्होंने कहा, “अभी तक कॉलर ट्यून्स ने लोगों का मनोरंजन किया है, लेकिन अब वो न सिर्फ मनोरंजन और शिक्षित करेगा बल्कि, कॉल पाने वाले के लोकेशन, व्यस्तता संबंधी जानकारियां भी देगा.”

सीडी, डीवीडी का नहीं डिजिटल का भविष्य

कॉलर ट्यून्स और रिंगटोन व्यापार ने संगीत उद्योग को भी नई सांसें दी हैं. सीडी, डीवीडी की बिक्री में आई कमी की भरपाई डिजिटल ऑडियो और रिंगटोन कॉपिराइट बिक्री कर रही है.

फ़िक्की-केपीएमजी के एक अनुमान के अनुसार इस साल डिजिटल म्यूज़िक उद्योग सवा आठ अरब रुपए तक पहुंच जाएगा.

इंडियन म्यूज़िक इंडस्ट्री के महासचिव सैवियो डीसूजा कहते हैं, “रिंगटोन और कॉलर ट्यून्स पिछले दस साल से म्यूज़िक इंडस्ट्री को काफ़ी सहायता देता आ रहा है. वो एक काफी सफल प्रयोग है. लेकिन आने वाले दस साल में म्यूज़िक कंपनियों को ये देखना है कि वो म्यूज़िक एप्लिकेशन और स्ट्रीमिंग से कैसे पैसे कमा सकते हैं.”

फिलहाल कॉलर ट्यून के लिए मोबाइल यूज़र को 10 से 50 रुपयों तक की कीमत चुकानी पड़ती है, जबकि रिंगटोन का बाज़ार पाइरेसी के चलते काफ़ी अनियमित है.

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