महिलाओं ने आख़िर हासिल कर लिया शौचालय

लखनऊ के पास एक गांव की महिलाओं ने अपने लिए संघर्ष कर शौचालय बनवा लिया इमेज कॉपीरइट Atul Chandra BBC

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 45 किलोमीटर दूर अहमदपुर गाँव की महिलाओं में 25 जनवरी से आत्म-सम्मान की एक नई लहर दौड़ रही है.

इन महिलाओं ने लड़-झगड़ कर गाँव में एक जैविक शौचालय का निर्माण करवा लिया है. और अब उन्हें रात-बिरात, मौसम-बेमौसम खुले में शौच नहीं जाना पड़ेगा.

अहमदपुर, माल ब्लॉक और मलिहाबाद तहसील का हिस्सा है. यहाँ से तहसील मुख्यालय 21 किलोमीटर दूर है. 825 की जनसंख्या वाले अहमदपुर में सरकारी शौचालय काफ़ी जर्जर हालत में है.

यहाँ के 125 घरों में से केवल आठ ही ऐसे हैं जिनमें शौचालय की व्यवस्था है. लेकिन सर्दी, गर्मी और बरसात में गाँव के बाक़ी मर्दों, औरतों और बच्चों को शौच के लिए खेतों और आम के बागों में ही जाना पड़ता था.

(शौचालय नहीं, तो सरपंच नहीं)

गर्मी में इनको विशेष दिक़्क़त होती थी, क्योंकि माल में आम के बाग़ अधिक हैं और फसल के समय इनको ठेके पर बेच दिया जाता है. आम की फसल की निगरानी करने वाले फलों की चोरी के डर से लोगों को बाग़ में घुसने नहीं देते हैं.

नहीं मिली सरकारी मदद

इन तमाम मुश्किलों के बाद भी जब गाँव के तीन महिला स्वयं सहायता समूहों की 36 सदस्यों ने एक शौचालय बनवाने का फ़ैसला लिया तो कोई उन्हें ज़मीन देने को भी तैयार नहीं हुआ. सरकारी तंत्र ने भी कोई मदद नहीं की.

50 वर्षीय सुशीला को सर्वसम्मति से जैविक शौचालय प्रबंध समिति का संरक्षक चुना गया. वह बताती हैं कि उन्हें कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा. उनके अनुसार, "गाँव में किसी ने अपनी ज़मीन नहीं दी और सरकार ने भी हमारी कोई मदद नहीं की."

लेकिन इन महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारी. उन्होंने मिलकर गाँव के आतंरिक प्रतिरोध और सरकारी तंत्र से लड़कर शौचालय बनवा कर ही दम लिया. उनके इस प्रयास में गैर-सरकारी संस्था 'वात्सल्य' ने आरम्भ से अंत तक अहम भूमिका निभाई.

(दुनिया का सबसे प्राचीन 'सार्वजनिक शौचालय')

इन सभी महिलाओं को पांच-छह बार मलिहाबाद में एसडीएम के दफ़्तर के चक्कर लगाने पड़े. कभी ट्रैक्टर और कभी बैलगाड़ी में जा कर इन महिलाओं ने वहाँ गुहार लगाई, तो कभी धरना भी दिया.

सुशीला कहती हैं, "आख़िर में मेरे पति रामकुमार ने ज़मीन दी, तब जाकर ये शौचालय बना." इस पूरे संघर्ष में तीन महीने लगे. सुशीला बताती हैं कि इस नए, पक्के, शौचालय का इस्तेमाल 18 परिवार ही कर रहे हैं. किसी परिवार में नौ सदस्य हैं तो किसी में सात.

सुशीला के अलावा शौचालय के प्रबंध समिति में नन्ही सचिव का काम देखती हैं जबकि सियाराम कोषाध्यक्ष हैं. नन्ही के मुताबिक़ तीन और परिवार इसका इस्तेमाल करना चाहते हैं.

15 रुपये प्रति महीना

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Image caption एक ग़ैर सरकार संगठन की मदद से ये शौचालय बनाया गया है

इसमें चार शौचालय हैं और एक स्नानघर. इसके बगल में ही मर्दों के लिए इसी तरह की व्यवस्था है.

प्रत्येक परिवार, जो इस शौचालय का इस्तेमाल कर रहा है, उसे इसके रख-रखाव के लिए 15 रुपये प्रति माह देना होगा. इस राशि में से ही बिजली का बिल भी अदा किया जाएगा.

इसकी सफ़ाई की ज़िम्मेदारी प्रबंध समिति की महिलाओं ने अपने ऊपर ले ली है.

(अब टॉयलेट विज्ञापन भी 'नस्लीय')

वात्सल्य के अंजनी कुमार सिंह बताते हैं कि इस जैविक शौचालय की विशेषता देश के रक्षा अनुसंधान संगठन (डीआरडीओ) द्वारा तैयार की गई इसकी आधुनिक तकनीक है, जिसे बायो-डीजेस्टर कहते हैं.

45 फुट लम्बे और 18 फुट चौड़े इस शौचालय का मल-मूत्र जीवाणुओं द्वारा साफ़ पानी में बदल दिया जाता है जिसे क्यारियों की सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

गाँव की महिलाएं अभी इस पानी के इस्तेमाल के लिए पूरी तरह सहमत नहीं हैं.

बायो-डीजेस्टर टैंक के निर्माण में 1.80 लाख रुपए खर्च हुए जबकि इसकी कुल लागत 6.25 लाख रुपए आई. यह सारा ख़र्च ग़ैर-सरकारी संस्था प्लान इंडिया ने वहन किया.

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